सोरठी बृजाभार 14
सोरठी बृजाभार 14
थोड़ी दूर निकल जाने पर एक बैल गाड़ी उन्हे मिल जाती है, वह उस पर पूरा सामान लाद देते हैं, और आगे बढ़ते हैं, चलते चलते वह एक गांव के किनारे पहुंचते हैं, और वहां के मुखिया के पास जाकर गांव में शरण देने का निवेदन करते हैं तो वह उनके बाते में पूछता है।
ब्रह्मदेव कहता है, " हम निरीह ब्राह्मण है, मेरा नाम ब्रम्हदेव है, ये मेरी पत्नी वसुधा है और वह मेरा पुत्र छबीनाथ है, हमें गांव से निष्कासन कर दिया गया है, तो हमे कहीं शरण तो लेना ही होगा।
वह मुखिया कहता है, ""तुम तो सेठ धनिक लाल के ग्राम के हो तुम्हारे इसी दुर्बुध्धि पुत्र ने उनकी पुत्री के साथ अनुचित व्यवहार किया है ना, हम ऐसे लड़के को अपने ग्राम में नही रहने दे सकते हैं, हमारे घर में भी जवान लड़कियां हैं,"
इसी प्रकार कई ग्रामों में घूमते घूमते वह थक गए थे, बैल गाड़ी वाहक भी परेशान हो गया था, वह कहता है, " ब्राम्हण देव आप लोगो का कोई स्थान निश्चित नही है, तो मैं कहां तक ले कर जाऊंगा, मुझे मेरा पूरे दिन का दाम दे दीजिए अब मैं और आगे नही जा सकता हूं, "
उस समय वह लोग एक वन के किनारे खड़े थे गाड़ी वाहक वहीं समान उतार देता है, ब्रह्मदेव उसे एक सुवर्ण मुद्रा देता है तो वह प्रसन्न होकर जाता है।
वसुधा कहती है, " नाथ हम कहां जाएंगे।
ब्रह्मदेव कहते हैं, " हमसे पहले हर जगह हमारे पुत्र की कीर्ति पहुंच चुकी है, हमे कोई भी अपने ग्राम में नही रहने देगा, अब हम इसी वन में अपनी कुटिया बना लेते हैं।
वह सामने ही बांसों का झुरमुट दिख गया था, वह उस और बढ़ गया।
रात्रि भी होने वाली थी, वसुधा भी वहीं चूल्हा बनाने लगाती है, और कुछ लकड़ियां ढूंढ लाती है, और चूल्हे पर खाना चढ़ा देती है, पूरे दिन भुने चने खा कर चला लिया था पर रात्रि में तो भोजन चाहिए ही था, चोटिल बेटे को औषधि भी देनी थी, वह थोड़ी ही देर में भोजन चढ़ा कर, बेटे के लिए औषधि पिसने लगती हैं,
ब्रह्मदेव बांस गाड़ कर, कुटिया बनाने लगते हैं।
सुबह सुबह ब्रम्ह मुहूर्त पर उठकर दोनो पति पत्नी नित्यकर्म करके अपनी पूजा पाठ भी समाप्त करते है, वन के पक्षी भी अपने अपने गंतव्य स्थान की ओर चल देते हैं।
वन के जानवरो की स्वर भी सुनाई देने लगते हैं, ब्रम्हदेव अपनी गाय माता का दूध दूह कर वहीं चरने के लिए छोड़ देते हैं, उसका बछिया बचा हुआ दूध पीने लगती हैं, ब्रह्मदेव आवश्यकता अनुसार ही दूध दुहते थे बाकी बच्चे के लिए छोड़ देते हैं।
वह दूध वसुधा के पास रख कर कहते हैं, " प्रिए मैं भिक्षा मांगने जा रहा हूं, और साथ ही बच्चो को यहां आकर शिक्षा ग्रहण करने का आग्रह भी कर आता हूं।
वह जाते है, वसुधा औषधि लेकर छबीनाथ के पास जाकर उसका पट्टी खोलकर घाव देखती है, और कहती है, भगवान की कृपा से तेरा घाव भर गया पुत्र छबि, आज एक बार और लगा देती हूं, अब आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
छबीनाथ उदास कहता है, " इस घाव के भरने ना भरने से क्या अंतर पड़ता है, मां ? आत्मा विहीन शरीर तो पार्थिव ही कहलाता है,"
वसुधा चीख कर कहती है," छबि ऐसी अशुभ बाते नही करते हैं पुत्र, तु उस देवकुमारी को भूल क्यों नहीं जाता है।
छबीनाथ कहता है, "" प्रयास करना व्यर्थ है मां, वह मेरे रग रग में समाई हुई है, कैसे भुला दूं,
वसुधा कहती हैं, " अरे निर्लज्ज तुझे मेरी और अपने उस निरीह पिता पर लेश मात्र दया नही आती है, इतना सब कुछ हो जाने के पश्चात भी तु उसी के प्यार में बावरा बना पड़ा है, तेरा ज्ञान तेरा विवेक सब नष्ट हो चुका है क्या।? तुझे अपने कर्तव्य का भी बोध नहीं रहा ?
