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Neelam Chawla

Drama


4.0  

Neelam Chawla

Drama


यात्रा

यात्रा

12 mins 636 12 mins 636

मैं ढाबे पर खड़ी थी मेरे साथ एक लड़की जो इस सफर की हमसफ़र है कुछ देर के लिए या ये वो साथ जिसने बिना कुछ तय किए सफर में आपके साथ चलना शुरू किया। कुछ दूरी से ड्राइवर सीधे हाथ की तीन उंगलियां व अंगूठे को एक साथ हथेली तरफ मोड़ कर इशारे करके पूछता है- "पीना है ?"

मैं अपनी साथी की तरफ मुड़कर शरारती भरी निगाहों से देखती है और पूछती हूँ ले ले क्या ?

और हम दोनों जोर से हँस कर ड्राइवर से कहते हैं "ले लो।" 

रात के पौने नो बजे, मैंं, मेरे सफर की साथी, गिन्नी और ड्राइवर तीनों चिकन खाते हैं ‌ओर कुछ घूंट से गले को तर करने के लिए पीते हैं। मैं और गिन्नी जोर जोर से पागलों से हँसते हैं बात बे-बात पर खाना ख़त्म कर ड्राइवर से कहते हैं "अब इस वक्त हमें कौन सा होटल मिलेगा।" पहाड़ों की चढ़ाई पर बसे ढाबे की खुली हवा में खुलकर सांस लेते हुए पूछा। पहाड़ों पर रात जरा जल्दी हो जाती हैं।

मैंं तकरीबन रोज खुद को एक चिट्ठी लिखती थी।

डियर प्रान्जल 

क्या तुम्हारा मन नहीं करता रसोई के बाहर की दिवाले भी देखो ? मसालों के रंग के सिवा बाकी रंग भी देखो ?

माना कि तुम डिजाइनर किचन की मल्लिका हो फिर भी कैदखाने जैसा नहीं लगता तुम्हें या खुदा "खाना "ही औरतों का कैदखाना है

तुम्हारी अपनी अन्तरआत्मा।

प्रिय प्रान्जल

क्या तुम्हारा जन्म सिर्फ इसलिए कि तुम खुद को एक हरी चटनी के तरह साइड मे परोस दी जाओ और खाने के साथ चाट ली जाओ ? फिर खाली बर्तन सी बजती रहो।

तुम्हारी अपनी

आत्मा।

प्रिय प्रान्

उस दिन जो तुम ५ रुपए धनिया के पीछे लड़ाई कर रही थी तो क्या वो सही था

क्यो जरूरी है धनिया और मिर्च का मुफ्त होना ? इतना जरूरी था तो तुमने गले में चैन बांधकर आजादी क्यों नहीं मांग ली। मुफ्त !

तुम्हारी 

आत्मा।

प्रिय प्रन्

तुम्हारा जीवन हरा तो हुआ है पर खुले आसमान के नीचे नहीं, एक बन्द कमरे में बिल्कुल ऐसे जैसे ग्रीन हाउस में किसी पौधे को रखकर वहां का टेम्परेचर रेगुलट किया जाता है।

तुम्हारी आत्मा।

हम औरतें कितना भी पढ़ें पर बंधती फिर भी पल्लू से ही है ‌जितना भी सच्चा प्रेम करें पर आग उन्हीं के लिए जलाई जाती है आग्नि परिक्षा के लिए।

शादी से पहले दोस्तो ने मेरे सपनों की दुहाई देकर पूछा-  "क्या होगा अब तेरे सपनों की लड़ी का।"

मैंं- "जितने भी काम अधूरे हैं वो शादी के बाद पूरे करूंगी और हँस कर बात खत्म कर दी।"

कुछ सपने शादी से पहले पूरे नहीं हुए उन सबको मैं अपने साथ दहेज में लाई थी 

दहेज की बेकार की चीजें अक्सर बाहर निकाल कर किसी को दी जाती है तो वो सपनों का बैग काफी दिनों तक धूल खाता रहा, फिर एक दिन झाड़ कर ऊपर ताड़ पर चढ़ाकर भूल गई।

कितना आसान था सब फिर पता नहीं क्यों वो बैगेज हैवी नहीं हुआ।

सारी लड़कियां पढ़ लिखकर बड़ी बोल्ड नहीं बनती और तो और कई बार कुछ जगह बड़ी हिम्मत वाली दिखाई देती है और कहीं कहीं सबसे ज्यादा वहीं कमजोर ।

