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सुनहरी गाय

सुनहरी गाय

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सुमन कहाँ हो तुम तुम्हें पता होता है, मुझे सुबह सुबह अपने मौजे और जूते चाहिए होते है। कितनी ठंड है बाहर बाप रे बाप फिर भी तुम रैक पे नहीं रखती हो, रोज की तरह सुबह चैतू ने उठते ही कहा।

चैतू रोज सुबह 4-6 बजे तक रेलवे क्रॉसिंग पर चाय का ठेला लगता है,और उसके बाद शाम को डिस्ट्रिक पार्क के आगे समोसे और जलेबी बेचकर अपनी गरीब और मजबूर ज़िन्दगी गुजार रहा है। सुमन भी घर गृहस्थी में उसका पूरा हाथ बंटाती है।

वही तो रखे है जूते, पता नहीं तुम्हारी नजर कहाँ होती है किचन से चाय बनाते हुए सुमन ने जबाब दिया।

अच्छा बाबा मिल गए , जल्दी से चाय पीला दो आज तो देर ही हो गई। रमेश ने मेरे ठेले की जगह पर अपना ठेला लगा लिया होगा। आज तो उससे फाइनल हिसाब ही कर लूंगा और उसका ठेले का झंझट ख़तम कर दूंगा, रोज मेरे ग्राहक ख़राब कर देता है। चाय की चुस्कियां लेते हुए चैतू ने सुमन से कहा।

अच्छा सुमन में चलता हूँ, माही को टाइम पे स्कूल छोड़ देना। माही का माथा चूमते हुए चैतू ने कहा।

अच्छा बाबा अब जाओ भी क्या अब बाप बेटी, यही पर दुलार करते रहोगे या काम धाम भी होगा। ताना मरते हुए सुमन ने कहा।

पापा शाम को आते हुए आईस्क्रीम लेते हुए आना। माही ने नींद में बुदबुदाते हुए कहा।

अच्छा बेटा ले आऊंगा कहते हुए चैतू ने अपना ठेला आगे बढ़ाया।

रास्ते में ठेले को ले जाते हुए चैतू खुद से बात करते और दिमाग में सोच रहा था- एक दिन मेरी माही बड़ी होकर बड़ी आदमी बन जाएगी और फिर मुझे पूष की इन ठंडी रातो में उठके ठेला नहीं लगाना पड़ेगा। सोचते हुए वह तेजी से ठेले को आगे बढ़ा रहा था।

तभी ठेले के रेलवे क्रासिंग के पास पहुंचने पे चैतू ने देखा की पटरियों के पास एक बूढी गाय पड़ी हुई है और ठण्ड से बुरी तरह काँप रही थी।

पता नहीं कैसे-कैसे लोग होते हैं दुनिया में जो गाय माता को ऐसे छोड़ देते हैं, जब तक दूध देती है तब तक रख लेते है और आज जब बूढी हो गई तो मरने के लिए छोड़ दी है, मुझे क्या है जिसकी है वो सोचे खुद से बात करते हुआ चैतू ठेला लेके पलेटफोर्म के पास पहुँचा।

आज रमेश अभी तक तो आया नहीं था, बाप रे बाप बच गया मेरी जगह पर किसी ने ठेला नहीं लगाया वरना दुकानदारी ख़राब हो जाती, यह सोच के चैतू मन ही मन में बड़ा खुश हो रहा था।

माही रोज की तरह सुबह उठ के स्कूल गई, स्कूल में हर क्षेत्र में माही अब्वल आती है, आज उसकी दसवीं क्लास का रिजल्ट आना है, और अपने पुरे खानदान में दसवीं पास करने वाली वो पहली लड़की बनने वाली थी

गुरूजी रिजल्ट सुना रहे थे और सुमन की जिकुड़ी (धड़कन) धकधक कर रही थी तभी मैडम ने कहा- माही, हमारे स्कूल की शान माही आज हमारे स्कूल से चली जाएगी क्योंकि वो दसवीं क्लास में फर्स्ट डिवीज़न से पास हो गई है। सुनते ही माही तो ख़ुशी से मन ही मन नाचने लगी और सुमन की आंखे आज नम हो गई और फफक- फफक रोने लगी और चैतू को फोन किया- अजी सुनते हो, आज हमारी माही फर्स्ट आयी है, अब उसके लिए साइकिल ले लेना, बता दे रही हूँ।

चैतू ने माही से प्रॉमिस किया था, दसवीं पास के बाद साइकिल खरीद के दे देगा, दसवीं पास की खबर सुनते ही चैतू फूला नहीं समा रहा था, आज उसने क्या पा लिया हो, होता भी क्यों नहीं पहली बार पूरे खानदान में किसी ने दसवीं क्लास पास की थी। चैतू खुद तो कभी नहीं पढ़ पाया लेकिन वो माही को हमेशा से बड़ा इंसान बनाना चाहता था।

