छू लेने तो दो !
छू लेने तो दो !
छू लेने दो तमन्नाओं को आसमान तक
दिन ,दिन न रहे रात के शय में न कोई बात बाकी
आंखों के कोर से झलकते एहसास को रोककर
बाँध लो मुट्ठी में सारे सैलाब; धो दो निशान
नित्य चुभन के
चलना ही है, रुकना नहीं
सोचना है थमना नहीं
वादों का मंजर साथ रहे, याद बस यही दिन- रात हो
छू लेने दो चिरागों को अंधेरे का आँगन
चलने दो राहगुज़र को मंजिल की तरफ।