"पढ़ लिखकर सभी

औरतें शोर नहीं करती

बल्कि कुछ खामोशी से

तारों से गुफ्तगू कर 

उन्हें जमीन पर ले आती है।"

औरतें कमजोर नहीं होती पर कभी कभी दूसरों को खुद से ज्यादा अहमियत देने का काम करती है

क्या क्या ख्याल आते हैं जो मन पर हथौड़े मारते हैं चोट इतनी गहरी देते हैं कि बस मन सुबकना शुरू कर दें। ड्राइवर हमें अपने साथ पहाड़ों देर रात तक घूमा रहा है क्योंकि हमारी होटल की कोई बुकिंग नहीं।

गिन्नी - "यार कहां रूकने को मिलेगा ?"

मैं-" कहीं लाज, धर्म शाला कहीं तो मिली ही जाएगा।"

ड्राइवर- अपनी पहाड़ी भाषा के टोन में हिन्दी और मंडयाली को मिला कर बोलता है "ठस रे, माराज, मारी लाडी कहती हैं मेरे को तेरे को जिसने भेजा बो ही इंतजाम भी करता है।"

गिन्नी -"तेरी लाडी का नाम क्या है।"

ड्राइवर -" मेरे को तो हेमा मालिनी दिखे है।"

हम दोनों जोर से हँस देते हैंष

खैर रास्ते की उबड खाबड़ और गोल गोल पहाड़ों के चक्कर लगाते लगाते एक गांव में जो शहर से थोड़ा दूर था वहां आकर रूके। सामने बहुत बड़ा तो नहीं एक रस्टिक बिल्डीगं थी जो लाज थी। गिन्नी और मैंने अन्दर गए। पूछने पर पता चला कि एक कमरा खाली है, हम दोनों को ओर क्या चाहिए था 

ड्राइवर का हिसाब कर उसे राम राम कर अन्दर गए।

रिसेप्शन पर खड़े होकर इधर उधर देखने पर मालूम पड़ा, काफी पुरानी बिल्डिंग है खैर, हमने दो दिन की बुकिंग ले ली।

प्रिय प्रान्

सुख कभी कभी मन का एक जाल होता हैं खुद को उलझाए रखने के लिए है और दुख मन को डराने वाले एक भय। वास्तव में भय और दुख एक दूसरे के पर्यायवाची ही होते हैं एक की वजह से दूसरे का जन्म निश्चित है।  सुख और दुख वास्तव में एक दूसरे के विपरीत नहीं, एक ही स्थिति है।

मुझे देखकर लोग अक्सर कहते हैं-

मुझे क्या दुख होगा ? 

हकीकत में दुखी कोई नहीं होता, कुछ लोग हर हालात में जो भी हो, उनसे उलझे बिना जिए जाते हैं और कुछ हालातों के बहाव को अपनी तरफ मोड़ने की कोशिश में हारते रहते हैं। हारकर उस बहाव का नाम वो दुख रख देते हैं। मैंं दुख और सुख से दूर खुद की तलाश में ज्यादा रही इसलिए जोर से हँसना और हालातो‌ं को उनके हाल पर रखना मेरे लिए आसान रहा है पर ऐसा नहीं कि मैं दर्द में नहीं जाती।

मैंं कई बार जब अपने सपने पूरे नहीं कर पाई ,तो लगा मैं बहुत बड़े दुख में हूं फिर सोचा अगर दुनियां का सबसे बड़ा सुख दे भी दिया जाएं, तो मैं उसे भी ऐसे ही जिऊंगी जैसे दुख भोग रही हूं।

भोगना नियती है। अपने ही सुख को दुख की तरह काटती हूं।

तुम्हारी आत्मा।

मुझे मेरी सास ने कहा कि -"पति इतना कमा रहा है, तुम्हें काम करने की क्रिया जरूरत है ?"

मैंंने कहा -"घर से बाहर निकलने का मतलब सिर्फ पैसा इकट्ठा करना नहीं " सास बहू का सिरीज मेरे आत्मा को त्रप्त नहीं कर सकती, दो वक्त भरी थाली खाने की मेरी भूख नहीं मिटा सकती फिर भी करीब १० साल से मैंं अवचेतन मन से सबको नींद से जगाकर, प्रेम की थाली परोसती रही। सब यात्राओं में ,मैं उनकी कूली बनी, आया बनी, रसोईया बनी, जमादारनी बनी और तो और सबकी चड्डी धोने वाली धोबिन ‌भी बनी सब बनी पर वो नहीं रही जो मैं थी ।

बुकिंग सिर्फ एक कमरे की ली, हम दोनों के लिए कमरा सिर्फ एक ठिकाना मात्र था जहां आकर खुद को हर चीज से आजाद करना था चाहे खुद से खुद को या अपने कंधों को ट्रेवलिंग बैग से। कमरे में सिर्फ एक ही बैड था एक दम साधरण सा कमरा शायद ऐसा कमरा मैंने बरसों से नहीं देखा था अक्सर आभाव पूर्ण यात्राएं आपको और आत्मा को की खजाने से भर देती है।  मैं भी इसलिए यात्रा पर हूं मुझे मालूम है खोए मेरे कई हिस्से मेरी इन्ही यात्राओं में मुझे मिलेंगे।

गिन्नी और मैं यात्रा के दौरान ही दोस्त बने। हम दोनों का एक ही मंतव्य था यात्रा।

यात्राएं केवल बाहरी रास्ता नापना नहीं होते। इन रास्तों पर चलकर हम अन्दर की ओर यात्रा करते हैं ये यात्राएं तो बहाना होती है खुद की अंगुली पकड़ने का।

मेरी जैसी बिगड़ी औरतें अपने बच्चों और घर छोड़ कर खुद से मुहब्बत के लिए निकल जाती है। खुद से ही खुद की तलाश में। हम जैसी औरतें शराब पीती हैं फिर रास्तों पर हिप्पी बनकर घूमती है ताकी वो कुदरत को अपना सलाम पहुँचा सके।

मेरे एक ही बेटा है जो मेरे आस-पास मंडराता रहता है आज के वक्त में भी बिल्कुल मां का बच्चा। उसे हर वक्त अपनी मां घर में दिखती रहनी चाहिए। 

मैं तब बिल्कुल दोहरी हो जाती हूं। जहां मैं अन्दर से कई कई टुकड़ों में कई कई बार टूट टूट कर फिर जुड़ती हूं और खुद को अहसास देती हूं कि मां होने की जिम्मेदारी मेरी है जो आसान करता है खुद के बिखरे टुकड़ों को देखना। उनमें बार बार झांकना। इसका मतलब ये नहीं कि मैं अपनी जिम्मेदारी को छोड़कर भागना चाहती हूं सिर्फ इतना ही मतलब कि मैं इन सब के बीच खुद से मुहब्बत करते रहना चाहती हूं । त्याग की मूर्ति बने रहने का कोई औचित्य नहीं रहता है जब तक मैं खुद को प्यार नहीं करती कि मैं सिर्फ प्यार का एक सरोवर बन जाओ तब तक मैं किसी ओर को स्नेह और ममता नहीं दे सकती। औरतों की पीढा और आजादी का खोने वाला दर्द भी सदियों का है जो आसानी से खत्म नहीं होगा। इसका ये कतई मतलब नहीं की मुझे अपने बच्चे से प्यार नहीं । सिर्फ इतना मन है कि मैं खुद को खोने से हमेशा डरती रही हूं। क्या ये ग़लत है ? ?

मेरा बेटा रिषभ १० साल का है।

रिषभ-"आप पास बैठे रहे,जब तक मैं पढ़ो।"

मम्मा-"ओके बेटा"

ओके बेटा करना आसान सा सुनाई पड़ता है पर कितनी सांसें इधर उधर रखी गई कितने ही सपने दराज में बन्द करके भूल गई। कितने सपने बिना पानी के मछली की तरह तड़प कर जान तोड़ दी। उसके बाद ओके शब्द बना मेरा।

"यार गिन्नी उठ न सुबह हो गई।"

गिन्नी -"अबे यार थोड़ा तो सोने दे।"

मैंं गिन्नी को छोड़ कमरे की छोटी सी बालकनी पर आकर खड़ी रही। अपने रोम रोम में सूरज की किरणों को ओक में भर कर अपने बदन पर उड़ेलने लगी।

