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Shashiprakash Saini

Abstract

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Shashiprakash Saini

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चल छाता छोड़ चले

चल छाता छोड़ चले

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बच्चें हो जाएं फिर से

चल छाता छोड़ चले


डर डर के ना जीना मुझको

घुट घुट के ना जीना

बचपन फिर बन आएं

चल छाता छोड़ चले


अब की हर बूंद भिगाए

कीचड़ सन कर हम आएं

हम भी बरसात निभाएं

चल छाता छोड़ चले

 

कितनी बरसातें खेला ना

हवा गेंद में भर लाएं

बल्ला खूब नचाएं

चल छाता छोड़ चले


जीवन गठरी मैली है

गमगीन हुआ है कुर्ता

रंगत बरसात बढ़ाए

चल छाता छोड़ चले


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