सोरठी बृजाभार 10
सोरठी बृजाभार 10
ब्रह्मदेव अपने घर में चिंतित सा चहल कदमी कर रहा है, सामने वसुधा बैठी है।
वसुधा उसे चिंतित देख कहती है," देखिए आर्यपुत्र, मेरा मन नहीं मानता, मेरा छबि ऐसा नहीं है, वह तो भोला भाला सरल बालक।
ब्रह्मदेव कहता है, " तुम्हे बालक लग रहा है, अठारह वर्ष का नवयुवक हो गया है, तुम उसे बालक कहती हो, ? वसुधा मेरा और तुम्हारा विवाह सोलह वर्ष की आयु में हो गई थी सत्रहवे वर्ष में छबीनाथ आ गया था, "
वसुधा कहती हैं, " यह भी तो हो सकता है की सेठ जी से भूल भी तो हो सकती हैं, "
ब्रह्मदेव कहता है, " भूल, ? वसुधा, ये कोई साधारण बात नही है, यह एक कन्या की बात है उसके माथे पर एक बार कलंक का टीका लग गया तो सात पीढ़ियों तक मर्यादा कलंकित हो जाती है, और धनिक लाल इतने बुद्धिहीन नही है जो अपनी ही कन्या के बारे में कुछ भी कहेगा,"
उसी समय छबीनाथ घर पे प्रवेश करता।
वह पिता को देख चौकता हैं, "
छबीनाथ कहता है, " पिताश्री आप।
ब्रह्मदेव कहता है, " क्यों ? क्या मैं सूर्यास्त से पहले कुटिया पर नही आ सकता, "?
छबीनाथ कहता है " क्यों नहीं,,किंतु आप इस प्रकार रूष्ट क्यों हैं, कोई विशेष बात हो
गई है क्या "??
ब्रह्मदेव कहता है, " हां और विशेष बात और विशेष न हो जाए उस से पहले तुम स्वयं को सम्हाल लो। ब्रमहृषि गौतम की संतति इस तरह एक वैश्य पुत्री के कारण कलंकित हो यह मेरे सहन शक्ति से परे है, यदि कुछ नही करना है तो भीक्ष। यापन करो, मुझे तुम्हारा शीघ्र विवाह भी करना होगा,
ब्रह्मदेव बाहर चले जाते हैं, छबीनाथ मां को देखता है, उसकी आंखो में आंसु आता है,
छबीनाथ कहता है, " मां मुझसे भिक्षा नही मांगी जाएगी, मैं भिक्षा मांगने नही जाऊंगा, ""
वह मां से लिपट कर रोने लगता है।
वसुधा उसे समझाते हुए कहती है, " तुम्हारे पिता इस समय क्रोध में हैं, में उन्हे प्रातः समझा लूंगी, किंतु तुम देवकुमारी से पुनः कभी मत मिलना, अन्यथा दोनो कुल दूषित हो जायेगा, "
छबीनाथ को बहुत झटका लगता है, वह मां से कुछ नही कह पाता है, वह चुप चाप जाकर बाहर एक पेड़ के नीचे बैठ कर रोने लगता है,।
सुबह होती है सूर्य देव अपनी लालिमा बिखेरने लगती हैं, "
देवकुमारी अपने कक्ष में बैठी है, उसकी सखी पद्मा उसके केश सवार रही।
देवकुमारी कहती है " अरी तनिक जल्दी कर देख सूर्यदेव कितना ऊपर चढ़ गए हैं, "
पद्मा कहती हैं," तो क्या हुआ ? बगिया तक ही तो जाना है, थोड़ा विलंब हो जायेगा तो क्या अंतर पड़ जायेगा, "
देवकुमारी कहता है, " तु क्या जाने ? प्रतीक्षा की बितती एक एक घड़ी प्रहर के बराबर लगती है, और प्रहर दिन के बराबर लगता है।? बेचारा छबि कब से मेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा, "?
पद्मा मुस्कराकर कहती है, " बड़ी व्याकुलता दिखाई पड़ रही है, उधर छबि भी इसी प्रकार व्याकुल होगा, ??
