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क्या खोया क्या पाया
क्या खोया क्या पाया
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© Renu Gupta

Children Drama Inspirational

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अमेरिका के लिए उड़ान भरने को तैयार पुरवा का हवाई जहाज रनवे पर तीव्र गति से दौड़ रहा था, और उसके साथ उसका दिल भी तेजी से धडक़ उठा था। उसकी जिंदगी की एक नई शुरुआत होने जा रही थी। उसने न जाने कितने पल इस क्षण की प्रतीक्षा में बिताए थे। रनवे की रेस खत्म होते ही हवाई जहाज तेजी से ऊपर उड़ चला था।

लगभग 15 घंटों की हवाई यात्रा के उपरांत पुरवा अपनी दो सहेलियों के साथ न्यूयोर्क के अपने फ्लैट में पहुँच गई थी। सोच-सोच कर उसे घबराहट हो रही थी, वह सात समुंदर पार करके इस अनजाने अचिन्हे देश पहुँची थी। माँ-पापा की याद शिद्दत से आ रही थी। जैट लैग से उसके पूरे शरीर में अजीब सी अनुभूति हो रही थी। नींद की वजह से उसकी आँखें अत्यंत बोझिल हो रही थीं, लेकिन वह थी कि उससे रूठी हुई थी। पलकों की कोरों तक आकर तत्क्षण ही वापिस लौट जाती थी, उसे अपनी वर्तमान परिस्थिति पर गंभीर चिंतन का अवसर देते हुए। बार-बार उसकी आँखों के सामने आ रही थी-जोरों से उमड़ती रुलाई के वेग को नियंत्रित करते हुए वृद्धावस्था की ओर अग्रसर ममता, वात्सल्य की प्रतिमूर्ति माँ और आँखों ही आँखों में आँसू पीते पनीली आँखों को भरसक छिपाने का प्रयास करते पिता की शक्लें।

और घंटों तक वह उनके स्नेहसिक्त व्यवहार के बारे में सोचती रही थी। सुदूर विदेश आकर प्रौढ़ावस्था से वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाते माँ-पापा को अपने बिछोह का दु:ख देकर उसने ठीक किया या गलत, मस्तिष्क इस विषय पर तार्किक रूप से सोच पाने में असफल था। मानसिक ऊहापोह की इस स्थिति से निजात पाने कब वह नींद की गोद में समा गई थी, उसे भान तक न हुआ था।

पुरवा धीरे धीरे अमेरिका के नए वातावरण में रमती जा रही थी। वह भारत से इंजीनियरिंग करने के बाद मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री-एम.बी.ए करने वहाँ आई थी। एम.बी.ए की पढ़ाई अत्यंत श्रम साध्य थी। कैसे प्रोजेक्ट, फील्डवर्क, कक्षा अध्ययन में उसका सारा दिन बीत जाता, उसे पता तक नहीं चलता। उसकी यूनिवर्सिटी में लगभग दो सौ भारतीय विद्यार्थी थे। अपने हँसमुख, बिंदास मजाकिया स्वभाव के कारण वह शीघ्र ही सभी भारतीय विद्यार्थियों के मध्य बेहद लोकप्रिय हो गई थी। इस कारण अध्ययन के अतिरिक्त उसका अच्छा खासा वक्त अनेक अतिरिक्त गतिविधियों में बीत जाया करता था। माँ-पापा के सामने स्काइप पर आमने-सामने वीडियो चैटिंग कर उसे बेहद संतुष्टि मिलती थी। लेकिन उनके साथ समय के अभाव के कारण कभी भी अच्छी तरह से देर तक बातचीत नहीं हो पाती। सो यूँ ही अध्ययन, पार्ट टाइम नौकरी, प्रोजक्ट, विभिन्न मॉल की सैर, घर-गृहस्थी के कामों में एम.बी.ए. के दो वर्ष कैसे पूरे होने आए थे, उसे आभास तक नहीं हुआ था। दस मई को उसके कॉलेज का दीक्षांत समारोह था। अपनी पार्टटाइम नौकरी के पैसे बचा-बचा कर उसने माँ-पापा के न्यूयोर्क आने की टिकिट खरीद कर उन्हें भेज दी थी।

