विद्यार्थी का जीवन अर्पण
विद्यार्थी का जीवन अर्पण
बात बहुत पुरानी है। नालंदा विश्वविद्यालय के विद्यार्थी उमंग भरे हृदयों से चीनी पर्यटक ह्वेनसांग को भाव भीनी विदाई देने जा रहे थे। सिंधु नदी के जल पर हिलती डोलती एक नौका चल रही थी। नौका में बैठे हुए विद्यार्थी ह्वेनसांग के साथ विद्या-विनोद तथा धर्म-चर्चाऐं कर रहे थे। नाव किनारे की ओर तेजी से बढ़ती जा रही थी।
इतने में एकाएक एक भारी तूफान का झोंका आया। नौका तेजी से हिलने-डुलने लगी। अब डूबी तब डूबी का भय दिखाई देने लगा। नाविकों ने नौका को स्थिर रखने का जी-तोड़ प्रयत्न किया पर दुर्भाग्य से सब प्रयास विफल हुए।
और नौका में भार भी क्या कम था ? ह्वेनसांग भारत भर में घूमे थे और जहाँ भी उन्होंने भगवान तथागत की अदस्य मूर्ति देखी या अप्राप्य ग्रंथ देखा उसे तत्काल अपने साथ ले आए थे। जो अप्राप्त ग्रंथ प्राप्त न हो सका, उसकी वहीं कई दिन बैठकर नकल की। ऐसे अप्राप्य ग्रन्थ केवल 10-20 नहीं थे। खासे 657 ग्रन्थ और भगवान बुद्ध की लगभग 150 नयन मनोहर ध्यानस्थ मूर्तियाँ नौका में रखी हुईं थी।
दैवयोग से तूफान का जोर बढ़ता गया। नाविकों के सब प्रयत्न बेकार साबित हुए। अंत में उनकी दृष्टि नौका में भरी पुस्तकों और मूर्तियों पर पड़ी । उन्होंने कहा-अब बचने का केवल एक ही मार्ग है। इन सारी पुस्तकों और मूर्तियां को जल में फेंक दो तो भार कुछ कम हो जायेगा और नाव धीरे-धीरे किनारे तक पहुँच जायेगी।
एक नाविक ने तो ग्रंथों का एक बंडल नदी में फेंकने के लिए उठा ही लिया था। यह दृश्य देखकर ह्वेनसांग तथागत की मन-ही मन प्रार्थना करने लगा- भगवान ! मुझे मृत्यु का तनिक भी भय नहीं है। मुझे भय केवल इसी बात का है कि अपने देश के लिये मैंने इतना कष्ट उठाकर जो यह अमूल्य सामग्री उपलब्ध की है वह सब एक पल में नष्ट हो जायेगी।''
फिर ह्वेनसांग ने खडे़ होकर शांति से कहा नौका का भार ही हलका करना है न, तो मैं स्वयं जल में कूद पड़ता हूँ।"
नहीं मानव-जीवन बड़ी कीमती वस्तु है। भार तो इन पुस्तकों और मूर्तियों से कम करो। इसके बिना नौका किनारे तक पहुँचना संभव नहीं है।'' नाविकों ने कहा।
ह्वेनसांग बोला "मेरे मन में इस देह का कोई मूल्य नहीं। महत्व तो इन संस्कारवान वस्तुओं का है।''
इस वार्तालाप से नालंदा विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को सहसा प्रकाश मिला। एक वृद्ध चीनी यात्री की वर्षों की मेहनत इस तरह पानी में जायेगी। जो यह चीनी यात्री ही इन संस्कारों, वस्तुओं के लिए आत्मसमर्पण कर देगा तो हमारे भारत की आतिथ्य परंपरा का क्या महत्व रहा ?
विद्यार्थियों ने मूक भाषा में संकेत में आपस में बातचीत की। उनमें से एक तेजस्वी बालक खड़ा हुआ। दोनों हाथ जोड़कर सबसे अभिवादन करते हुए उसने कहा
- भदंत ! भारतवर्ष की भूमि से आपने जो यह संस्कार निधि एकत्र की है वह केवल नौका में भार के कारण डूब जाए यह हमारे लिए असह्य है। इतना कहकर वह युवक सिंधु नदी की अथाह धारा में कूद पडा। उसके बाद सभी विद्यार्थी जल में कूद कर लुप्त हो गए।
नाविक तो इस समर्पण का अद्भुत दृश्य फटी आँखों से देखते ही रहे। जीवन समर्पण की यह अनोखी पुण्य प्रक्रिया देख कर ह्वेनसांग कीं आँखों से भी अवरिल अश्रुधारा बहने लगी।
यह वह उज्ज्वल परपरा थी, जिसने न केवल ह्वेनसांग जैसे विदेशी मनीषी को ही प्रभावित किया, अपितु संसार में भारत की सांस्कृतिक गरिमा का उच्च आदर्श प्रस्थापित किया।
