नमो घाट की चाय
नमो घाट की चाय
हिंदुस्तानी घरों में शाम की पांच बजे वाली चाय सिर्फ चाय की चहास नहीं होती बल्कि रिश्तों में मिठास घोलने का नाम भी होती है। वैसे ये नाम घड़ी में भटके से आने वाले कांटे पर ही लागू होती है, वरना आये दिन तो चाय सिर्फ ढलते हुए सूरज को निहारने में निकल जाती है या फिर टीवी पर आनेवाली राजनैतिक खबरों की साथी बन कर रह जाती है।
मगर कभी कभी जब वहीँ हिंदुस्तानी घर शाम की चाय के रीती रिवाज़ को घर के बाहर या यूँ कहिये की दूसरे शहर ले जाती है तो वो चाय कब रायते की तरह फ़ैल जाती है ये पता चलते चलते वक़्त का मज़ा ही किरकिरा हो जाता है।
अब बात कुछ ऐसी है की हम गए बनारस अपने माता पिता को काशी विश्वनाथ धाम के दर्शन करवाने। चार लोगों की मंडली - माँ, बाप, मैं और मेरी फूल सी बहन।
प्लान बनाकर, ध्यान लगाकर, पहुंच गए जलती दुपहरिया में वाराणसी के खचाखच भरी स्टेशन में जहाँ भीड़ भीड़ नहीं बल्कि स्वयं महादेव के भक्तो की टोली हो। जहां जहां हमारे कदम रुके, वहां वहां हर हर महादेव के कड़ाके वाले नारे लगे, भीड़ भी अपने आप आगे बढ़ती गई और हम भी उस भीड़ के साथ आ गए स्टेशन के बाहरी हिस्से में। राज़ की बात बताएं तो तब जाकर हमने राहत की सास ली वरना तो मास्क के अंदर की घुट घुट कर साँसे लेने पर मज़बूर थे।
स्टेशन के बाहर आते ही हमारी माता जी को माता आ गई तस्वीरें खिंचवाने की, वो भी बैल के स्टेचू के साथ। अब बेचारा एक स्मार्ट फ़ोन - तस्वीरें ले या कैब बुक करे ? खैर, हमने दी कैब बुक करने की जिम्मेदारी अपनी फूल सी बहन को और खुद लग गए अपनी माता जी की तस्वीर खींचने। थोड़ी देर की मस्सकत के बाद ऑटो आई तो हमे भी लालच आ गया नास्टैल्जिया का। बस फिर क्या, ऑटो वाले भैया ने हमारा जैसे मन ही पढ़ लिया हो। उन्होने हमसे फ़ोन माँगा और तड़ातड़ खींच दी हमारी आठ फॅमिली फोटो। हालांकि हमे उनका ये आठ नंबर वाला गेम समझ में तो नहीं आया मगर ज़रूरी था टूरिस्ट होने का नास्टैल्जिया पूरा करना जो बिना तस्वीरों के कहाँ ही होता, वो भी फॅमिली पिक्चर। इतिहास गवाह है की हर बार कोई एक तो फ्रेम से बाहर ही रहता था, भला हो ऑटो वाले भैया का - इस बार थोड़ी टेढ़ी मेढ़ी सी सही मगर फॅमिली फ्रेम कम्पलीट थी।
करीब आधे घंटे की उथल-पुथल के बाद हम पहुंच गए अपने होटल। अब नाम तो बता नहीं सकते मगर इतना जान लीजिये की तबीयत चारों की खुश हो गई, इसलिए फाइव स्टार रेटिंग भी दे डाली हमने। होटल पहुंचने के बाद हम सब नहा धोकर, थोड़ा आराम फरमाने के बाद, काल भैरव जी के दर्शन के लिए तैयार हो गए, मगर वक़्त हो चला था करीब करीब पांच और शाम के पांच बजे का मतलब चाय की चहास। ऊपर से जब वो चाय हमे होटल की चमचमाती हुई खातिरदारी के साथ मिल रही हो तो उसकी बात ही कुछ अलग होती है।
पांच बजने में करीब पंद्रह मिनट बाकी थे, सब लगभग तैयार थे, लेकिन तभी हमारे पिताजी को चाय की याद आई तो उन्होंने डायल कर दिया होटल के किचन का नंबर और कर दी चार कप चाय ऑर्डर। जब हम सब ने सुना तो थोड़ी रफ्तार हमने भी धीमी कर दी। अब जब बैठे ही थे तो हमने सोचा की जब तक चाय आती है तब तक भोले बाबा के भजन ही सुने जाये। अब काशी आये है तो तन से मन तक खुद ही आध्यात्म की धुन में नाचने लगता है, वाकई में कुछ तो जादू है काशी की पावन नगरी में।
खैर, हमने ऑन कर दिया स्मार्ट टीवी और यूट्यूब पर चला दिया भोले बाबा के भजन, देखते देखते हमारा पूरा परिवार हो गया मगन। इतना मगन की कब साढ़े पांच बज गए पता ही नहीं चला। अचानक से डोर बेल बजी तो ध्यान आया की हम तो चाय का इंतज़ार कर रहे थे।
