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फास्ट लाइफ
फास्ट लाइफ
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© Saroj Tiwari

Inspirational

7 Minutes   13.7K    9


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जोर की बरसात हो रही है, मैं दरवाजे पर कुर्सी पर बैठ कर काफी की चुस्कियां ले रही हूँ............बारिश की बूंदों की टिप _टिप की आवाज कानों में गूंज रही है............. बिलकुल सामने ही रोड है और रोड पर ढेर सारा पानी इकट्ठा हो चुका है। पानी का बहाव एक दिशा में बहता चला जा रहा है। आसमान से पानी की बूँदें गिर रही हैं और गिर कर पानी में मिल जा रही हैं। 

         मैं टकटकी लगाए उसे अपलक निहारे जा रही हूँ, पानी की बूँदें पानी में गिरती हैं उनमें बुलबुले उठते हैं और फिर जब बुलबुले फूट कर बिखरते हैं तो वह एक गोलाकार का रूप ले लेते हैं......... पहले वह छोटा फिर थोड़ा बडा फिर और बडा....... फिर वह आकार पानी में विलुप्त हो जाते हैं। ऐसे ही हजारों लाखों बूंदे गिरते हैं, बुलबुले बनते हैं और फूटते हैं फिर पानी में मिलते हैं और अंततः उसी में विलीन हो जाते हैं.......... कितना अच्छा लग रहा है यह दृश्य............. 

देखते ही देखते ना जाने कब मैं अपने अतीत में खो गई..........। 

उस रोज मैं कम्प्यूटर क्लास करके शाम के चार बजे घर वापस आ रही थी, तभी अचानक जोर की बारिश होने लगी थी............ कुछ दूर जाने के बाद अचानक मेरे कान में किसी की आवाज आई.......... एक्सक्यूज मी मैडम..... मैंने चौंक कर पीछे मुड़कर देखा......... एक खूबसूरत नौजवान लडका था। वह बोला, यदि आप बुरा न माने तो आप मेरी छतरी के अन्दर आ सकती हैं।..... नो थैंक्स कहते हुए मैं परे हट गई। फिर वह बड़ी ही शिष्टाचार के साथ बोला। 

आप को कहां जाना है ? 

करोल बाग... मैंने कहा 

करोल बाग में कहां जाना है? 

उसने पूछा............. 

बस स्टॉप से बस पांच मिनट का रास्ता है......... 

मैंने कहा, 

फिर तो अच्छा है, 

मैं भी वहीं रहता हूँ.......... 

उसने कहा, 

आप मेरी छतरी ले लीजिए, 

मैं ऐसे ही चलता हूँ..... 

उसने कहा , 

अरे नहीं ठीक है, वैसे भी मैं काफी भीग चुकी हूँ, 

नहीं _नहीं आप मेरी बात मानिए छतरी ले लीजिए , क्योंकि ज्यादा भीगने से आप की तबीयत खराब हो जाएगी। 

मैंने कहा नहीं मुझे भिगना अच्छा लगता है, और फिर मैं भीग चुकी हूँ फिर छतरी लेने का क्या फायदा? 

ठीक है फिर मैं भी आप के साथ भीगता हुआ चलूँगा, कहते हुए उसने अपनी छतरी बंद कर दी। 

फिर हम साथ _साथ चलने लगे। 

आप का नाम क्या है ? 

उसने पूछा.... 

जी अंकिता.... 

मैं हिचकिचाते हुए बोली, 

आप कहां से आ रही हैं, और क्या करती हैं? 

उसने जैसे सवालों की बौछार लगा दी, 

मैं कम्प्यूटर सेन्टर में कम्प्यूटर कोर्स कर रही हूँ...... और एम. ए. प्रथम वर्ष की पढ़ाई कर रही हूँ , मैं कम्प्यूटर क्लास करके ही आ रही हूँ....... 

आप के पिता जी क्या काम करते हैं ? 

उसने पूछा..... 

मेरे पिता जी रेलवे में हेड कलर्क हैं, 

आप के घर में और कौन _कौन रहता है ? 