कॉलेज का दीक्षांत समारोह बहुत अच्छी तरह सम्पन्न हो गया था। औपचारिक गाउन में पुरवा ने शहर के मेयर के हाथों अपनी डिग्री प्राप्त की थी। माँ-पापा अपनी साँवली सलोनी देवकन्या सी प्यारी सी बिटिया को डिग्री प्राप्त करते देख फूले न समाए थे।

इसके कुछ दिनों बाद ही पुरवा की नौकरी एक अत्यंत प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कम्पनी में लग गई थी। जहाँ उसे बहुत बढिय़ा वार्षिक पैकेज मिला था। दीक्षांत समारोह के उपरान्त पुरवा माँ-पिता के साथ कुछ दिनों के लिए जयपुर लौट आई थी। माँ व पापा हर आने-जाने वाले से बेटी की उच्च शिक्षा और बढ़िया नौकरी के बारे में फख्र से बताते। पुरवा माँ का गर्व थी, तो पिता की शान।

पुरवा विवाह योग्य हो गई थी। माँ-पापा जोरों-शोरों से उसके लिए उपयुक्त वर तलाशने में लगे थे। कुछ ही समय में उनका प्रयास रंग लाया था और उन्हें हर मामले में पुरवा से इक्कीस, उससे मेल खाता सुशील, सुदर्शन, अमेरिका के अति प्रतिष्ठित कॉलेज से एम.बी.ए. किया हुआ इंजीनियर वर मिल गया था।

कुछ दिन उसके साथ इंटरनेट पर चैटिंग कर पुरवा ने लड़के के चयन पर अपनी मोहर लगा दी थी और कुछ दिन लड़के के साथ घूमने-फिरने के बाद उनके शुभ पाणिग्रहण की तिथि निकलवाई गई थी।

नियत शुभ मुहूर्त में सप्तपदी के पावन वचन दोहरा कर पुरवा और पर्व विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए थे। और कुछ दिन ससुराल में बिता कर पुरवा और पर्व हनीमून पर स्विट्जरलैण्ड की हँसी वादियों में पहुँचे थे। दोनों ने दस दिन नौकरी, काम, फोन कॉल, जिम्मेदारियों से मुक्त एक-दूसरे के सुखद अंतरंग सान्निध्य में समय बिताया था। और परस्पर विश्वास, प्यार समर्पण की कसमें खाते हुए उनका प्रेम परवान चढ़ा था। स्विट्जरलैण्ड से लौट कर पुरवा और पर्व दोनों ही अपनी अपनी नौकरी में रम गए थे।

सोमवार से शुक्रवार तक दोनों पुरवा और पर्व को एक-दूसरे से तसल्ली से बातें करने की फुरसत तक न मिलती। अमेरिका की कार्यशैली में विश्राम के लिए कोई स्थान न था। अमूमन दोनों रात के आठ बजे थक कर चूर हो कर घर लौटने और फिर थके हारे रसोई में किसी तरह काम चलाऊ खाना बनाकर खाकर नींद के आँचल में समा जाते। मात्र शनिवार-रविवार वे सामान्य नवविवाहित दंपती की भाँति एक-दूसरे से खूब बातचीत, हँसी-मजाक, चुहल-ठिठोली करते और यह अहसास करते कि उनका नया नया विवाह हुआ है। बाकी के पाँच दिन तो ऑफिस के काम और घर गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ निभाने में बीत जाता।