"पहाड़ी लोगों का मानना है कि पहाड़ लोगों को चुनते हैं अपने उगते सूरज की स्वर्णिम किरण दिखाने को।"

कितने दिनों के बाद सुबह को बिना किसी शर्त के गले लगाया है मिठी बातें खुद से करने की फुर्सत निकाली है। पहाड़ों के पार खड़ा मुझे मुंह नहीं चिढा रहा था कोई रसोई की ज़िद्द नहीं की उससे पहले मिला जाएं।

सुबह के ६ बजे

रसोई की भी नींद उड़ जाती है एक तरफ गैस पर कुकर की सिटी बजती है तो दूसरी तरफ चाय उबल रही हैं जल्दी जल्दी  खाना बनाना और डिब्बो में पैक करना ।

मेरी जिन्दगी कोई खास नहीं ।तवे पर रोटी सेंकने से ज्यादा कुछ नहीं। दिन रात खाना और चूल्हा ही ज़िन्दगी का हिस्सा है। हाथ में रुमाल पकड़ाना और हाथ से बैग से डिब्बे निकालने में दिन कब चढ़ता और कब उतरता पता ही नहीं चलता।

इन तमाम दिनों के बीच शिकायतें नहीं रहती शायद इसलिए क्योंकि खुद से ये पूछने की भी फुर्सत नहीं रहती कि "मैं कैसी हूं ?"

कोई दिन तय या मुकर्रर क्यों नहीं होते जिसमें औरतें अपने हिसाब से अपने हिस्से की जिन्दगी जी पाए। क्यों कोई ऐसे दिन नहीं होते जिसमें औरतों की जिम्मेदारी सिर्फ उनके हिस्से न होकर सबकी हो।

सबके ध्यान करने में किसी एक की ही जिन्दगी क्यो ?क्यो कोई एक ही आज़ाद रहे ? आजादी की भी साझेदारी क्यों नहीं ?

आयम अपनी जिन्दगी की मांग दौड होता था उसके साथ मेरे लिए हुए वादे, तुम आसमान में उड़ो और मैं जमीन पर घर देख लूंगी। ये वादा बिना किसी शर्त और बिना किसी लड़के और लड़की के भेदभाव से किया गया था।

पति आयाम बाहर टोरिंग पर रहते हैं जो अक्सर कपड़े के मैंनुफैक्चरर कम्पनी में विजिट कर मटेरियल चैक के लिए जाता रहता है सारा वक्त अपने ही दुनिया में बिजी रहता है कई बार खाने तक का होश नहीं रहता है कई कई दिनों तक घर भी फोन तक नहीं करता था। मैं दिन रात अपनी बेटेऔर सास की देखभाल में निकाल देती हूं और फिर इन्तजार के छोर को पकड़कर बैठ जाती हूं कि एक एक दिन ढलकर महीनों के लिफाफे में बन्द हो और महीने साल में बदल जाएं।

मैंने फाइनेंस में एम .बी.ए किया हुआ था कालेज की टापर थी कुछ कंपनियों में इन्टरव्यू भी दिए पर मां बाप की ज़िद्द थी शादी की।

शादी में मैंने पूरे १२ साल शिद्दत से निभाएं। बिना कोई छुट्टी लिए।

लेकिन अब मुझे मेरे वक्त की तलाश रहने लगी। मैं हर रोज जीने की उम्मीद में घुलती जा रही थी, मुझे खुद ज्यादा जरूरत लगने लगी। मैं अधूरी होती जा रही थी मुझे। नियती ने फाइनेंस में एम .बी.ए किया हुआ था कालेज की टापर थी कुछ कंपनियों में इन्टरव्यू भी दिए थे पर मां बाप की जिद्द ने उसको शादी करने पर मजबूर कर दिया। आयाम कपड़ों के काम के लिए देश विदेश घूमता था यही बात नियती के माता-पिता को जम गईं थीं उन्होंने सोचा नियती राज करेगी ।नियती की शादी ग्वालियर में हुई मगर पति के साथ बैंगलोर आ गई। लगने लगा वो गले हुए मोमबत्ती का टुकड़ा जो पूरी तरह से रोशन भी नहीं कर पाया खुद को। मेरा मन इन मोमबत्ती के टुकड़ों को इकट्ठा कर एक नई मोमबत्ती बनाने का था।