माँ-बेटी दोनों स्कूल से घर आई इतने में चैतू भी अपना ठेला लेके शाम को थक हार के घर पंहुचा। पहुँचते ही दोनों हाथों से माही को आईस्क्रीम दी, आज चैतू माही की पसंद की सारी आईस्क्रीम लेके आया था, पूरा परिवार आज बेहद खुश था, चैतू ने सुमन की तरफ देखते हुए कहा हमारी ज़िन्दगी में आने के लिए धन्यवाद, आंखें नम हो चुकी थी चैतू की, चैतू जानता था बिना सुमन की मेहनत के ये मुमकिन नहीं था क्योंकि चैतू माही को ट्युशन भी नहीं पढ़ा सकता था, दो वक्त की रोटी का इंतजाम बड़ी मुश्किल से होता था, ट्यूशन तो नामुमकिन ही था, वो तो सुमन थी जो दिन रात माही को पढ़ाया करती थीदोनों की आंखे नम थी और माही की ख़ुशी से चमकती हुई आंखें थी।

देखना पापा एक दिन में कबड्डी की बहुत बड़ी खिलाडी बनूँगी, दोनों हाथों से आइसक्रीम कहते हुए माही ने कहा, अरे बेटा आराम से खाओ, पूरी आइसक्रीम पिघल के हाथों पे लग गई सुमन ने माही की तरफ देखते हुए कहा, अच्छा मम्मी आप खाना बना लो में और पापा छत पे आग सेकते हुए, लकड़ी की काठी खेलेंगे, ठीक है जाओ खेल लो, सुमन ने आटा गोंदते हुए कहा।

माही चटाई लेके जाओ, नहीं तो कपडे ख़राब हो जायेंगे, अचानक किचन से आवाज आई।

ठीक है मम्मी ले जायेंगे। माही ने जबाब दिया।

लकड़ी की काठी का घोडा,

घोड़े की दम पे जो मारा हथोड़ा,

घोड़ा दौड़ा, दौड़ा दम दबा के दौड़ा।

ये लोरी गीत माही पापा के पीठ पे बैठ के गा रही थी, १४ साल की हो चुक्की है पर बचपन नहीं गया तेरा, चैतू ने माही के गालों को खेंचते हुए कहा।

तभी आग सेकते हुए चैतू को उस गाय की याद आई, अरे वो तो इतनी ठण्ड में जाड़े में काँप रही होगी, पापा किस सोच में डूब रखे हो अचानक माही ने पापा का पैर हिलाते हुई कहा।

कुछ नहीं बेटा वो सुबह जहाँ में चाय का ठेला लगता हूँ वहां एक बूढी गाय ठण्ड से ठिठुर रही होती है, बड़ी कांपती है बेचारी और इस टाइम तो इतनी ठण्ड है i पता नहीं कैसे करके रह रही होगी, छोड़ो हमें क्या है जिसकी गाय होगी वो जाने। पाप तो उसे लगेगा। चैतू ने बात को ख़त्म करते हुए सीढ़ियों से उतरते हुए कहा, लेकिन इस बात ने माही को अंदर तक झिंझोड़ दिया।

माही बेटा खाना तैयार है आ जाओ चलो सुमन ने किचन से आवाज लगाई, चैतू ने जमीं पे पुराना फटा बोरा बिछाया और खाने की तैयारी की, आज तो सिवईं, पनीर , रोटी , दाल सब माही का पसंद का बना था।

माँ ने खाना रखा, चैतू ने खाना स्टार्ट किया, मैं नहीं खाउंगी भारी स्वरों में माही की मुँह से गुस्से में आवाज निकली।

क्या हुआ बच्चे, सुमन ने पूछा, पहले पापा को बोलो वो उस गाय को घर लेके आएंगे, कौन सी गाय सुमन ने पूछा।

सुमन के पूछने पर चैतू ने सारी बात सुमन को बताई, अच्छा बेटा ज़िद नहीं करते, हमारे घर में इतनी जगह नहीं की गाय को भी रख सके और हमारा खुद का दो वक्त की रोटी का इंतजाम बड़ी मुश्किल से होता है तो गाय को कैसे पालेंगे, सुमन ने माही के सर को सहलाते हुए कहा, लेकिन माही अपनी ज़िद पर अड़ी रही। थक हार कर चैतू ने माही को कहा- कल चल के ले आना उस गाय को घर, खुश, अब खाना खालो।