यूँ देखते-देखते उनके विवाह को एक वर्ष हो चला था। शनिवार का दिन था। पुरवा का ध्यान अपने मोबाइल पर आए मैसेज पर पड़ा था और वह अपनी बैंक में जमा धनराशि को देखकर चौंक पड़ी थी। उसने देखा था कि उसके अकाउंट में लगभग डेढ़ करोड़ रुपए जमा हो गए थे। उस दिन शनिवार की छुट्टी थी। सुबह के नौ बजे थे। दोनों में से कौन उठ कर चाय बनाएगा, इस बात पर मीठी नोंक-झोंक के उपरांत पुरवा चाय बनाने के लिए उठ गई थी। फिर वह चाय बनाकर लाई थी और दोनों चाय की चुस्कियां ले रहे थे कि पुरवा ने पर्व से पूछा था...

‘पर्व, तुम्हें नहीं लगता कि अमेरिका में रहकर हम यांत्रिक हो गए हैं। हमारी नई-नई शादी हुई है, लेकिन सच-सच बताओ, हम कितना वक्त एक-दूसरे के साथ सही मायनों में बिता पाते हैं ? अपने-अपने माता-पिता से दूर, अपने भाई-बहन, नाते-रिश्तेदारों से दूर, अपने देश से दूर रहकर, यहाँ की यांत्रिक जीवन शैली का एक हिस्सा बनकर सोचो हमने क्या पाया है ? हाँ, एक चीज हमने भरपूर पाई है यहाँ, और वह है पैसा। मेरे अकाउंट में आज डेढ़ करोड़ रुपया है। तुम्हारे अकाउंट में इससे ज्यादा ही होगा। लेकिन इसके अलावा और हमने क्या पाया है ? शायद कुछ भी नहीं। मेरे माता-पिता आज प्रौढ़ावस्था में भी एक-दूसरे के साथ खट्टी-मीठी नोंक-झोंक, हँसी-मजाक कर अपने रिश्ते को जीवंत बनाए रखते हैं। हर त्योहार बेहद धूमधाम, उत्साह और ऊर्जा से मनाते हैं। सभी नाते-रिश्तेदारों से बखूबी रिश्ता बनाए रखते हैं। लेकिन हम, सच कहूँ तो शनिवार, रविवार के अलावा बाकी के दिन तो मशीन के रूप में बिताते हैं। तनिक सोचो, क्या मात्र पैसा कमाना ही हमारा मकसद है ? पैसे कमाने की इस अंधी दौड़ में क्या जीवन की छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण खुशियों का साथ हमसे नहीं छूट गया है ? हम दोनों के माता-पिता अब वृद्धावस्था की ओर अग्रसर हो रहे हैं। उन्हें हम दोनों की देखभाल की जरूरत है। बोलो पर्व, क्या मैं गलत कह रही हूँ ?’

‘नहीं, गलत तो नहीं कह रही हो, लेकिन पैसा भी तो सुख-सुविधा संपन्न अच्छी स्तरीय जिंदगी जीने के लिए जरूरी है। भारत में तुम्हें और मुझे यहां से बहुत कम का वार्षिक पैकेज मिलेगा। मेरे पिता पूरा जीवन एक मकान नहीं बना पाए। मैं सोच रहा हूँ, एक करोड़ उन्हें दे दूँ, जिससे वे एक आलीशान मकान खरीद सकें।’

‘ठीक है, तो क्या बोलते हो, इंडिया में हम दोनों मिलकर पांच लाख तो कमा ही लेंगे। पांच लाख महीना कोई कम आमदनी नहीं होती। इसमें बहुत आराम से अपनी गृहस्थी चलेगी और बढिय़ा बचत भी हो जाएगी। फिर अपना परिवार भी शुरू करना है। चलो पर्व, वापिस भारत लौट चलते हैं। माँ-पापा और अयांश की बेहद याद आ रही है।’