मेरे घर में मेरी मम्मी पापा, मैं और मेरे दो भाई बहन रहते हैं...... वह सवाल करे उससे पहले मैं खुद ही बताने लगी... मुझसे छोटा भाई है जो नवीं क्लास में पढता है, उससे छोटी बहन है जो सातवीं कक्षा में पढ़ती है। 

...............अच्छा ठीक है चलिए हमारी मंजिल आ गई। 

मेरा मतलब है आप का घर आ गया, वैसे आप का घर कहां है  ? 

मैंने पूछा....? 

यहाँ से दश मिनट का रास्ता है, 

उसने कहा, 

फिर मैं अपने घर चली गई। 

..........................बेटा अंकी तू तो बुरी तरह भीग गई है....... क्यों नहीं कम्प्यूटर सेन्टर में ही थोड़ी देर रुक गई, बारिश थम जाती तो आती..... 

माँ मैं सेन्टर से निकल चुकी थी और फिर पता नहीं कब तक बारिश थमती, फिर अंधेरा हो जाता, इस लिए मैं भिगती हुई आगई। 

ठीक है तू जल्दी से कपड़े बदल ले मैं तेरे लिए अदरक वाली चाय लेकर आती हूँ। 

ठीक है....... 

बोल कर मैं चेंज करने चली गई....... 

फिर चेंज करके मैं  ड्राइंगरूम में आ गई और बैठकर चाय की चुस्कियां लेने लगी........ चाय पीते _पीते मैं उसके बारे में सोचने लगी......... 

अरे ! मैंने तो उसका नाम तक नहीं पूछा...? वह क्या करता है ? या उसके परिवार के बारे में...... भी तो कुछ नहीं पूछा.....? 

जब कि वह मेरे बारे में सब कुछ जान लिया। 

......................दीदी, दीदी मेरा होमवर्क करवा दो ना रिया बोली......... 

मेरी छोटी बहन जो सातवीं में पढ़ती है।........... फिर मैं रिया का होमवर्क करवाने लगी.............. 

रिया का होमवर्क करवाने के बाद... मैं अपनी प्राचीन इतिहास की नोट्स तैयार करने लगी, पढ़ाई खत्म करके मैं पापा, आदर्श (मेरा छोटा भाई) और रिया खाना खाये फिर टहलने निकल गए...... सब साथ में, घर आने के बाद हम सब सो गए। 

सुबह उठकर नहा धो तरोताजा होकर तैयार हो रिया और आदर्श स्कूल के लिए निकल पड़े और पापा आफिस चले गए। मैं भी कालेज चली गई। 

मेरी फ्रेंड सुनिधि ने पूछा तुम्हारा हिस्ट्री नोट्स तैयार हो गया क्या ? 

मैंने कहा हाँ हो गया है, 

मुझे भी, दे देना.... 

सुनिधि ने कहा,...... 

..........................................

कालेज से घर वापस जा रही थी तो मुझे याद आया कि मुझे स्टेशनरी से दो लांग नोट बुक लेना है, आदर्श के लिए जामेट्री बाक्स, रिया के लिए पेंसिल इरेजर और सापनर लेना है........,सो स्टेशनरी की दुकान पर चल दी। 

वहां मैंने वो सारी चीजें मांगी जो मुझे चाहिए थी, दुकानदार मुझे सामान दे ही रहा था कि............. पीछे से आवाज आई........ भाईसाहब एक मार्कर एक जेल पेन और एक बाल पेन देना। 

मैं सामान लेकर जाने के लिए पीछे मुड़ी तो देखती हूँ कि वह..... आदमी खड़ा है जो मुझे कल बारिश में मिला था.....। दुकानदार उसे सामान देने लगा....... वह मेरी तरफ चिरपरिचित सा मुस्कराता हुआ, देखा...... मैंने भी छोटी सी स्माइल दी और चलती बनी। 

तीसरे दिन मैं कम्प्यूटर क्लासेज से आ रही थी तो वह रास्ते में फिर मिला.... 

वह अपनी बाइक पर सवार था और उसने मुझे लिफ्ट के लिए पूछा मैंने इनकार कर दिया। उसके बाद वह चार दिन तक नजर नहीं आया। चार दिन बाद वह फिर रास्ते में मिला उस दिन वह पैदल था और मैं भी पैदल ही थी, सो वह साथ _साथ चलने लगा। 

उसने पूछा आप कहां रहती हैं? 

और क्या करती हैं? 

मैं ने आप को बताया तो था कि मैं करोल बाग में रहती हूँ और एम ए की पढ़ाई कर रही हूँ, साथ में कम्प्यूटर क्लास भी ज्वॉइन कर ली हूँ...... तुरंत ही मैंने सवाल किया आप कहां रहते हैं और क्या करते हैं ? 

मैं भी करोलबाग में ही रहता हूँ, 

उसने कहा............... 

अपनी बात जारी रखते हुए उसने कहा........ मैं लखनऊ का रहने वाला हूं, यहां आई सी आई सी आई बैंक में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत हूँ। यहाँ पर एक अपार्टमेंट में रेंट पर रहता हूँ, लखनऊ में मेरे एक रिश्तेदार की शादी थी तो चार दिन के लिए लखनऊ गया हुआ था। 

मैंने कहा मैंने तो आप का नाम भी नहीं पूछा और ना ही आप ने बताया। 

जी! मेरा नाम आदित्य सक्सेना है। हम दो भाई एक बहन हैं। बहन की शादी हो चुकी है और भाई गाजियाबाद में विप्रो कम्पनी में कार्यरत है। 

...............................................

बाद में मुझे पता चला कि आदित्य का घर मेरे घर से सौ मीटर की दूरी पर ही था।..................... 

अब तो आदित्य अक्सर मिलने लगा था और हम दोनों के बीच काफी बातें होती थी, हम दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे थे.......... एक दिन आदित्य अपने माता पिता के साथ मेरे घर आया मेरे मम्मी पापा से उसके मम्मी पापा ने मेरा हाथ मांग लिया। 

मेरे पापा को घर बैठे बिठाए एक कमाऊ और अच्छा लड़का मिल गया। 

पापा ने उसके घर जाकर सब पता कर लिया कि सब ठीक ठाक है। पापा वहां से आश्वस्त होकर लौटे, फिर मेरी शादी आदित्य के साथ हो गई। 

पांच महीने में ही सबकुछ हो गया, मेरा आदित्य से मिलना प्यार और शादी...........। 

मैंने शादी के बाद एम ए कम्पलीट करके टीचर की नौकरी कर ली। 

..........शादी के एक साल तक तो सब कुछ ठीक ठाक रहा, लेकिन दुसरे साल से ही हमारे बीच झगड़े होने शुरू हो गये।............ एक साल तक झगड़ा, मन मुटाव इतना बढ़ गया कि दो साल बाद हम किसी कीमत पर एक साथ रहने के लिए तैयार नहीं थे। 

एक दिन तो हद ही हो गई जब आदित्य बहुत ज्यादा ड्रिंक करके मुझसे झगड़ने लगा और मुझे निर्दयता के साथ पीटा मेरे नाक से खून बहने लगा था सिर भी फट गया था मैं डाक्टर के पास जाकर दवाएं ली और फिर उसके बाद मैं आदित्य से अलग हो गई। 

..............मैं अपने मम्मी पापा पर बोझ नहीं बनना चाहती थी, अतः मैं दिल्ली में एक फ्लैट में रहने लगी अब तक मैं बीएड भी कर चुकी थी फिर मैं टीचर की नौकरी ज्वॉइन कर ली। 

...........................मैंने फिर दुसरी शादी नहीं की................ आदित्य की कमी मुझे टीस देती है........लेकिन... अपने ऊपर मैंने काम का बोझ इस कदर लाद दिया कि खाली वक्त मुझे न मिले रात तक थक जाती और थक कर सो जाती और सुबह होते ही फिर वही काम का सिलसिला शुरू हो जाता........................................................... ............................ 

काफी खत्म करते हुए मैंने सोचा सबकुछ कितना फास्ट हुआ............. 

हमने जल्दी कर दी या आज कल लाइफ ही इतनी फास्ट है? 

बीस साल हो गए मुझे आदित्य से अलग हुए............ लेकिन ऐसा लगता है जैसे कल ही की बात हो...... 

............मेरी जिंदगी में आदित्य इन बूंदों की तरह आया और गुमनामी की पानी में खो गया.........।।।।।।। 

फास्ट लाइफ

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