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Ajita srivastav

Abstract

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Ajita srivastav

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अनजान सफर

अनजान सफर

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तन्हा कहीं हूँ मैं,

जाने पहचाने

अनजान चेहरों में,


खुद का वजूद

ढूंढ रही हूं मैं।

ना जाने इस सफ़र ने

कैसा रुख लिया है,


वजूद की जगह

खामोशी को भी

थाम दिया है।


अब तो,

जाने अनजाने,

अंदर ही अंदर

टूट रही हूं मैं,

तन्हा खड़ी हूं मैं।


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