‘नहीं, नहीं, अभी नहीं, एक वर्ष बाद सोचेंगे, भारत लौटने की। बस जयपुर में मम्मी-पापा को एक अच्छा सा घर दिलवा दूँ और मेरा बैंक बैलेंस थोड़ा अच्छा हो जाए।’

यूँ अमेरिका में रहते-रहते साल दर साल बीतते गए थे। हर साल पुरवा, पर्व से भारत लौटने का आग्रह करती लेकिन किसी न किसी बहाने से पर्व उसकी बात अनुसनी कर देता। उन दोनों की एकमात्र संतान काव्यन अब १२ वर्ष का हो गया था और पुरवा और पर्व के उसे भारतीयता के रंग में रंगने के भरसक प्रयासों के बावजूद उसके विदेशी रंग-ढंग उन्हें बेहद परेशान करने लगे थे।

काव्यन की जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही थी, वह अपने आप में सिमटता जा रहा था। स्कूल से आकर ज्यादातर बाहर दोस्तों के साथ समय बिताता। घर में रहता तो अपना कमरा अक्सर बंद रखता। और हर समय मोबाइल, इंटरनेट, कानफोड़ू संगीत में व्यस्त रहता। पुरवा और पर्व से दो घड़ी बैठकर बातें करने की भी फुरसत नहीं होती उसे। कभी बातें करता भी तो ऐसे करता, मानो उन पर अहसान जता रहा हो। उसके इस रवैये पर पुरवा जब कभी उसे उलाहना देती तो वह उनसे कहता, ‘मॉम, आपने कभी मुझे अपना समय दिया, जब मुझे आपकी जरूरत थी ? आप दोनों तो पैसा कमाने में इतने व्यस्त थे कि आपने कभी यह समझने की कोशश ही नहीं की कि मैं अकेला स्कूल से आने के बाद घर में कैसे वक्त काटता हूँ, कैसे अकेलेपन से जूझता हूँ ? अब मुझे अकेले अपने दोस्तों, इंटरनेट, मोबाइल, संगीत के सहारे समय बिताने की आदत पड़ गई है तो आप क्यों चिढ़ते हैं ? जब मुझे आपकी जरूरत थी, आप ने मेरी ओर जरा ध्यान न दिया। मुझे अपने हिसाब से जीने दीजिए।’

इधर वक्त के साथ उसकी आदतें और बिगड़ती जा रही थी। एक बार उसकी शिक्षिका ने पुरवा को बताया था कि उसका व्यवहार अन्य छात्रों के साथ आक्रामक रहता है और वह अशिष्ट भाषा में बात करता है।

यह सब देख सुन पुरवा और पर्व अत्यंत चिंतित हो उठे थे और दोनों ने मिलकर एक अहम फैसला ले लिया था कि काव्यन को सही मार्ग पर लाने के लिए उन्हें अब भारत लौटना ही होगा। शायद वहाँ नाते-रिश्तों में अपनत्व की ऊष्मा भरी भारतीय संस्कृति और परंपरावादी परिवेश उनके और उनके बेटे के मध्य पसरे ठंडेपन में एक नई गर्माहट घोल दे।

कि तभी एक दिन पुरवा और पर्व को काव्यन की ओर से एक और झटका लगा था। उन्हीं दिनों काव्यन के स्कूल की छुट्टियाँ चल रही थीं और वह घर के पास एक आइसक्रीम पार्लर पर कुछ घंटों के लिए पार्ट टाइम नौकरी करने चला जाता था। लेकिन एक दिन अचानक वहां से पर्व के लिए फोन आया था- ‘मिस्टर पर्व, आपका बेटा अभी-अभी एक ग्राहक को अपने मित्र की पिस्तौल से शूट करने वाला था, वह तो ऐन समय पर हमारे सीनियर ने उसे रोक दिया, नहीं तो आज एक बहुत बड़ा हादसा हो सकता था।’

