कलम और किताब
कलम और किताब
मध्यम रोशनी वाले कमरे में लेखक सर थामे बैठा था। सामने मेज पर एक कोरी किताब खुली थी और हाथ में एक कलम दबी थी। कमरे की खिड़की खुली हुई थी। उस खिड़की से बहुत तेज हवा आ रही थी। जिससे उस किताब के पन्ने उलट - पुलट हो रहे थे। लेकिन लेखक खिड़की को बंद नहीं कर रहा था। वो कलम पकड़े चुपचाप बैठा था।
बाहर दुनिया को लग रहा था कि लेखक महान कहानियां लिख रहा है, पर हकीकत में लेखक के अंदर ' शब्दों का अकाल ' पड़ा था।
कलम ने किताब के सफ़ेद पन्ने पर अपनी निव टिकाई पर लेखक का हाथ नहीं चला। कलम ने फुसफुसाकर किताब से कहा " आज ये खामोश क्यों है? मुझमें स्याही भारी है, पर ये मुझे चलने का आदेश नहीं दे रहा।"
किताब ने धीमी आवाज में जवाब दिया " कलम इसे शब्दों की कमी नहीं, ' अहसास ' की कमी है। जब तक इसका दिल नहीं धड़केगा, हम दोनों बेजान लकड़ी और कागज के टुकड़े ही रहेंगे।"
लेखक ने अचानक कलम मेज पर पटक दी। उसे लगा की वह अब कभी नहीं लिख पाएगा।तभी उसकी नज़र कमरे के कोने में अपनी मॉं की तस्वीर पर पड़ी उसकी आंखो में एक आंसू उभरा और मेज पर पड़ी किताब के पन्ने पर गिर गया।
उस एक ' आंसू ' ने जैसे जादू ही कर दिया, अचानक से वो हवाएं शांत हो गई तभी लेखक ने झपटकर कलम उठाई। अब कलम और पन्ने के बीच कोई जंग नहीं थी।
लेखक के दर्द ने कलम को स्याही दी और किताब के खालीपन ने उन शब्दों को अपनी गोद में जगह दी।
रातभर कलम चलती रही और किताब भरती रही। सुबह जब सूरज की पहली किरण कमरे में आई, तो मेज पर एक ' शाहकार ' जन्म ले चुका था।
लेखक मुस्कुराया उसे समझ आ गया था, कि वह अकेला लेखक नहीं है। वह, उसकी कलम और उसकी किताब------ जब ये तीनो एक ही भावना में बहते है, तभी कोई महान रचना जन्म लेती है।
"कलम की धार से हर दर्द
का हिसाब लिखती हूं,
में कोरा पन्ना लेकर एक
नया ख्वाब लिखती हूं."
सृष्टि चतुर्वेदी
