भयानक यात्रा
भयानक यात्रा
एक रात हम बरामदे में चारपाई पर सो रहे थे
जलालत की जिंदगी से दूर सपनों में खो रहे थे
सपनों में जन्नत का नजारा देखकर प्रसन्न थे
खूबसूरत हसीनाओं के जमावड़े से हम सन्न थे
इतने में दो मोटे तगड़े मुस्टंडे मेरे पास आए
मुझे चारपाई समेत उठाकर आसमान में धाए
वे लोग बड़ी तेज गति से सरपट दौड़े जा रहे थे
गिरने के डर से मेरे प्राण हलक में आ रहे थे
हजारों मील ऊपर से चले जा रहे थे वे
रास्ते में आग का दरिया पार करते जा रहे थे वे
उस आग में लोगों को जिंदा जलाया जा रहा था
कोड़ों से कुछ लोगों की चमड़ी को उधड़वाया जा रहा था
कुछ लोगों पर सांप बिच्छू जैसे जहरीले कीड़े छोड़ दिये थे
कुछ लोगों के सिर आपस में भिड़ाकर फोड़ दिये थे
चारों ओर चीत्कार, हाहाकार मचा हुआ था
ऐसी भयानक यात्रा से हमारा साक्षात्कार हुआ था
वो मुस्टंडे बता रहे थे कि पाप का दंड मिल रहा है
किसी का रुण्ड किसी के मुण्ड से जाके मिल रहा है
कुछ भयानक जंगली जानवर जिंदा लोगों को खा रहे थे
उस दृश्य को देखकर डर के मारे मेरे कण्ठ सूखे जा रहे थे
रक्त में नहाई हुई महिलाएं आर्तनाद कर रही थीं
अपने नवजात शिशुओं का वे खुद ही भक्षण कर रही थीं
उस यात्रा की भयावहता को देखकर दिल दहल गया
लेकिन सामने धर्मराज जी को देखकर दिल संभल गया
चित्रगुप्त जी ने मेरा लेखा जोखा पढ़कर सुनाया
उन मुस्टंडों ने मुझे बैठाकर शीतल जल पिलाया
अब धर्मराज जी मेरा फैसला सुनाने वाले थे
हम भी अपनी करनी का फल सुनने को उतावले थे
धर्मराज जी बोले "इसका समय अभी बाकी है
इसी नाम का दूसरा व्यक्ति लाना था जो पहने खाकी है
इन्हें ससम्मान वापस छोड़कर आइए
भविष्य में ऐसी गलती ना कभी दोहराइए"
उनकी बातें सुनकर हमारी जान में जान आई
खुशी के मारे हमने जोर की एक छलांग लगाई
बीवी बोली, साठ के हो गये हो अब तो उछल कूद बंद करो
अगला जनम सुधर जाये, कुछ ऐसा बंदोबस्त करो
हमने कहा "हम तो अभी अभी ट्रेलर देखकर आये हैं
तुम अपना बंदोबस्त करो, हम तो हिसाब कर आये हैं"
ऐसी भयानक यात्रा भगवान किसी को ना दिखाए
जिसे देखकर किसी के प्राण हलक में आ जाए।
श्री हरि