आज अकेले पहाड़ों में पहाड़ों के प्रेम में खड़ी हूं एक नया रंग रूप एक नई शक्ल को लेकर। मैं खुश हूं, मैं जिंदा हूं, मेरी बालकनी से दूर तलक फैले पहाड़ों से मैं मुहब्बत में, मैंं बड़े प्यार हरी निगाहों अपने देर से आने की सफाई दे रही हूँ।

"ओ गिन्नी उठ जा ,इस से ज्यादा नहीं हो सकती।"

उसको हिलाते हुए, मैंं बाथरूम में घुस जाती हूँ और गले के अन्दर का ध्वनी यंत्र, लता मंगेशकर बनने के इरादे में है।

आज मदहोश हुआ जाए रे...मेरा मन ...मेरा मन"

"बाथरूम सिंगर जल्दी बाहर आ, मुझे भी नहाना है" -गिन्नी उठ चुकी थी 

आयाम मुझे उदास देख कर परेशान रहना लगा।

उसे समझ ही नहीं आता कि किया जाए कि मेरी मुस्कराहट वापस ला सके।

चूंकि मैं कभी आयाम का किसी बात पर साथ देने से पीछे नहीं हटी तो इसलिए हर बार आयाम अपनी ही बात मानवा लेते थे लेकिन अब मुझे सिर्फ मेरे निर्णय की जरूरत थी मेरी जरूरत थी मेरे होने और न होने के अर्थों की जरूरत थी। आयाम मुझे उदास नहीं देख पा रहे थे तब उन्होंने मेरे लिए पहाड़ों की टिकट बुक करा कर, हाथ में थमाते हुए कहा ,"मैंं तुम्हें खोना अर्फोड नहीं कर सकता हूँ, मैं समझ सकता हूं तुम्हारा मन और आत्मा को, इन चार दीवारो के बीच खुद को ढूंढने में।"

मैंं खामोशी से उसे सुनती रही और वो बोलता रहा।

"मैंं जानता हूं तुम्हे ट्रेवलिंग बहुत पसंद और वो भी पहाड़ों की

जिनकी ऊंचाई पर खड़ी होकर खुद की गहराई ढूंढती हो"

मैंं क्या जवाब देती, हमेशा फैमिली ट्रिप होती है शाक्षद इस बार वही प्लान किया होगा, मुझे खुश करने के लिए, इसलिए मैं ओर भी खामोश थी।

बाथरूम से बाहर आते ही मैंने फिर गिन्नी पर चिल्लाई ,जल्दी कर निकलते हैं अभी ८ बजे है गांव घूमेंगे, "रियल फन ऑफ हिल स्टेशन आज इन विलेज।"

"ब्रेक फास्ट भी यही का लोकल करेंगे।"

गिन्नी -"जो हुकुम आका।"

हँसी की महक से कमरा भर जाता है। दोनों झट तैयार होकर आती है रूम की चाबी रिसेप्शन पर रखकर, पहाड़ों के गांव में निकल जाती है कस्बा कस्बा घूमने में उसे सुकून दे जाता। किसी गांव वाले के छोटे ढाबे में पहाड़ी राजमा चावल खाकर उसकी जुबान पर जो जायका ठहरता है वो शायद उसे इतने सालों कहीं नहीं मिला। उसके जायके से लेकर उसे किस सड़क पर कितना घूमना ये सब वो तय कर रही।

आयाम उसे टिकट देता है और कहता है "जहां जिस पहाड़ पर जाना वो तुम निर्धारित कर सकती हो ये टिकट सिर्फ डम्मी है।"

मैंं उसे सिर्फ एक टक देखती रहती हूँ। वो फिर कहता है, "तुम्हें शायद लोग बहुत कुछ कहेंगे, उन्हें तुम नहीं सुनना । यहां बात पुरष और औरत की नहीं है सिर्फ इस जिस्म में रहकर अपनी अपनी यात्रा तय करने की है मैं तुम्हारी यात्रा में कोई रोक नहीं लगा सकता। हम दोनों को साथ रहना और चलना है बावजूद उसके हमारी अपनी यात्राएं निर्धारित है हमें उन सब मोड़ों से गुजरना होगा, जिससे हम मजबूत हो और हमारा रिश्ता भी। याद रखो हम दोनों बराबर है अपने इस जीवन में।"


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