तबादला
तबादला
तनु की शादी की बात चल रही थी। बड़ा ही अच्छा घराना था लड़का भी बहुत सुंदर और अच्छे पद पर आसीन था पर तनु को वो रिश्ता मंजूर नहीं था। मां ने सोचा शायद कोई ओर है इसके मन में जो इतना अच्छा रिश्ता ठुकरा रही है। वह तनु के कमरे में गयी और पूछा "बिटिया, क्यों मना कर रही है तू इस रिश्ते को क्या खराबी लगी तुझे इस रिश्ते में ?" तनु अनमने मन से बोली, "मम्मी खराबी कोई नहीं है पर मैं एकल परिवार में पली बड़ी हूं नौकरी करती हूं क्या मैं संयुक्त परिवार में एडजेस्ट हो पाऊंगी।" मां हंसते हुए बोली, "बेटा ये मेरा दुर्भाग्य था जो मैं एकल परिवार में आयी। संयुक्त परिवार की कोई रीस नहीं है। वहां सब काम चुटकियों में बातों ही बातों में हो जाते है तू चिंता मत कर तू सुखी रहेगी।" मां के आगे तनु कुछ बोल ना सकी पर मन ही मन ठान लिया था कि अगर नहीं बनी तो वह ओर उसका पति अलग हो जाएंगे। सगाई हो गयी शादी के दिन लड़के वालों की तरफ से सजी दुल्हन को देखने पूरे परिवार की औरते आई। तनु पांव छूते छूते थक गयी। शादी हो गयी तनु का पहला दिन था ससुराल में। पति की चाची, ताई, मामी, बुआ सब इकट्ठी हो कर हंसी ठिठोली करने लगी। तनु को घबराहट हो रही थी। ये सब सुनील की आंखों से छिपा नहीं था। उसने अपनी बहन के कान में कहा कि तू अपनी भाभी को उपर वाले कमरे में ले जा। तनु की ननद सभी से ये कह कर की भाभी वाशरूम जाना चाहती है। उसे उपर के कमरे में ले गयी। उसे कमरे में बैठा कर वह बाहर निकल गई। तभी सुनील कमरे में आ गये। तनु सुनील को देख कर थोड़ा सुकचाने लगी। तनु को सहज महसूस करवाने के लिए सुनील बोले, "अरे आप सुकचाईए मत। ये घर, ये कमरा आप ही का है। मैंने नीचे देखा था आप घरवालों की भीड़ में असहजता महसूस कर रही थी। इसी लिए सिम्मी से कहा कि आप को उपर ले जाएं। अरे बहुत भीड़ रहती है हमारे घर में मैं स्वयं तंग आ गया हूं इस भीड़ से। ऐसा करेंगे कुछ दिन यहां रहेंगे फिर मैं अपना तबादला कहीं दूर करवा लूंगा पीछा छूटेगा इस भीड़ भाड़ से।"
तनु आश्चर्य से सुनील की ओर देख रही थी कि इन्होंने तो मेरे बिना कहे ही मेरे मन की बात कह दी।
शादी के दो चार दिन में ही तनु को मां की बात याद आने लगी। मां ने कहा था कि संयुक्त परिवार की कोई रीस नहीं कर सकता। सुनील के ताऊजी और चाचाजी सब साज ही एक बड़ी सी हवेली में रहते थे। तनु ने देखा बातों ही बातों में पता ही नहीं चलता था कब दिन बीत गया। उसे शादी के कितने दिन बाद पता चला कि सिम्मी सुनील के ताऊजी की लड़की है। ताऊजी के बच्चे और चाचा जी के बच्चे सब मिल कर खूब धमाल करते और सुनील उन सब का हेड होता था। एक के यहां मेहमान आता तो सब के घरों से पकवान बनकर आ जाते और मेहमान की थाली भर जाती। एक दिन सुनील की मोटरसाइकिल किसी से टकरा गयी थोड़ी बहुत खरोंच आयी। ताऊजी ने उस बन्दे को जेल की हवा खिला दी। तनु संयुक्त परिवार से जितनी घृणा करती थी अब उसे प्यार होने लगा था संयुक्त परिवार से। सुनील ये नोट कर रहा था।
एक दिन सुनील ने तनु को अपने कमरे में बुलाया और बोला, "अब सामान पैक करना शुरू कर दो हमें अगले हफ्ते निकलना है। ये देखो मैंने बैंगलोर तबादला करा लिया है। तुम्हें भी ये भीड़ भाड़ अच्छी नहीं लगती और मुझे भी।"
तनु ने तबादले के कागज देखे तो उसके आंखों में आंसू आ गये। उसने सुनील से छुपा लिए अपने आंसू और बोली, "कहां मथुरा और कहां बैंगलोर। तुम ऐसा करो अपना तबादला कैंसिल नहीं करा सकते। इतनी दूर जाएंगे। तो मां जी को कौन देखेगा, ताई जी के घुटनों की मालिश कौन करेगा। मैं ही तो अकेली बहू हूं इस घर में। बेटियों से ताईजी हाथ नहीं लगवाती पैरों को।"
सुनील ने देखा तनु का बोलते बोलते गला भर आया था। उसने तनु को जोर से सीने से लगाया और बोला, "प्रिय ये तो मेरा नाटक था तुम्हें हमारे संयुक्त परिवार की खासियत बताने का। मुझे पता था कि तुम शादी के लिए इनकार कर रही थी क्योंकि कि हमारा संयुक्त परिवार था। पर मुझे ये भी पता था कि मेरे परिवार का लाड प्यार तुम्हारी सोच को बदल देगा।" ये कहकर उसने तबादले वाले कागज फाड़ दिये। तनु अश्रुपूरित नेत्रों से ओर होंठों पर हंसी लिए सुनील के सीने में समा गयी।
