" अपने "

" अपने "

6 mins 14.2K 6 mins 14.2K

 

सुबह से बेचैन रूह को लिए घूम रहा हूँ। सपनों के ख़ारिज होने का भय, साँसें छीन रहा है। बूढा शरीर जीवन की मार को झेल नहीं पा रहा। साँसों की नैया हिचकोले खाती हुई किनारा ढूंढ रही है। सफ़र अब अकेले तय करना है, यह तय है। अपनों का साथ अब छूट चुका है। अब तो दरवाज़े की महीन-सी की घंटी भी मुझे भयंकर लगने लगी है। जानता तो हूँ, कि अब इस दरवाज़े पर कौन आएगा। फिर भी इस आस में पूछ लिया करता हूँ कि शायद जवाब कुछ और हो जाए। पर नहीं, भूल गया था कि किस्मत ने अपना पासा फेंक दिया है और मैं व्यर्थ ही उसके पलटने की उम्मीद लगा बैठा हूँ।

‘अंदर आ जाओ।’

सफ़ेद कमीज़-पेंट, काला-चमकदार कोट, काले चमड़े के जूते और हाथ में काला बैग लिए एक नौजवान ने घर की दहलीज़ को लांघा। भीतर आया और क़ानूनी काग़ज़ दिखाने लगा।

‘देखिए मुझे बिल्कुल-भी अच्छा नहीं लग रहा है, पर क्या करूँ ना चाहते हुए भी मुझे अपने क्लाईंट की बात माननी होगी और आप दोनों को..’

‘जो तुमसे कहा गया है तुम वही करो। जब हमारे अपनों को इस बात से कोई फ़र्क नही पड़ता तो तुम्हें भी नहीं पड़ना चाहिए। बताओ, कब जाना है हमें अपना घर छोड़ कर।’ कपूर साहिब ने भावनाओं के भंवर से बाहर निकल कर काले कोट वाले से पूछा।

‘जी, आज शाम तक का समय मिला है।’ कानून का नुमयिन्दा धीमी आवाज़ में बोला।

‘ठीक है। आज शाम तक तुम्हें घर खाली मिल जाएगा।’

‘चलता हूँ।’

उसके चले जाने के बाद कपूर साहब और उनकी पत्नी निर्मला घर के बरामदे में बैठकर फूट-फूट कर रोने लगे। इस उम्र में बच्चे माँ-बाप के बुढ़ापे का सहारा बनते हैं, परन्तु कपूर साहब के बच्चों ने उनसे इकलौती छत का सहारा भी छीन लिया। माँ-बाप यह सोच कर बच्चों की परवरिश में जीवन लगा देते हैं कि कल को यही परवरिश कम से कम हमें दो वक़्त की रोटी तो दे पाए। परन्तु ...

‘हमारे बच्चों ने हमें एक ऐसे रासते पर ला छोड़ा है, जहाँ दोनों तरफ गहरी खाई है। न जाने क्या कमी रह गयी थी हमारे प्यार में, जो आज यह परिणाम भुगतना पड़ रहा है। बच्चों की हर ख्वाहिश को अपना कर्म धर्म सब माना, उनके लिए दिन- रात जी-तोड़ मेहनत की तांकि कोई गम उन्हें छू भी न पाए। और आज, आज उन्होंने हमें ही दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मज़बूर कर दिया है। जब हमारी लाठी बनने का समय आया तब सभी ने अपने हाथ पीछे खींच लिए। अब तो छत भी छीन ली गयी है। ऐसी औलाद से तो भगवान हमें बेऔलाद ही रखता।’

‘न मलकायन, न... हमारे बच्चों ने तो हमें वह शिक्षा दी है जो किसी भी पाठशाला में नहीं दी जाती। उनहोंने यथार्थ का वह आईना दिखाया है, जिसकी हम प्यार के अंधों ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। यही सोच कर सब कुछ उनके नाम किया था कि इनके सिवा हमारा है ही कौन। आज इन्हीं अपनों का तिरस्कार, उपहार रूप में मिल रहा है। ज़िन्दा रह कर भी ज़िन्दा नहीं हैं हम। जब तक धन-दौलत सब हमारे पास था तब तक ये सब भी हमारे अंग-संग ही मंडराते रहते थे। सब पैसे का खेल है मलकायन। पैसा ही माई-बाप है इनका। जिनके लिए हमने अपना सब कुछ दाव पर लगा दिया, आज वही हमें दाव पर लगा कर चले गए।’

कपूर साहब और उनकी पत्नी निर्मला अपने जीवन का अंत तलाशते हुए एक-दूसरे का सहारा बने।

‘आज शाम तक का समय है साहब। क्या हम कुछ नही कर सकते ? कोई तो रास्ता होगा हमारे घर को बचाने का।’

‘नही मलकायन। हमारे अपनों ने हमें दुःख के एक ऐसे कुँए में धकेला है, जहाँ उम्मीद की कोई भी किरण नहीं दिखाई दे रही।’

मैं अक्सर यह सोचा करता था कि वे कैसे परिवार होते होंगे जहाँ माँ-बाप को दहलीज़ के परे रखा जाता है। क्या माँ-बाप अपना फ़र्ज़ सही से नहीं निभा पाए होंगे ? परन्तु जब नज़रें अपने ही घर की तरफ मुडती हैं तो यकीन हो जाता है कि कमी परवरिश में नहीं, बल्कि बच्चों को पढ़ाने में है। हमने अपने बच्चों को उच्चतम शिक्षा का आशीर्वाद दिया और उनहोंने ने हमें घर निकाला। शायद उनकी शिक्षा यही कहती है।

