समय बहुत ही बलवान है
समय बहुत ही बलवान है
तपती दुपहरी में फुटबॉल खेलकर लौटा, तो माँ ने आते ही आँचल से माथा पोछा।"क्या करता है, कितनी धूप है, और तुझे खेलने से मतलब, आजा गर्म रोटी खा ले, तेरी पसंद की सब्जी और खीर बनी है।"
वह तुरंत खाने बैठ गया। "क्यों माँ,आज क्या बात है"?
"तेरे पिताजी आ रहें हैं ,"माँ की आंखों में अलग ही रौनक थी। बहन सुमन भी आ गई, "भैया मेरे अच्छे नंबर आ गए तो बड़े कॉलेज में दाख़िला दिलवा देना"। "क्यों नहीं" उसने बहन के सिर पर हाथ फेरा।
राजीव ने बीकॉम की थी। पर उसका मन तो उसकी फुटबॉल पर अटका था। बापू के कहने पर ज़बरदस्ती पढ़ाई पूरी की। वो फुटबॉल में, जिले के कई मैच में भाग ले चुका था। राजीव की मेहनत और खेल की तरफ उसका रुझान देखकर उसके कोच को उससे बहुत उम्मीद थी। वो राष्ट्रीय मैचों में अपने चयन का इंतजार कर रहा था। सारे सपने साकार होते दिखते थे,"बापू को मना लूँगा, और माँ तो मनी मनाई है"।
पर जैसा हम चाहते हैं वैसा हो जाये तो जिंदगी आसान हो जाए।
शाम को लौटा तो घर पर लोगों का जमघट था, पहले तो कुछ समझ नहीं आया पर जब हिम्मत दिखा कर घर में पैर रखा तो प्राण ही निकल गये। बापू का शव ज़मीन पर था, माँ और बहन के रुदन और चीत्कार ने उसे झकझोर दिया। समय बहुत बलवान होता है। उसके आगे किसी की नहीं चलती। क्या राजा क्या रंक। यह समय भी निकल गया। रिश्तेदार जा चुके थे, का कर्ज माँ के जेवर बेचकर चुकाया। बम्बई में एक दोस्त ने अपनी फर्म में नौकरी दे दी। उसका सपना उसको आज भी याद था, हालांकि परिस्थिति आपको समझौता करना सीखा देती है।
अपनी मेहनत और लगन से राजीव ने जल्दी ही अपना जूतों का व्यवसाय शुरू कर दिया। माँ और बहन को फ्लैट खरीदते ही अपने पास बुला लिया।
एक शाम मैदान के पास से गुज़र रहा था कि एक फुटबॉल उसके पैर से टकराई। उसने किक मारकर वापस की। बच्चे समझ गये,"आप हमारे साथ खेलिये न प्लीज", फिर क्या था उसको तो लगा जैसे कि मुँह मांगी मुराद पूरी हो गई हो। बीस मिनट के खेल ने उसकी रंगत लौटा दी। जो सुख की अनुभूति हुई वो अतुलनीय थी। "आप हमारे कोच बनेगें?," बस शाम को कुछ देर, आपका जैसा कोच हमें नहीं मिलेगा। "प्लीज अंकल, प्लीज", बच्चे ज़िद पर अड़ गये। उसने मुस्कराकर सहमति दे दी। राजीव आँखों में खुशी के आँसू लेकर घर की तरफ चल दिया। शाम हो गई थी, पर कहीं तो सूर्योदय हुआ था।