छबीनाथ कहती है, " सब बोध है मुझे, मैं तुम दोनो को तनिक भी कष्ट नहीं देना चाहता हूं, किंतु यह भी सत्य है की मैं देवकुमारी के बिना एक पल भी नही रह सकता हूं, मां मुझे एक बार देवकुमारी से मिल कर आने दो "
वसुधा चौक कर देखती है और कहती है, " इतना सब कुछ होने के बाद भी उस से मिलने जायेगा।
छबीनाथ कहता है," मां तुझे मेरी सौगंध एक बार अंतिम बार उस से मिल कर आ जाऊं उसके बाद तुम जो कहोगी सब मान लूंगा।
वसुधा कहती हैं, " पुत्र अपनी सौगंध देकर मुझे विवश ना करो, तुम्हे कुछ हो गया तो हम तो वैसे ही मर जायेंगे।
छबीनाथ कहता है, " मुझे कुछ नहीं होगा मां एक बार देखकर लौट आऊंगा "
वसुधा कहती हैं मेरा मन नहीं मान रहा है
छबीनाथ कहता है, " मां तो चिंता मत कर मैं पिताश्री के आने से पहले आजाउंगा,"
वह अपनी मां के पैर छू कर भागता है, वसुधा की आंखो में आंसु आते हैं,
उधर देवकुमारी ने खाना पीना सब छोड़ दिया था,
पद्मा कहती हैं, " देवकुमारी यदि तुम इसी प्रकार जिद्द पर अड़ी रहोगी तो स्वास्थ का क्या होगा।?
देवकुमारी कहती हैं " मुझे इस घर का पानी भी जहर लग रहा हैं, मैं मर जाना उचित समझूंगी, मुझे नही जीना है, तुम मेरे सामने से हट जाओ, ,"
पद्मा जाती है, वही एक ओर खड़े कर्कोटक और केतकी उसकी मनो स्थिति पर मुस्कराते हैं,
कर्कोटक कहता है, " इसकी व्याकुलता देख मन प्रसन्न हो गया, कितनी तड़प रही है अपने प्रेमी के लिए "
केतकी कहती है, " अभी तो आरंभ है कर्कोटक आगे आगे देखो इनका अंत बहुत ही भयानक होनी चाहिए, मुझे तो छबीनाथ के आने की प्रतीक्षा है, ,"
दोनो ही कालिया और दाई के रुप में ही है,
कर्कोटक कहता है, " छबीनाथ कैसे आ पाएगा, अभी दो दिन पूर्व टूटी हड्डियों के जुड़ने के बाद ही तो आयेगा, "
केतकी कहती हैं, " उसके घाव भर गए हैं, मैने ऐसी औषधि की व्यवस्था करवा दीया था जिस से वह तुरंत ठीक हो गया, और वह अब वहा से अपनी प्रेयसी से मिलने निकल भी चुका है।
कर्कोटक कहता है इस बार ऐसा मार मरूंगा की हिल डुल भी नहीं पाएगा।
केतकी मुस्कराकर कहती है " जो भी करना सावधानी से करना, किसी को तनिक भी संदेह न होने पाए।
तभी उन्हे बाहर कोलाहल सुनाई पड़ता है, दोनो चौक कर बाहर जाते हैं।
क्रमशः
