Ashokalra Ashq

Drama Inspirational


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Ashokalra Ashq

Drama Inspirational


प्रतिशोध से मुक्ति The Clemency

प्रतिशोध से मुक्ति The Clemency

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जिस दिन दिनेश ने शहर के सबसे बढ़िया होटल में वेटर का काम शुरु किया, उसके अगले दिन से ही उसने जेब में छोटी सी ज़हर की शीशी रखनी शुरु कर दी। ये ज़हर भयानक कोबरा सांप का था जो उसने संपेरों से खरीदा था। उसके मालिक ने उसे ज़लील करके, पीट कर, पुलिस में दिया था, जबकि चोरी तो किसी और ने की थी। कोई सुबूत न मिलने पर पुलिस ने उसे छोड़ दिया था। वह दुआ करता था कि बदला लेने का एक मौका भगवान उसे दे।

और आज वो दिन आ गया था। उसका भूतपूर्व मालिक अपने परिवार सहित होटल में खाना खाने आया था। जब उसे ही उनकी टेबल पर सर्व करने का मौका भी मिला, तभी उसे पता चला कि आज भगवान ने उसकी सुन ली है। उसका भूतपूर्व मालिक किसी और ही धुन में था, उसने पहचाना ही नहीं। शायद उसके सिर पर वेटर की टोपी की वजह भी रही हो।

सबने अपनी पसंद के वेज सूप ऑर्डर किये। उसके भूतपूर्व मालिक ने अपने लिए चिकन सूप के लिए लाने के लिए कहा। खाने का ऑर्डर बाद में देने के लिए बोला गया। दिनेश ने किचन में ऑर्डर दे दिया। पहले वेज सूप बने तो वह सर्व कर आया।

अपना ऑर्डर न देख कर भूतपूर्व मालिक ने चिढ़ कर पूछा। तो उसने इशारे से बताया कि वह लेने जा रहा है। दिनेश मन में सोच रहा था, “मरने की इतनी जल्दी भी क्या है, कमीने।”

किचन से उसने चिकन सूप लिया और एक तरफ हो कर, सबकी नज़रें बचाते हुए उसने जेब से शीशी निकाली और ज़हर की कई बूंदे उसमें डाल दीं। ये सब करते हुए उसका दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था। लग रहा था जैसे गले में आ जाएगा।

दिनेश सूप लेकर चला। उसका भूतपूर्व मालिक फोन पर बात कर रहा था। उसने चुपचाप उसके सामने सूप रख दिया और एक तरफ खड़ा होकर ऑर्डर की प्रतीक्षा करने लगा। मालिक के परिवार ने खाने का ऑर्डर दे दिया और वह उसे लेकर किचन में आ गया।

उसका दिल बेतरह धड़क रहा था। आज से पहले उसने कोई गलत काम न किया था, आज करने भी लगा तो जघन्य अपराध। उसका दिल करने लगा कि जाए और सूप वापस ले आए, यह काम उचित नहीं था। क्या वह इसके बाद शांति से जी पाएगा? क्या उसे कुछ मिलेगा किसी को मारने जितना बड़ा अपराध करके? उसने तो आज तक चींटी भी न मारी थी। उसके किसी भी सवाल का जवाब अपने आप से ही ‘हां’ में नहीं मिल रहा था।

उसने शीशे से झांक कर देखा, भूतपूर्व मालिक अभी तक फोन पर ही था। उसे लगा कि वक्त उसे मौका दे रहा है कि वह अपनी गलती सुधार ले। उसने बरतन उठाने वाले को साथ लिया और उस टेबल पर पहुँचा। सभी सूप खत्म कर चुके थे। मालिक सूप में चम्मच हिला रहा था, उसने अभी लेना शुरु नहीं किया था।

“आप सूप छोड़ दीजिए, अब खाना आ रहा है, सर” उसने कहा और बाउल उठाने का उपक्रम किया। उसके इशारे पर बरतन उठाने वाला टेबल से झूठे बर्तन उठा रहा था।

“अरे नहीं, जब तक खाना आएगा, मैं पी लूँगा,” उसने चम्मच मुँह की ओर बढ़ाई।

“अरे नहीं, छोड़िए इसे, सर” उसने कहा और बाउल उठा लिया।

“ये तो बदतमीजी है, भूतपूर्व मालिक की त्यौरियाँ चढ़ गईं।" यह एक वेटर का असामान्य व्यवहार था और उसे गुस्सा एकदम आता था। रईसों की खानदानी बीमारी।

“अरे मालिक, आपने पहचाना नहीं, मैं दिनेश,” उसने कहा और अपने सिर से वेटर वाली टोपी उतारी।

“अरे हां, तुम तो दिनेश हो। लाओ सूप दो, मुझे भूख लगी है,” भूतपूर्व मालिक का गुस्सा खत्म हो गया था।

“मालिक ठण्डा क्या करोगे, मैं आपके लिए गर्म लेकर आता हूँ न। मेरे होने का कुछ तो फायदा हो,” वह चलने लगा।

“अरे रखो इसे, मुझे ठण्डा ही अच्छा लगता है,” उसने बाउल रखने का इशारा किया।

उसका दिल बेतरह धड़क रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था क्या करे। तभी कुछ बिजली सा कौंधा उसके दिमाग में। बाउल वापस रखते रखते वह उसमें से बाल निकालने का उपक्रम करते हुए बोला, “माफ़ करना मालिक, मैंने टोपी उतारी न, तो इसमें एक दो बाल गिर गए हैं।"

“आज लगता है, सूप मेरी किस्मत में नहीं है। ऐसा करो तुम खाना ले आओ बस,” भूतपूर्व मालिक ने कुछ उदास होते हुए कहा।

उसके कहते ही वह भागा वहां से। सूप को वॉशरुम में फ्लश किया और खाना टेबल पर ले आया। खाना सर्व करके वह जाने लगा तो भूतपूर्व मालिक ने उसे इशारे से उसे रोका और एक तरफ ले गया।

“सुनो दिनेश, मुझे तुम माफ़ करना, मैंने बड़ी ज्यादती की तुम्हारे साथ। चोरी तो शम्भू और रमेश ने की थी। बाद में पता चलने पर मैंने तुम्हें बहुत पता करवाया, खुद भी तलाशा, पर तुम्हारा पता ही नहीं चला। कभी भी नौकरी की जरूरत हो, एकदम मेरे पास चले आना, मेरे दिल का बोझ कम हो जाएगा,” उसकी आवाज़ में पछतावा झलक रहा था।

दिनेश सुन कर स्तब्ध रह गया। आज वह कितना बड़ा अपराध करने से बचा था। उसने मन ही मन उस फोन करने वाले को धन्यवाद दिया, जिसने उसे और उसके भूतपूर्व मालिक को बचा लिया था। किचन की ओर आते हुए, उसका दिमाग घूम रहा था।



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