STORYMIRROR

Sunita Shukla

Abstract

3  

Sunita Shukla

Abstract

अन्तर

अन्तर

1 min
150

जीवन के युद्ध में, मैं वरदान बन गई।

कभी ढाल बन गई तो कभी म्यान

बन गई।

हम साथ साथ खेले और साथ ही बढ़े,

तू रत्न बन गया मैं सामान बन 

गई।

कभी तलवों रौंद डाला, कभी शीश धर लिया,

सब जानते हुए भी अनजान बन 

गई।

गलती तो थी तुम्हारी गलती भी थी हमारी,

तू देव ही रहा मैं पाषाण बन गई।

थी तो कठिन पहेली ना बूझ सका कोई,

जो प्यार से छुआ तो आसान बन 

गई।


 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract