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हिंदी चीख रही है
हिंदी चीख रही है
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© Qamar Abbas

Comedy

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लोगों सुनो ज़रा सा हिन्दी चीख़ रही है;

जनमानस की भाषा हिन्दी चीख़ रही है।

 

एक ज़माना था जब राजकुमारी थी;

हिंदवासियों को यह जान से प्यारी थी।

सूर कबीर के दोहों में इठलाती थी;

प्रेमचंद के किस्सों की शहज़ादी थी।

 

बदल गई परिभाषा हिन्दी चीख़ रही है;

जनमानस की भाषा हिन्दी चीख़ रही है।

 

मृदुल भाषियों की पहचान ये हिंदी थी;

आन थी शान थी और सम्मान ये हिंदी थी;

हिंदवासियों का अभिमान ये हिंदी थी;

और खुशियों का ख़ियाबान ये हिंदी थी;

 

वक़्त अब ऐसा आया हिंदी चीख़ रही है;

जनमानस की भाषा हिंदी चीख़ रही है।

 

अपने अंदर झांको फिर अंतर देखो;

यहीं कहीं हैं 'पंत' व 'जयशंकर' देखो;

झूठी शान से तुम ऊपर उठकर देखो;

'दिनकर' की कविताओं को पढ़कर देखो।

 

भारत भाग्य विधाता हिंदी चीख़ रही है;

जनमानस की भाषा हिंदी चीख़ रही है।

 

हिंदी

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