साथ के घर वाले चौधरी जी और उनकी पत्नी ने दरवाज़े पर दस्तक दी।

‘कपूर, अंदर आ सकता हूँ।’

‘हाँ, चौधरी आजाओ।’

चौधरी साहब और उनकी पत्नी दोनों ने भीतर प्रवेश किया।

‘मैं जानता हूँ कपूर तेरे बच्चों ने क्या किया है। मैं शुरू से ही तुझे समझाता रहा हूँ, कि कुछ अपने पास भी रख ले, पर तू नहीं माना। तुझे अपने बच्चों पर अँधा-विश्वास था। देख लिया उसका नतीजा। आज तुम्हें तुम्हारे ही घर से बेघर कर दिया गया है। पता नहीं ये बच्चे चाहते क्या हैं हमसे। माँ-बाप अपना पूरा जीवन इनकी परवरिश में लगा देते हैं। इनके भविष्य को सवारने में लगा देते हैं परंतु यह नहीं जान पाते कि इनके भविष्य में हमारा ही कोई स्थान नहीं होता। अपने सुख को भूल कर इनकी सुविधाओं का ध्यान रखते हैं। खुद गीले में सोते हैं और इन्हें सूखे में सुलाते हैं। रात-रात भर जागते हैं इनकी खातिर। इनके थोड़े से ताप पर माँ-बाप की साँसें रुक जाती हैं। लेकिन ये हमें हर मोड़ पर ठोकर मारते हैं। माँ-बाप हर तरह से इनका ध्यान रखते हैं। इनके लिए दुआएँ माँगते नहीं थकते। और ये... छी…’  

‘समझ नहीं आ रहा कि हमसे कहाँ कोई भूल हो गयी कि हमारे बच्चों ने..’ कपूर साहब की पत्नी निर्मला, चौधरायन के गले लग कर फूट-फूट कर रोने लगी।

‘देख कपूर हम बहुत सालों से एक-दूसरे के हमदर्द हैं। मेरी हर परेशानी में तूने मेरा हौंसला बढाया है। मेरे दुःख को अपना दुःख माना है। आज तुझे एक हक़ से अपने साथ ले जाने आया हूँ। तू मेरे साथ मेरे घर चल। मेरा घर इतना बड़ा तो नहीं है, पर तुझे यह विश्वास दिलाता हूँ कि वहां सभी तेरे अपनें होंगे। एक कमरा, एक रसोई है, पर हम गुज़ारा कर लेंगे दोस्त। मना मत करना।’

‘ना चौधरी, हम अपना बोझ तुझ पर नहीं डाल सकते। अपनों ने हक़ीक़त का आईना दिखाया है अब हम हक़ीक़त में ही जियेंगे।’

‘चुप कर कपूर। जानता हूँ मैं तू बहुत खुद्दार है। अपनों पर तो तूने खूब विश्वास किया। एक बार गैरों पर भी भरोसा करके देख ले। सच कहता हूँ यार, शिकायत का एक भी मौका नही दूँगा।’

चौधरी का अपनापन देख कर कपूर साहब उनके गले लग कर खून के आँसू रोए। जिस अपनेपन को वह आजीवन ढूँढते रहे। वह जीवन के इस पढाव में आ कर कुछ इस तरह से मिलेगा सोचा न था। कहते हैं इंसान सब खोकर अपनों को पाता है। सही कहते हैं।

‘थपक थपक...’ दरवाज़े पर फिर से एक थाप सुनाई पड़ी।

‘हमें इमारत गिरानी है। आप सभी यहाँ से चले जाएँ।’

‘नही, मैं इसे गिरने नही दूँगी। यह कोई इमारत नहीं हमारा जीवन है और मैं हमारे जीवन को यूँ बिखरने नहीं दूँगी। एक-एक ईंट मेहनत की है हमारी। ये कमरे, खिड़कियाँ, दरवाज़े बात करते हैं मुझसे। जब कोई हमारा हाल नहीं पूछने आया तो इन सभी ने हमारा साथ दिया है। नहीं... मैं ऐसा नहीं होने दे सकती। कभी नहीं... नहीं, मैं ऐसा नहीं होने दूँगी..’

‘मैं जानता हूँ मलकायन, सब जानता हूँ पर हमारा और इसका साथ यहीं तक का था। यही तक का। हमें जाना होगा मल्कायन.. जाना होगा.. चलो...’

चौधरी जी ने अपनी पत्नी से निर्मला जी को संभालने के लिए कहा।

‘चलो बहन। चले यहाँ से।’

ना चाहते हुए भी निर्मला जी ने अपने कदम बाहर दहलीज़ की ओर बढ़ाए। दिए गये समय से पहले ही कपूर साहब ने वह घर छोड़ दिया। घर की दहलीज़ को लाँघते समय निर्मला जी ने एक बार पीछे देखना चाहा, क्या खबर कोई आवाज़ ही दे दे। पर उनका यह भ्रम टूटते ज़्यादा देर नहीं लगी। किसी ने भी उन्हें नहीं पुकारा। दहलीज़ की दोनों तरफ कदमों में यही द्वन्ध छिड़ा रहा कि वे भीतर लौट आए या फिर हमेशा-हमेशा के लिए आगे बढ़ जाएँ…

 

 


Rate this content
Originality
Flow
Language
Cover Design