पर्व और पुरवा तत्क्षण आइसक्रीम पार्लर पहुँचे थे और वे पर्व को वहाँ से घर ले आए थे। काव्यन से ही उन्हें पता चला था कि किसी विदेशी रईसजादे ने उसकी आइसक्रीम उसे देर से लाने के लिए उसे अश्वेत-नकारा भारतीय होने का कटु उलाहना देते हुए डाँट दिया था, जिसके कारण वह अत्यंत क्रोधित हो गया था और उसने अपने एक मित्र की पिस्तौल ले उसे गोली मारने का प्रयास किया था। लेकिन ऐन वक्त पर वहाँ के एक कर्मचारी ने उसे रोक दिया था और एक बड़ी घटना टल गई थी।

घर लौटने के बाद काव्यन जाकर अपने कमरे में बंद हो गया था। और उसकी इस हरकत के बारे में सुनकर पुरवा और पर्व, दोनों अत्यन्त क्षुब्ध हो उठे थे। पुरवा का सारा क्रोध और आक्रोश पर्व पर उतर रहा था। वह अपना आपा खो बैठी थी और पर्व पर चिल्लाने लगी थी- ‘इतने वर्षों से चिल्ला रही हूँ, लौट चलो अपने देश, बहुत पैसा कमा लिया, लेकिन तुम्हें तो बस पैसों की पड़ी है। अरे, इन पैसों के पीछे अपना बेटा हाथ से निकला जा रहा है, यह नहीं दिख रहा तुम्हें। आज अपने देश में अपने परिवार के बीच रहते तो आज यह दिन देखना नहीं पड़ता। इस तरह तो यह अपराधी बन जाएगा। नहीं, नहीं... बस अगले महीने की भारत की टिकट करवाओ। मैं और कुछ नहीं सुनूंगी।’

पर्व समझ रहा था कि यह जो हुआ, वह सब उनके अपने बेटे को अपना भरपूर समय न दे पाने और उस विदेशी धरती की मुक्त बंधनहीन संस्कृति के प्रभाव के परिणामस्वरूप हुआ। वह मौन, बिना एक शब्द बोले पुरवा की चिल्लाहट सुन रहा था और बहुत सोच-विचार कर उसने और पुरवा ने निर्णय लिया था कि यदि काव्यन का भविष्य बनाना है तो उन्हें भारत लौटना ही होगा, हर हालत में। और उन दोनों को काव्यन को अपना समय दे अभी तक के नुकसान की भरपाई करनी होगी।

लेकिन इंसान अपना सोचा हुआ कर पाने में हमेशा सफल रहता तो जिंदगी-जिंदगी न कहलाती। पर्व ने दो माह के बाद की भारत की टिकट करवा ली थी। और एक दिन जब पर्व ने काव्यन से कहा था- ‘बेटा, हमने निर्णय लिया है कि हम सब हमेशा के लिए अपने देश वापिस चले जाएंगे। यहाँ जो कुछ हुआ, उसके लिए तुम अकेले ही नहीं, हम सब जिम्मेदार हैं। वहाँ तुम्हारे जीवन की एक नई शुरुआत होगी।’

कि काव्यन चिल्ला उठा था, ‘इंडिया, कभी नहीं... मैं इंडिया कभी नहीं जाऊँगा। आप दोनों को जाना है तो शौक से जाइए, लेकिन मुझे बख्शिए।’

काव्यन की यह बात सुनकर पुरवा और पर्व एक बार फिर परेशान हो उठे थे।

पुरवा आज बहुत उदास थी। वह सोच रही थी, विधाता उसकी कैसी परीक्षा ले रहा था ? अपने प्रयत्नों से उसने सब कुछ हासिल किया था- उच्च शिक्षा, पद, रुतबा, नाम, सम्मान, दौलत लेकिन यदि काव्यन एक भला इंसान नहीं बना, अगर उसने जिंदगी में कोई प्रतिष्ठित मुकाम हासिल नहीं किया तो सब बेकार है। वह अब बुरी तरह से पछता रही थी कि क्यों उसने पहले, काव्यन की छोटी आयु में भारत लौटने का निर्णय नहीं लिया। क्यों काव्यन को अपना अधिक समय नहीं दिया। क्यों अपनी नौकरी और घर की व्यवस्था की आपाधापी में इतनी व्यस्त रही कि बेटे की ओर पूरा ध्यान नहीं दे पाई।

यह सब सोच-सोच कर बेइन्तिहा पछतावा हो रहा था। जब से आइसक्रीम पार्लर की घटना हुई थी, पुरवा और पर्व अत्यन्त उद्धिग्न थे।

समय के साथ काव्यन की हालत बद से बदतर होती जा रही थी। आइसक्रीम पार्लर पर ही उसकी मित्रता कुछ विदेशी लडक़ों से हुई थी, जिन्होंने अपना एक गैंग बना रखा था और जो शराब, ड्रग, जुआ खेलने के आदी थे। और अनेक आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त थे। काव्यन की उनसे नई-नई दोस्ती हुई थी और अक्सर स्कूल के बाद पुरवा-पर्व के लाख मना करने पर भी वह उनके साथ घूमा करता।

कि तभी कुछ ऐसा हुआ था, जिसने काव्यन के भटके हुए कदमों को एक नई दिशा दी थी।

काव्यन के इस भटकाव का दौर पुरवा और पर्व, दोनों पति-पत्नी के लिए अत्यन्त यंत्रणादायी था। दोनों ही काव्यन के इस भटकाव के लिए स्वयं अपने आपको दोषी मानते हुए तिल-तिल पछतावे की आग में जल रहे थे। किसी चोरी के आरोप में अमेरिका पुलिस द्वारा वह गिरोह पुलिस द्वारा जेल में डाल दिया गया था। काव्यन भी उसमें शामिल था। जेल में रहकर पुलिस की मार खाकर काव्यन की अक्ल बहुत हद तक ठिकाने लग गई थी और समय की इस ठोकर ने उसे आपाद मस्तक बदल डाला था। जेल में गुजरा वह हफ्ता अत्यन्त पीड़ादायी था। जेल में रहकर उसे अहसास हुआ था कि माँ और पापा की बातें नहीं मान कर उसने कितनी बड़ी गलती की थी। और शारीरिक और मानसिक यंत्रणा के इस दुर्भाग्यपूर्ण दौर ने उसे प्रण लेने पर विवश कर दिया था कि जेल से छूटकर वह माँ-पापा की बात मानते हुए उनके दिखाए रास्ते पर चलेगा।

काव्यन गिरोह द्वारा की गई चोरी में शामिल नहीं था। वह तो नया-नया उनका साथी बना था। अत: किसी ठोस सबूत के अभाव में वह जेल से बरी कर दिया गया था।

जेल से छूटकर वह स्वयं घर आ गया था। और उसने यह कहते हुए माता-पिता से माफी माँगी थी, ‘ममा, पापा, मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई, जो मैंने आप दोनों की बात नहीं मानी। अब मुझे जिंदगी का सबक मिल गया है। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ, अब मैं मन लगा कर पढ़ाई करूँगा और एक अच्छा बच्चा बनकर दिखाऊँगा। मैं कभी कोई काम ऐसा नहीं करूँगा, जिससे आपको शर्मिंदगी उठानी पड़े। इंडिया चलिए, मैं वहाँ अपने जीवन की एक नई शुरुआत करना चाहता हूँ।’

यह सुन पुरवा और पर्व, दोनों खुशी के अतिरेक से झूम उठे थे। नियत वक्त पर पूरा परिवार इंडिया आ गया था।

इंडिया में नया स्कूल, नया शैक्षणिक परिवेश, नया माहौल, शुरुआत में काव्यन को इन सबके अनुसार अपने आपको बदलना बहुत कठिन लगा था। लेकिन पुरवा का सतत मार्गदर्शन और काव्यन की कड़ी मेहनत, दोनों अपना रंग लाए थे और धीरे-धीरे काव्यन नए वातावरण में ढलने लगा था। पुरवा ने अपनी पुरानी कंपनी में पार्टटाइम सर्विस कर ली थी। अब वह जितनी देर काव्यन स्कूल में रहता, बस उतने वक्त वह नौकरी करती और उसके बाद का वक्त काव्यन के साथ बिताती। पढ़ाई में उसकी भरपूर मदद करती। बचपन में वह उसकी पढ़ाई की ओर बिलकुल ध्यान नहीं दे पाई थी। इसलिए अब उसने कड़ी मेहनत से काव्यन को स्वयं पढ़ा हर विषय में उसकी कमजोर नींव मजबूत की थी। परीक्षा के दिनों में उसके साथ सोती, उसके साथ देर रात तक जागती। खाली वक्त में भी उसके साथ खेलती, उससे इधर-उधर की बातें करती। कदम-कदम पर वह उसका पथ प्रदर्शन करती एवं लगन से अध्ययन करने के लिए उसे प्रेरणा देती। उसका उत्साहवर्धन करती। पर्व भी छुट्टियों में काव्यन की हर बात में शामिल होते हुए एक आदर्श पिता का पात्र निभाने लगा था।

पर्व, पुरवा और काव्यन को इंडिया आए दो वर्ष बीत चले हैं। पुरवा के स्नेहिल एवं भरपूर लाड़-दुलार भरी देखभाल ने काव्यन को नख से शिख तक बदल डाला है। वह मुंबई के एक अति प्रतिष्ठित स्कूल में अध्ययन कर रहा है और पिछले दो वर्षों में पुरवा की कड़ी मेहनत और अपनी स्वयं की लगन और कड़े परिश्रम के फलस्वरूप उसने उत्कृष्ट परिणाम दिया है।

पुरवा और पर्व बेटे में आए इस परिवर्तन को देख अत्यंत खुश थे।

उस दिन पुरवा पर्व के यहां जश्न का माहौल था। काव्यन आई.आई.टी. की प्रवेश परीक्षा में पहली बार में उत्तीर्ण हो गया था। और उसने आई.आई.टी. दिल्ली में इंजीनियरिंग में प्रवेश ले लिया था। देखते-देखते काव्यन की इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी हो गई थी। और काव्यन फाइनल परीक्षा में अपने पूरे बैच में अव्वल रहा था।

उस दिन कॉलेज का दीक्षांत समारोह था। काव्यन को यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने स्वर्ण पदक प्रदान किया था। उन्होंने उसे उस अवसर दो शब्द कहने को कहा था। और काव्यन ने हाल में अग्र पंक्ति में बैठी अपनी माँ को मंच पर बुलाते हुए कहा था, ‘सम्मानीय उपस्थित जनों। उस पदक की असली हकदार मेरी मां हैं, जिन्होंने मेरे उज्जवल भविष्य के लिए अपने कॅरियर के स्वर्णिम काल में अपनी नौकरी को तिलांजलि दे घर पर रह कर मुझे प्रेरित किया, पढ़ाया और कदम-कदम पर मेरा मार्गदर्शन किया। मुझे आज यह कहते हुए अत्यन्त गर्व की अनुभूति हो रही है कि मेरी माँ मेरी एकमात्र फ्रैंड, फिलॉसकर एवं गाइड हैं। यह पदक मैं एक बार फिर उनके हाथों लेना चाहूँगा।’

बेटे को स्वर्ण पदक देते हुए पुरवा की आँखें बेइन्तिहा खुशी से झर-झर बह रही थीं, जिनमें आगत भविष्य के असंख्य सतरंगे सपने झिलमिला रहे थे। एक माँ का सपना आज पूरा हो गया था।

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