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यात्रा - एक सुखद अहसास
यात्रा - एक सुखद अहसास
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© Maan Singh

Drama Inspirational

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एग्जाम देने के बाद वापिस घर आने के लिए जब ट्रैन में चढ़ा तो मेरे आगे आगे एक लड़की भी ट्रैन में चढ़ी जिसकी उम्र यही कोई 18 - 19 साल रही होगी, दिखने में बिल्कुल सीधी साधी सी लग रही थी। दोनों को ही ऊपर की बर्थ मिली थी जो पास पास ही थी।

रात 8:25 पर ट्रैन रवाना हो गयी। वातानुकूलित ट्रेन थी तो कुछ ही देर में ठंड महसूस होने लगी। सभी लोगों की तरह मैंने भी अपना बेडरोल जिसमें चद्दर, तकिया और ब्लेंकेट होती है, संबंधित अधिकारी से लिया और लेट के मोबाईल में गाने सुनने में मशगूल हो गया। मुझे हमेशा से विंडो सीट पर बैठकर पुराने हिंदी गाने सुनने का शौक रहा है, चूंकि यह रात्री सफर था सो मुझे अपनी सीट पर लेटना पड़ा। ट्रैन शहर के कई स्टेशनों से यात्रियों को लेती हुई शहर को पीछे छोड़ चुकी थी। पिछली रात में ट्रैन का सफर और दिन में एग्जाम, थकान मेरे शरीर को सोने पर मजबूर कर रही थी लेकिन मेरे कानों में बजता संगीत जैसे कह रहा हो की पूरी रात ऐसे ही गुजार दूँ।

रात 10 बजे तक लगभग लोग सो चुके थे या सोने की कोशिश कर रहे थे, बतियाँ बुझ चुकी थी, डिब्बे में केवल धीमी धीमी रोशनी आ रही थी जो किसी की नींद में बाधा उत्पन्न नहीं कर रही थी। मेरी आंखे भी अब भारी होने लगी थी, तो मैंने गाने बंद किये और सोने की तैयारी करने लगा ।

तभी मेरी नजर उस लड़की पर पड़ी, जो सीट पर सिकुड़ कर सो रही थी, उसने बैडरोल नहीं लिया था, बिस्तर के नाम पर उसके पास केवल एक पतली सी चद्दर थी, जिसमें सिमट कर वो ठंड से बचने की नाकाम कोशिश कर रही थी। चद्दर छोटी होने के कारण पूरे शरीर पर नहीं आ रही थी, कुछ कोशिशों के बाद उसने पैरों को मोड़ लिया ताकि पूरा शरीर ढ़क सके और यह तरीका ठंड से थोड़ी सी राहत भी देता है। संकोची स्वभाव के कारण उससे पूछ नहीं सका की क्यों उसने बेडरोल नहीं लिया, चूंकि उस ट्रैन में बेडरोल को सीट तक पहुंचाने की व्यवस्था नहीं थी, यात्री को खुद जाकर निर्धारित शुल्क देकर ( यदि उसने टिकट के साथ वो शुल्क नहीं दिया हो ) बेडरोल लेना था लेकिन उस लड़की ने नहीं लिया, शायद उसे इसकी जानकारी नहीं थी लेकिन उसने किसी से इसके बारे में पूछा भी नहीं और चुपचाप लेटी रही है जिससे मुझे इतना अंदाजा तो हो गया था की वो मुझसे भी ज्यादा संकोची है जो पूरी रात ठंड में काट लेगी लेकिन बेडरोल के बारे में पूछने की या जाकर उसे लाने की हिम्मत नहीं कर पाएगी और एक मासूम मेरे सामने पूरी रात ठंड में गुजारे, ये मेरे जमीर को भी मंजूर नहीं था।

उस वक्त उसकी हालत को मैं भली भांति समझ सकता था क्योंकि लगभग 3 साल पहले ऐसी ही एक घटना मेरे साथ हो चुकी थी जब मुझे जयपुर से उदयपुर जाना था, जनवरी का महीना था और मेरे पास भी केवल 1 चद्दर ही थी।

बदकिस्मती से मुझे बर्थ भी बिल्कुल दरवाजे के पास मिली, जो बार बार खोल दिया जाता था यात्रियों के चढ़ते और उतरते वक्त।

संकोची स्वभाव के कारण मैं किसी से पूछ भी नहीं पा रहा था कि किसी के पास अगर कोई अतिरिक्त चद्दर हो। वो रात मेरे लिए बहुत ही भयावह होती अगर मेरे सहयात्री, जो एक सेवानिवृत्त सैनिक थे, ने मेरी हालत को समझा और बिना मांगे ही एक कम्बल मेरी और बढ़ा दिया। मैं मना करने की हालत में तो बिल्कुल नहीं था, मैंने चुपचाप कम्बल लिया और उन्हें धन्यवाद बोला। बातचीत में पता चला कि हमारी मंजिल भी एक ही थी, उसके बाद से हम अच्छे दोस्त हैं।

आज मैं उस लड़की को मेरी जगह महसूस कर रहा था और वक्त था मुझे भी अपना फर्ज निभाने का लेकिन डर भी था की रात के 11 बजे जब सब सो रहे थे, किसी अनजान लड़की की मदद का कोई या खुद वो लड़की ही गलत मतलब ना निकाल ले।

दिमाग में चल रहे उस विचारों के तूफान में आखिर मैंने डर को दबाकर उस लड़की की मदद करने का निश्चय किया।

मैं बर्थ से नीचे उतरा, कोच से निकलकर अधिकारी से एक ब्लैंकेट ले लिया। लेकिन डर अब भी था की उसको दूँ कैसे। आखिरकार मैंने विचार किया कि ब्लेंकेट उसकी सीट पर रख देता हूँ जब वो देखेगी तो ले लेगी।

मैंने जैसे ही ब्लेंकेट उसके पैरों के पास रखी तो उसने गर्दन उठा कर मेरी तरफ देखा । नींद से जाग गयी थी या ठण्ड से सो ही नहीं पा रही थी, मैं उसके भावों को नहीं पढ़ पाया था क्योंकि वहां पर्याप्त रोशनी नहीं थी। उसके कुछ बोलने से पहले ही मैंने उसे चद्दर लेने का इशारा किया। वो शायद समझ नहीं पायी और उसी मुद्रा में मेरी तरफ देखती रही। मैंने फिर से इशारा किया और अपनी बर्थ पर लेटकर अपना ब्लेंकेट ओढ़ लिया। उसके बाद उसने भी धीरे से ब्लेंकेट लेकर ओढ़ लिया और सो गयी। मेरा अंतर्मन अब मुझे चैन से सोने की अनुमति दे चुका था और मैं कुछ ही पल में नींद के आगोश में समा गया।

सुबह जब आँख खुली तो उस सीट पर केवल वो ब्लेंकेट पड़ी थी, शायद हमारी मंजिल एक न थी।

लेकिन इन दो यात्राओं से मुझे इस बात का एहसास जरूर हो गया था की जरूरतमंद की मदद करने में जो आनन्द प्राप्त होता है वो अमूल्य होता है और अगर हम एक दूसरे की मदद करें तो यह दुनिया किसी स्वर्ग से कम नहीं होगी !

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