पवित्र रिश्ता
पवित्र रिश्ता
कुछ सफर कुछ पल यादगार बन जाते हैं मेरे साथ भी हुआ ऐसा ही एक किस्सा जो बन गया यादों के पन्ने का हिस्सा।
शायद था कोई वो फरिश्ता
एक बार सफर के दौरान मुझे जल्दी मैं ट्रेन पकड़नी थी ट्रेन चलने में पांच मिनट का ही समय शेष रह गया था मैं जल्दी-जल्दी अपनी अटैची लिए ट्रेन की तरफ दौड़ रही थी कि तभी मेरा पैर किसी चीज से अटका और मैं धड़ाम से गिर गई यहां तक कि मेरे कंधे पर लटका मेरा बैग भी गिर गया और उसमें से काफी सारा सामान बाहर निकल कर बिखर गया जबकि उस बैग में मेरा बहुत कीमती सामान था मेरी सारी आईडी आधार कार्ड इत्यादि उसी ब्रेक में थे।
सभी को जल्दी थी ट्रेन में चढ़ने की वरना ट्रेन छूट जाती सब भाग रहे थे ट्रेन की ओर यहां तक कि मेरे मेरा बैग से निकला व सामान और तितर-बितर हो गया और उस सामान पर पैर रखकर कई लोग आगे बढ़े जा रहे थे मैं बहुत परेशान और हैरान थी ।
तभी मेरे लिए तो मानो कोई फरिश्ता ही होगा इंसानियत के नाम पर एक इंसान ने मेरी मदद की मेरे बैंक से निकला सारा सामान एकत्र करके मुझे दिया और जल्दी-जल्दी मुझे मेरा हाथ पकड़ कर चलती हुई ट्रेन में चढ़ाया मैं तो ट्रेन में चढ़ गई तभी मेरी नजर प्लेटफॉर्म पर पड़े एक कागज पर पड़ी वह शायद मेरा आधार कार्ड था मैं ट्रेन से नीचे उतरने की जिद करने लगी
उस फरिश्ते ने मुझे रोका और कहा चलती ट्रेन से तुम नहीं उतर सकती गिर जाओगी मैं जाता हूं और वह किसी तरह ट्रेन से नीचे उतरा ,और प्लेटफार्म पर गिरा मेरा आधार कार्ड उठा लिया।
इतने में ट्रेन ने अपनी रफ्तार पकड़ ली फिर वह इंसान मुझे कहीं नहीं दिखाई दिया ना ही वह मेरे डब्बे में चढ़ा था मैं इधर-उधर ताक रही थी पर वह मुझे नहीं दिखा निराश हताश मैंने अपनी सीट पर बैठना उचित समझा और जाकर बैठ गई।
करीबन एक घंटे बाद एक कोई छोटा सा स्टेशन आया वहां गरम चाय वाला आया मैंने चाय वाले से एक चाय देने को कहा तभी पीछे से आवाज आई भाई दो चाय देना मैंने गर्दन घुमा कर देखा यह वही शख्स था
मैंने पूछा आप तो मुझे दिखे ही नहीं कहां चले गए थे वह बोला ट्रेन की रफ्तार बढ़ गई थी मैं किसी तरह दूसरे डिब्बे में चढ गया था यह लो तुम्हारा आधार कार्ड।
तभी चाय वाले ने दो चाय पकड़ाई चाय की चुस्कियां लेते हुए अच्छा तुम कहां जा रही हो मैं मैं दिल्ली जा रही हूं पढ़ाई के लिए और तुम मैं भी मैं वहां जॉब करता हूं।
अच्छा अगर आज आप मेरी मदद ना करते तो मैं यह ट्रेन ना पकड़ पाती और मेरा सामान भी शायद मुझे पूरा मिलता या ना मिलता पता नही ।
फिर हमने पूरे सफर में बहुत बातें की इधर-उधर की
उसका और मेरा कोई रिश्ता नहीं है और ना होने वाला है और ना ही शायद हम फिर कभी मिलेंगे यह वह भी जानता था और मैं भी फिर भी एक इंसानियत का रिश्ता जो जुड़ गया था हमारे बीच में और जो होना चाहिए एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति वह अनकहा अजनबी सुंदर पवित्र रिश्ता स्मरणीय है और रहेगा।
