STORYMIRROR

नासा ( NaSa ) येवतीकर

Abstract

4  

नासा ( NaSa ) येवतीकर

Abstract

धूप

धूप

1 min
277

  बाहर तेज धूप है राणी निकला ना किजीए

गोरा है तेरा मुखड़ा कही काला ना हो जाए


नाजूक सा तेरा बदन नाजूक सी तेरी चाल

तुझे देखनेवाले सब हो जाते है हालबेहाल

संभल के चल कहीं पांव फिसल ना जाए


तेरे आने रस्ते पे सब आंख बिछाहे बैठते है

तू ना दिखे एक पल तो गम के आंसू रोते है

मुखडे पे परदा रख कहीं नजर न लग जाए


तू चीज ऐसी है तुझे देखने सब मरते है

तू ना मिली एक दिन तो जीने से डरते है

रब से मांगे दुआ तुझे लंबी उमर मिल जाए।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract