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हसीना की चाय
हसीना की चाय
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© आदित्य श्रीवास्तव

Drama

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ठंडिया बिलकुल समाप्त हो चुकी थी लेकिन मौसम गर्म बिलकुल भी नहीं था। ये रात का समय था १२ वीं कक्षा का बोर्ड का इम्तेहान बस शुरू ही होने वाला था। मेरे जैसे ज्यादा मेहनतकश बच्चे अक्सर इन दिनों की रातों में जाग-जाग के उन्हें और काला करते हैं। मैं भी पढ़ाई के मामले में विशेष बच्चों की श्रेणी में ही आता था। एक बात जिसने मुझे पढ़ाई से अलग नहीं होने दिया वो सिर्फ और सिर्फ पिताजी के द्वारा होने वाली पिटाई थी।

हम ऊपर की मंजिल पे रहा करते और जब कोई बाहर से हमारे यहाँ आता तो सीढ़ियों से होकर आने वाली आवाजों से हमें पहले ही पता चल जाता।

रात के करीब २ बज रहे होंगे और मेरी किताब भी हाथ जोड़कर मुझ से सो जाने का आग्रह कर

रही थी। अचानक से मेरे ऊँघने का क्रम टूट गया जब मुझे ये लगा की कोई हमारी सीढ़ियों से कभी ऊपर और कभी नीचे की तरफ जा रहा था। मुझे इस बात का शक था कि कोई चोर हो सकता है। हालांकि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मैं जगा हुआ ही था। फिर मुझे किसी के रोने की दबी सी आवाज़ सुनाई दी।

ये कोई दो बच्चियां थी। अभी मैं समझ ही पाता तभी मेरे घर के दरवाजे पर किसी के अनचाहे मन से की गई हल्की सी दस्तक हुई। मेरी माता जी अपने समय की और माताओं की तरह पक्की उत्तरदायी माँ थी और कायदों के प्रति बड़ी कठोर परन्तु नींद उनकी उतनी ही कमज़ोर। दस्तक दुबारा होने को सोच भी पाती उस से पहले ही उन्होंने दरवाज़ा खोल दिया।

शबाना ! क्या हुआ बेटा उनके मुँह से अचानक ही निकला। आंटीजी, मम्मी की तबियत बहुत ज्यादा ख़राब

हो गई है। कोई कुछ बोलता बताता नहीं। अब तो मम्मी भी कुछ बोल नहीं रही है। कुछ समझ में नहीं आता की हम क्या करें।

मैंने जब ये आवाज़ सुनी तो अचानक ही सब कुछ साफ साफ़ सा होने लगा। मुझे याद आया की हसीना आजकल कई दिनों से काम पे नहीं आई। अच्छा तो वो बीमार है ! परन्तु इतनी की काम पे नहीं आ सकी। वो तो समय की बड़ी पक्की थी। इसका मतलब ये नहीं था कि वो बीमार थी पर मेरे लिए इसका मतलब था की वो बहुत ज्यादा बीमार थी।

माताजी ने उसे समझाया की अभी काफी रात हो चली है और उनके लिए अभी अस्पताल जाना उचित

नहीं होगा परन्तु एक बात जो मैंने बड़ी सूक्ष्मता से पकड़ी वो थी उनकी आवाज़ में अपनेपन का अहसास था। वो

बोल तो रही थी की उनका जाना अच्छा नहीं परन्तु फिर भी उनकी आवाज़ में एक डर और पश्चाताप का मिश्रण मैंने देखा।

मैंने काफी गहराई से ये अनुभव किया की वो शबाना के साथ जाना चाहती थी पर जा नहीं रही थी। उनकी बातें होती रही और मैं अपने अवचेतन मन में हसीना के बारे में सोचने लगा।

कई सालों से वो हमारे घर पे काम कर रही थी। माताजी का बड़ा भरोसा भी उसने जीत रखा था। पहले वो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं थी क्योंकि सुबह-सुबह वो आ जाया करती और तब तक काम शुरू नहीं करती जब तक की माताजी उसे स्टील के गिलास में भर के चाय न दे देंI रोज वो माता जी से लड़ा करती- आप तो बस दूध कम डाल देती हैं चाय में, पैसे बचाने के लिए। अरे, सुबह की चाय तो अच्छी बनाया करिए दीदी !

रोज वो चाय ये दूध के लिए लड़ती और सुबह-सुबह फिर से सुबह हो जाया करती। हसीना की ये चाय कई साल मेरे लिए सुबह की दुखदायी अलार्म का काम करती रही। वो हर बार चाय की एक लम्बी चुस्की लेती, सुडुक की आवाज़ आती और दो बार जीभ की चप-चप की आवाज़ आती। ये आवाज़ कई सालों तक लगभग हर दिन मुझे सुनाई पड़ती रही। जब मैं बच्चा था तो वो मुझे बुरी लगती थी पर जैसे-जैसे मैं बड़ा होने लगा मुझे स्वयं को ये नहीं पता चला की मैं उसका आदी हो चुका था। इधर के कुछ एक महीनों में जब ठंडिया थी तो वो बड़ी जल्दी आ जाया करती और माँ से कहती की चाय में दूध ज़रा ज्यादा डाला करें। जब तक उसकी चाय बनती तब तक वो मुझे जगा चुकती। बड़े प्यार से बोलती- बाबू उठिए सुबह हो गई और मै उठ जाता, अक्सर बातों-बातों में बताती की उसका निकाह लखनऊ में हुआ था।

शायद तभी उसकी जुबान में चाशनी थी। मैं बैठा उसकी बातें सुना करता। कभी अपने पुराने दिनों के बारे में

बताती कि कैसे उसकी बारात में ६०० बाराती गए थे और बहुत बड़ा मजमा लगा था। कभी बताती की उसके ससुर के लखनऊ में बड़े ठाट थे। शायद कारण यही था की मैंने उसे कभी कुछ माँगते नहीं देखा। कुछ था उसमें जो उसे औरों से अलग बना देता था।

सब कुछ ठीक था। वो भी हमारे परिवार का हिस्सा सा हो चली थी जो कई सालों से हमारे यहाँ काम कर रही थी और अच्छा काम कर रही थी। छोटे शहरों के मध्यमवर्गीय परिवारों में अक्सर अभी भी यही चलता है। नौकर भी परिवार का एक सदस्य हो ही जाता है और यही इन शहरो और परिवारों की खास बात है।

दिन ठीक ही चल रहे थे, हसीना समय पे आ जाती उससे बातें भी होती लेकिन इधर कुछ दिनों से वो गुमसुम रहने लगी थी और उम्र से थोड़ी बड़ी भी लगने लगी थी। अक्सर बातें छेड़ के वो खुद ही गुमसुम हो जाती

और कई बार तो उसकी चाय हाथों में ही ठंडी हो जाती क्योंकि वो उसे पीना ही भूल जाती। मैंने माताजी से पूछा भी पर उन्होंने इस बात से ज्यादा नहीं बताया की उसके घर में दो बेटियां हैं और उनकी वितीय हालत सही नहीं

है। वो कभी कुछ माँगती नहीं थी पर अक्सर माँ उसे कुछ पैसे और खाने की चीज़े दे दिया करती।

हमारे पिताजी ने जीवन में काफी मशक्कत करी और जो भी व्यक्ति ऐसा होगा संभवतया उसका भी इन सब घटनाओं के प्रति वही रूप होता जो उन्होंने दिखाया। उन्होंने माता जी को हसीना की सहायता करने से ये कह कर मना कर दिया को वो और भी ४ या ५ घरों में काम करती है पर कोई भी उसकी सहायता को आगे नहीं आता। इस बार भी उसे अस्पताल ले जाने में लोगों को शर्मिंदगी का अहसास हुआ। वो तो माताजी उसे डॉक्टर के पास ले गई वरना उसे तो दवा के लिए भी तरसना पड़ता।

अभी मैं ये सोच ही रहा था की मेरी तन्द्रा शबाना की एक ज़ोरदार सिसकी से टूट गयी। मैंने सुना माताजी कह रही थीं- देख शबाना बेटा, मैं तेरे साथ नहीं चल पाऊँगी पर तू ये हज़ार रुपये रख ले पर अब कृपया कर के मेरे

पास नहीं आना। शबाना रोई और चुप हो गई, शायद उसे अनहोनी का अंदेशा हो गया था। उसने

पैसे लिए और चुपचाप सीढ़ियों से नीचे उतर गई। माँ ने उसे पीछे से कहा- "देख बेटा अगर तेरी माँ को कुछ हो जाए तो ये पैसे किसी को मत देना, बोल देना तेरे पास नहीं हैं।"

मैं दौड़ के अपनी बालकनी में गया ताकि उसे जाते हुए देख सकूँ। एक थोड़ी कम छोटी बच्ची एक बहुत छोटी बच्ची का हाथ पकडे स्ट्रीट लाइट के उजालों से होते हुए अंधेरों में गुम हो गई। बड़े ठंडे सुस्त और निपट अकेले कदमों के साथ।

उजाले और अँधेरे किसी के रोके नहीं रुकते। सुबह होनी थी सो हो ही गई। मेरे इम्तेहान थे इसलिए मैं जल्दी-जल्दी तैयार होकर स्कूल के लिए निकला। सब कुछ बड़ा सामन्य सा था वही मनहूस गणित का परचा, वही

कम तैयारी और वही डर। स्कूल के रास्ते में हॉस्पिटल भी पड़ता था ये भी एक सामान्य बात थी लेकिन आज वहा असामान्य भीड़ देख के मैं रुक गया।

भीड़ पार कर के जब मैंने झाँका तो एक बार तो दिमाग सन्न सा रह गया।

वहाँ हसीना ज़मीं पे लेती हुई थी बिलकुल पीली सुखी हुई सी। कोई पीछे से बोल रहा था- बेचारी भूख से मर गई।

डॉक्टर ने बताया की जब वो हॉस्पिटल पहुँची तब उसके शरीर में खून था ही नहीं। मुझे शबाना का ख्याल आया मैंने उसे खोजा। पूरी भीड़ में वो नहीं दिखी, शायद उसे माँ की बात समझ में आ गई थी। उन हज़ार रुपयों से उसका कुछ तो भला हो ही जाएगा, वैसे भी उस शरीर का बच्चे क्या करते जो उनकी माँ भी छोड़ के चली गई थी। मुझे लगा एक बार हिला के पूछूँ- हसीना, चलो माँ से बोल के तुम्हें खूब सारी दूध की चाय पिलाता हूँ। ऐसा लगा आज की चाय हसीना ने मुझ पर उधार रख छोड़ा हो जो कभी चुकता नहीं हो पायेगा पर क्या करता ! मुझे बड़ा आदमी बन जाना था।

गणित का परचा देना था। मैं आगे बढ़ गया पैर थे के रुक-रुक से जाते थे ऐसा लगा की मेरी कई सुबहें पेड़ से सूखे पत्तों की तरह सड़क पे गिर गई हो बिल्कुल पीली बेजान और बिना किसी रिश्ते के बस हवाओं की मुहताज ....

(एक सत्य घटना जैसी की तैसी)

चाय सुबह बीमार

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