वह देवकुमारी के केश सवार चुकी थी और कहती हैं, " चलिए प्रेम दिवानी जी, "
दोनो हंसते हुए जैसे ही कक्ष से बाहर कदम रखती हैं सामने दाई मां नजर आती है, देवकुमारी की माता तो उसके दो वर्ष के होते ही एक असहनीय रोग के कारण मृत्यु के काल में चली गई थी, तब से दाई मां ने हो उसे पाला पोसा था तो वह भी उसको मां की तरह ही भाव देती थी, "
दाई मां उस से पूछती है, " कहां चली जुगल जोड़ी, "
देवकुमारी कहती है, " वही दाई मां जहां प्रतिदिन जाती हूं बगिया के फुलवारी में, मुझे फूल बहुत प्यारे लगते हैं ना, "
दाई मां कहती है, " कौन सा फूल छबि, "
देवकुमारी चौक कर देखती है, " जी वो मैं, "
दाई बीच में ही बोलती है, " मैने सब कुछ सुन लिया है, इसका अर्थ है की नाई की बाते सच है, तुम अब बगिया में नही जाओगी।
देवकुमारी कहती है, " किंतु दाई मां, ??
दाई कहती है, " ये मेरा नही, तुम्हारे पिता का आदेश है, अब तुम छोटी बच्ची नही रही, और तुम्हारा किसी युवक से मिलना उचित नही है, इस से तुम पर और पूरे परिवार पर कलंक लग सकता है, पद्मा तुम देवकुमारी के साथ यहीं रहोगी, ताकि इसका मन लगा रहे, "
पद्मा घबराकर कहती है "जी दाई मां, "
पद्मा भी देवकुमारी के देख भाल के लिए ही रखी गई है, पर देवकुमारी ने उसे कभी सेविका माना ही नही था, वह उसे हमेशा अपनी सखी मानती थी दोनो हम उमर भी थी, "
दाई मां जाती है, देवकुमारी पद्मा को देखती है तो उसकी आंखो में भी आंसु आते हैं देवकुमारी उस से लिपट कर रोने लगती।
उधर बगिया के फुलवारी में छबीनाथ उदास सा खड़ा फूलो को निहार रहा था उसे सुंदर फूल भी नीरस से लगते हैं, सूर्यदेव सर पर सवार हो गए थे पर देवकुमारी नही आई, छबीनाथ से अब नही सहा जा रहा था, दोनो जब तक एक दूसरे को देख नही लेते थे, उन्हे चैन नहीं आता था, धीरे धीरे बादल छाने लगे थे और फिर जोर की बरसात भी होने लगी थी, छबीनाथ अभी भी उसकी प्रतीक्षा में भीगता हुआ खड़ा था सुबह से उसने अन्न का एक दाना भी मुख में नही डाला था।
देवकुमारी की भी यही स्थिति थी, उसने तो रो रो कर अपनी आंखे सूजा ली थी, "
इधर कर्कोटक और केतकी अचानक देवकुमारी के छत पर उतरते हैं।
केतकी कहती हैं, " यह अच्छा नही हुआ कर्कोटक देवक और पुष्पा मिलन तो होना ही चाहिए अन्यथा हमारा प्रतिशोध अधूरा रह जायेगा, "
कर्कोटक आश्चर्य से देख कहता है, "मिलन होना चाहिए, ,ये क्या कह रही हो केतकी, तुम्हे तो उनकी तड़प और वियोग ही देखने की इच्छा थी, मेरे हिसाब से जो हो रहा है वह तो ठीक ही है, अब परिणाम की प्रतीक्षा करो, "
केतकी कहती हैं " नही कर्कोटक, यदि इन्हे अभी इतने जल्दी अलग कर दिया जायेगा, तो उसका परिणाम वह नही होगा जो मैं चाहती हूं,,? मुझे इसी घड़ी की तो प्रतीक्षा थी, अब हमे अपना किया प्रारंभ करना होगा, "
कर्कोटक आश्चर्य से देख कहता है, " मैं कुछ समझा नहीं केतकी, ,?
केतकी कहती हैं,"हमे देवक और पुष्पा को इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के दृष्टि में कलंकित करना होगा इनका जीवन मृत्युतुल्य हों जाए, इन्हें अपने प्रेम से घृणा हो जाए, ये पुष्पा की दाई मां कहा।
कर्कोटक कहता है " पुष्पा नहीं देवकुमारी, कही तुम्हारी घृणा तुम्हे न डूबा दे इतना ध्यान रखना, चलो वह सबसे नीचे के कक्ष में।
क्रमशः
