प्रसव पीड़ा
प्रसव पीड़ा
लक्ष्मी जोर-जोर से हँसी के ठहाके लगाते हुए अपनी मित्र पार्वती से कहती है, मेरी बहू शीला का आठवाँ महीना चल रहा है। कुछ समय बाद मुझे फुर्सत भी नहीं होगी।
सब फर्ज निभा लिये अब बस दादी का फर्ज निभाना बाकी रह गया,
उतने में ही पार्वती की बहू आँचल चाय लेकर सामने आ जाती है और लक्ष्मी पार्वती की बहू आँचल से कहने लगती है। "क्या बात आँचल आजकल तो तू आती भी नहीं ?
तेरी प्यारी दोस्त शीला पेट से है। और हाँ कुछ समझा शीला को बात बात में पेट में दर्द हो रहा है कहती है। आखिर तू भी तो एक औरत !
इतना कहते ही अचानक लक्ष्मी चुप हो जाती और अपनी पलकें झुका लेती है।
क्योंकि आँचल कई सालो से मिसकैरेज का दर्द झेल रही थी।
और चेहरे का भाव समझ आँचल आँखों में आँसू लिए अपने कमरे में चली जाती और भगवान को याद करते हुए कहने लगती है,, दर्द तो मैंने भी बहुत सह लिया लेकिन शायद तेरी और दुनिया की नजर में मेरा दर्द प्रसव पीड़ा नहीं।
उद्देश्य - जैसा कि हम सभी को विदित है। आज की दुनिया में जिस महिला की कोख खाली होती है। उसे दुनिया की अन्य महिलाओं से अलग देखा जाता है।
और उन्हें कई अपमान जनक शब्दों का सामना करना पड़ता है। यह जानने के बाद भी की पीड़ा तो वह भी झेल रही होती है शारीरिक हो या सामाजिक, यह लघु कथा का एकमात्र उद्देश्य उन महिलाओं को भी सम्मान की नजरों से देखना व हमारे समाज का हिस्सा मानना है।
