वह पत्र जो कभी नहीं लिखा गया
वह पत्र जो कभी नहीं लिखा गया
माँ, मेंने आज बरसों बाद कलम उठाई है, लेकिन समझ नहीं आ रहा कि शुरुआत कहाँ से करूँ। बचपन से देखती आई हूँ कि कैसे आप सुबह से रात तक काम करती थी और हम सबकी जरूरतों के इर्द-गिर्द घूमती रहती थीं। मैंने कभी नहीं पूछा, "आपसे की माॅं क्या आप थक गई हैं?" या "क्या आपको भी कुछ चाहिए?"
फिर उस दिन जब मैंने अपनी पहली नौकरी की तनख्वाह आपको दी थी, तो आपकी आँखों में जो गर्व और थोड़ी सी नमी थी, वह आज भी मेरे ज़हन में है। तब मुझे लगा था कि शायद मैंने आपका कर्ज उतार दिया है। पर ऐसा नहीं था क्योंकि माॅं - बाप का क़र्ज़ तो हम जिन्दगी भर नहीं चुका पाते लेकिन आज समझ आता है कि आपने जो संस्कार और हौसले मुझे दिए हैं, उनकी कीमत कोई भी चेक नहीं चुका सकता।
मैं आपसे माफी मांगना चाहती हूँ—उन मौकों के लिए जब मैंने आपकी सादगी का मज़ाक उड़ाया, या उन दिनों के लिए जब मेरी किशोरावस्था की जिद ने आपकी शांति को भंग किया। आपने कभी शिकायत नहीं की, बस एक मूक आशीर्वाद के साथ मुझे थामे रखा।
यह पत्र सिर्फ शब्दों का समूह नहीं है, यह मेरा वह 'धन्यवाद' है जो सालों से मेरे भीतर दफ़न था। माँ, आपने अपनी इच्छाओं को त्यागकर जिस तरह मुझे संवारा है, उसके लिए कोई भी शब्द पर्याप्त नहीं हैं। आज मैं जो कुछ भी हूँ, सिर्फ आपकी त्याग भरी परवरिश की बदौलत हूँ।
आप मेरे जीवन की वह नींव हैं जो कभी नहीं डगमगाती। भविष्य में मैं आपसे वादा करती हूँ कि मैं वही गरिमा और साहस अपने भीतर बनाए रखूँगी जो आपने मुझे सिखाया है। शायद मैं ये बातें कभी आपसे सामने बैठकर नहीं कह पाऊँगी, इसलिए आज इन शब्दों को पत्र में पिरोकर आपको समर्पित कर रही हूँ।
आप मेरी प्रेरणा थीं, हैं और हमेशा रहेंगी।