पूरी रात माही सुबह होने का इन्तजार कर रही थी। एक अजीब से बेचैनी थी उसके दिल में उस गाय को लेके। रोज की तरह अगले दिन सुबह सुबह, चैतू ने ठेला तैयार किया और निकलने लगा, तभी माही ने कहा पापा में सूरज निकलने के बाद माँ के साथ आऊँगी आप उस गाय को बाँध के रखना।

चलो न मम्मी फिर उस गाय को कोई और ले जायेगा, सूरज निकल आया है पापा ने कहा था सूरज निकलते ही आ जाना, माही ने बाड़े चिड़चिड़ेपन सुमन से कहा, अच्छा बाबा चल तो रही हूँ, चलो,

माँ बेटी दोनों चैतू के दुकान के पास पहुंचे, वही पे वो बूढ़ी गाय आसहये से पड़ी थी और मैंने जैसे खुदा से सिर्फ मौत मांगती हो, सारे दुकानदार उसे ठेले के पास आते ही दिन भर मारते और दूर भागते, शरीर से जगह जगह मार के निशान के कारन खून निकल रहा था,

पापा इसका नाम सुनहरी रखेंगे, देखो कितनी प्यारी सुनहरी गाय है, माही ने ख़ुशी से चैतू से कहा।

सुमन ने माही के सर पर हाथ फेरा और इतनी छोटी उम्र में दूसरों के लिए ऐसा असीम प्रेम देख के वो माही को गर्व से देखने लगी,

माँ चलो सुनहरी को बांधो और ले चलो, सुमन ने सुनहरी को बाँधा और घर ले आये, आज चैतू भी जल्दी आ गया शाम का ठेला नहीं लगाया क्योंकि सुनहरी के लिए रहने का बंदोबस्त करना था। घर के आँगन में ही उन्होंने घास का एक छप्पर बनाया और सुनहरी को वहाँ बाँध लिया। अब रोज सुबह सुनहरी चरने जाती और शाम तक घर लौट आती, शाम को स्कूल से आने के बाद माही उसकी खूब सेवा करती, मानों दोनों की जन्मों की दोस्ती हो। धीरे-धीरे सरीर के सरे घाव ठीक होने लगे और सुनहरी अच्छी होने लगी, इस तरह कब एक साल बीत गया पता ही नहीं चला।

माही भी अब 11th क्लास में जाने वाली है लेकिन उससे पहले उससे अपने स्कूल की तरफ से राज्य स्तरीय कबड्डी प्रतियोगता में अपने स्कूल से भाग लेना है, हमारी गाय माँ बनने वाली है सुमन ने चैतू से कहा, क्या ! चैतू ने पूछा सच में जी हाँ सुमन ने सिर हिलाते हुए कहा।

तभी माही बोली पापा एक खुशखबरी और है, मैं स्कूल की तरफ से कबड्डी खेलने जाऊँगी और मास्टर जी ने कहा है, अगर हम अच्छा खेलेंगे तो हमें राष्ट्रीय टीम में जगह मिल जाएगी और फिर में देश के लिए खेल पाऊँगी। सुनते ही पुरे घर में खुशी की लहार दौड़ पड़ी।

अब तो मैं अपना चाय के ठेले के लिए दूध भी खरीदूंगा नहीं, सुनहरी के दूध से ही काम चल जायेगा और चाय में ज्यादा फायदा होगा, चैतू ने सुमन से कहा।

देखा मैं कहती थी न पापा सुनहरी हमरी एक दिन मदद करेगी, आज देखो वो हमें दूध देके अपना कर्ज उतार देगी।

कुछ ही दिनों में सुनहरी ने एक बछड़े को जन्म दिया और रोज का आठ से दस किलो दूध देती है सुनहरी

चैतू के तो जैसे लॉटरी निकल गई थी घी दूध जी भर के मिलता था।

कबड्डी प्रतियोगिता के लिए दिल्ली जाना है तुम्हें अगले महीने मास्टर जी ने माही की तरफ हाथ हिलाते हुए कहा,

हैलो माही के घर से बोल रहे हो, जी हाँ सुमन ने जबाब दिया, जी आपकी बेटी का एक्सीडेंट हो गया है आप जल्दी से पुराने बस स्टॉप के पास आ जाइये, कोई मोटर साइकिल वाला उसके पैर पे मार के चला गया और माही बेहोश है।

सुमन बस स्टॉप पे पहुंची तो माही बेहोश पड़ी थी, तब तक चैतू भी आ पंहुचा दोनों ने उठाया और शहर के डॉक्टर के पास ले गए,