सफ़ेद और काले रंग के यूनिफार्म में होटों पर मुस्कराहट लिए पधारे रूम सर्विस स्टाफ, हाथों में बरसो से चली आ रही बोन चाइना की सफ़ेद चमचमाती क्राकरी में हमारी गरमा गरम चाय लिए। चाय के अंदर आते ही जैसे अलग ही ऊर्जा महसूस हुई हमें - एकदम घर वाली। …चाय पीते पीते बज गए छ। जिसके साथ शुरू होने लगी थी हमारे पिताजी का धैर्य की सीमा कम। हम फटाफट निकले, भागे और पहुंचे काल भैरव मंदिर। लेकिन भक्तों की लंबी कतार देखकर पेट में जैसे गैस बनने लगी।
लेकिन ये वक़्त गैस के बारे सोचने का नहीं बल्कि काशी के कोतवाल की इज़ाज़त और आशीर्वाद लेने का था। तो बस लग गए हम चारों कतार में - सबसे पीछे। संकरी गलियों से धीमे पाव चलते चलते करीब डेढ़ घंटे बाद हमारा नंबर आया दर्शन का, डेढ़ मिनट के दर्शन के लिए डेढ़ घंटे की कतार में इंतज़ार का मज़ा नहीं लिया तो क्या ख़ाक काशी आये हम ? सबसे मज़े की बात तो ये थी की उस कतार में जितनी बार हमने महादेव का नाम लिया होगा उतना तो पूरी ज़िन्दगी के साल मिलाकर भी नहीं लिया ही होगा। लेकिन शायद ये भोलेनाथ के नाम का ही असर था कि उन संकरी गलियों में काला सांड तो आया मगर बिना छेड़े अपने रास्ते चलता बना।
खैर, सपरिवार दर्शन के बाद समय काफी बचा था तो इच्छा हुई गंगा आरती देखने की, तो बस फिर क्या था, पहुंच गए हम नमो घाट क्यूंकि दश्वाशमेध घाट पहुंचने की हिम्मत ना तो छड़ी के सहारे चलने वाले हमारे पिता जी में थी और ना ही गठिया के दर्द से परेशान हमारी माता जी में। इसलिए अच्छी सुपुत्री होने के नाते हम दोनों बहनो ने नमो घाट जाने का प्लान बनाया और पहुंच गए। मगर प्लाट ट्विस्ट ये था की घड़ी में बज गए थे पौने आठ और आरती हो चुकी थी समाप्त।
फिर भी, दिल छोटा न करते हुए, हमे पहुंचे नीचे और जलती हुई आरती की थाल से हमने ली आरती, साथ ही एन्जॉय किया घाट का नज़ारा। वहां तक तो लगा सब ठीक चल रहा है मगर अचानक से हमारे पिताजी के मन में फेरी वाले जगमाते हुए बड़े से बोट पर गंगा घाट घूमने की इच्छा जागी, तो हमने सोचा ये भी ठीक है।
हम फटाफट पहुंचे बोट वाले से बात करने मगर वहां प्लाट ट्विस्ट था फिर से घड़ी के कांटे का। आठ बज चुके थे और अब फेरी नहीं चलने वाली थी। हम अपना छोटा सा मुँह लेकर सीढ़ियों से ऊपर आये और पिताजी को ये खबर दी तो उनका मुँह आठ साल के छोटे बच्चे की तरह गुब्बारे जैसा फ़ूल गया।
बड़ी दुविधा थी। भूख भी लगी थी और पिताजी का मूड भी सही करना था। थोड़ी देर इधर उधर नज़र घुमाने के बाद हमे दिखी एक चाय की बड़ी सी टपरी और दिमाग में ठनका एक मज़ेदार आईडिया। हमने पिताजी को चाय के लिए पुछा तो वो भड़क गए, करीब दस मिनट के रूठने मनाने के बाद हम पहुंचे चाय की टपरी पर जहाँ चाय के साथ उसके साथी - मैगी, बन मस्का, समोसे और पता नहीं छत्तीस तरीके के आइटम्स थे। जिसमे से हमने चुनी गरम गरम मैगी, मलाईदार बन मस्का और कड़क समोसे।
फिर क्या - हमने पिताजी को अगले दिन बोट में घुमाने का वादा और घूस देकर फाइनली चाय पिला ही दिया।
मगर पूरे दिन का हाईलाइट तो नमो घाट की चाय ने दिया। चाय पीते ही पिताजी हंस पड़े और कहें लगे, 'सारी गलती उस पांच बजे की चाय की है और देखो गलती का समाधान भी आखिर चाय पर ही हुआ। वाह चाय। चलो सब ज़ोर से बोलो - ओम नमः पार्वती पतये हर हर महादेव।'
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