जी चिंता की कोई बात नहीं है बस पैर में फैक्चर है आप २० हजार जमा करा दो पैर पे पलास्टर लगाना पड़ेगा डॉक्टर ने चैतू के कंधे पे हाथ रख के कहा, २० हजार ! हमारे पास तो २००० नहीं है, २०,००० कहाँ से लाएंगे, सुमन ने रोते हुए कहा,

तभी चैतू ने कहा एक बार लाला (बनिया) जी से कहते हैं शायद वो उधर दे दे।

लाला जी मुझे २० हजार की जरूरत है, क्यों भइया चैतू आज क्या मुसीबत आन पड़ी २० हजार की लाला ने पूछा,

लाला मेरी बेटी का एक्सीडेंट हो गया है उसके इलाज के लिए २० हजार चाहिए।

पर चैतू अब तो तू मेरे से दूध भी नहीं खरीदता है तो मैं तेरे को पैसे नहीं दे सकता, सिर्फ एक शर्त पे दे सकता हूँ तुझे अपनी गाय मेरे पास गिरवी रखनी पड़ेगी, बाड़ा नाम सुना है सुनहरी का जरा देख तो लू कितना दूध देती है, सुमन ने सर हिला के कहा ठीक है, तो ठीक है ये लो २० हजार लाला ने करारा नोटों का बण्डल, ग़ल्ले से निकल के चैतू के हाथों में थमा दिया।

देख भइया जब तक २० हजार पाँच टक्का ब्याज के साथ वापिस नहीं करोगे तब तक सुनहरी मेरी और इसका सारा दूध को बेच के जो पैसे आएंगे वो मेरे।

सुमन और चैतू भागते हुए हॉस्पिटल पहुंचे डॉक्टर साहब ये लो २० हजार, कुछ देर के सन्नाटे के बाद डॉक्टर रूम से बाहर आया।

अब कैसी है मेरी बेटी सुमन ने रोते हुए पूछा-

अब आप मिल सकते हो उससे, सुमन और चैतू दौड़ते हुए उस कमरे तक पहुंचे देखा माही की आंखें भी उन्हें देख रही थी।

पापा देखना में कबड्डी जित के आपका नाम बहुत बड़ा कर दूंगी, रोते हुए माही ने कहा,

अच्छा पहले तुम ठीक हो जाओ फिर ये सारी बातें करना सुमन ने माही के सर पर हाथ फेरते हुए कहा

एक हफ्ता हो चूका था माही को हॉस्पिटल में, डॉक्टर अब माही को घर ले जा सकते है सुमन ने पूछा, जी हाँ बिल्कुल शी इज फिट नव....डॉक्टर ने कहा-

माही आज हफ्ते बाद घर आ रही थी, रस्ते भर पूछती रही माँ सुनहरी कैसी है और उसका बच्चा कैसा है, सुमन चुपचाप सी बैठी रही, घर पहुंच के माही ने देखा की सुनहरी का तो कीला (खूंटा ) खाली पड़ा है।

तब सुमन ने बताया बेटा तेरे इलाज के लिए पैसों की जरुरत थी इसलिए हमें सुनहरी को गिरवी रखना पड़ा

आज माही मन ही मन रोने लगी थी, अब धीरे धीर माही ठीक होने लगी और कबड्डी के लिए भी तैयार थी, दो दिन बाद तुझे दिल्ली जाना है बेटा, माँ ने माही से कहा,

अगले दो दिन बाद सुबह सुबह स्कूल के मास्टर जी का फोन आया माही बस स्टैंड पे मिलो, वही से आप हमारे साथ दिल्ली चलोगी, माही ने माँ और पापा के पैर छुए और बस स्टैंड की और चलने लगी जाते हुए उसने सुनहरी के खली खूंटे की और देखा और रोने लगी।

माँ मैंने कबड्डी प्रतियोगता जीत ली है, माही ने फ़ोन करके सुमन को बताया, सुमन की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और उसने तुरंत चैतू को फोन किया चैतू बड़ा खुश हुआ और उससे नाज हुआ अपनी बेटी पर

माँ में कल आऊँगी वापस फोन करके माही ने कहा-पूरे गाँव और घर में खुशी का माहौल था, आज गांव की बेटी राज्य का नाम बड़ा करके आ रही थी, लोगों का जमावड़ा चैतू के घर पे लगा था, तभी आवाज आयी पापा मैं आ गई और देखो मेरे साथ कौन आया है, हमारी सुनहरी, प्रतियोगता में जो पचास हजार ईनाम मिला उन्ही पैसो से में लाला का कर्ज उतार आई और अपनी सुनहरी को ले आई, चैतू ने प्यार से माही का माथा चूमा को सीने से लगा कर कहा मेरी बेटी अब बड़ी हो गई, माँ बेटी और बाप तीनों आपस में एक दूसरे पे लिपट गए।


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