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PRADIP BISWAS

Drama


3.2  

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मुर्ग़ मुसल्लम

मुर्ग़ मुसल्लम

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प्रस्तावना

यह एक सम्पूर्ण काल्पनिक कहानी है । मुर्ग़ मुसल्लम , मुग़ल बादशाहों के ज़माने का एक शाही पकवान है । " मुर्ग़ " यानी कि एक समूचा मुर्ग़ा , और " मुसल्लम " मतलब मसालों का मिश्रण । ये कहानी एक इंसान के मुर्ग़ मुसल्लम खाने का शौक पूरा करने का एक काल्पनिक कथा है । अगर इस कहानी के किसी नाम के साथ वास्तव के किसी भी स्थान , काल या पात्र का नाम मेल खाता हो तो उसे इत्तफ़ाक समझा जाए ।




मुर्ग़ मुसल्ल 
प्रदीप विश्वास

मौलाना अशरफ़ अली साहब दफ़्तर से घर को लौट रहे हैं । उनके हाथ में एक छोटा सा सूटकेस है । जो उनको , उनके रिटायर होने पर , दफ़्तर के सहकर्मियों ने फ़ेयरवेल पे दिया है । एक मामूली सा क्लर्क थे जब उन्होंने इस अखबार की कंपनी को ज्वाइन किया था । फ़िर अपनी मेहनत और ईमानदारी की वजह से उन्हें एक के बाद एक प्रमोशन मिलता गया , और आज वो एक " सेक्शन ऑफ़िसर " की हैसियत से रिटायर कर गए । पहले वो एक किराए के मकान में रहते थे । फ़िर ऑफ़िस से लोन लेकर एक रिहाइशी इलाके में छोटा सा मकान बनवाया । दो बेटी थी । लाडली और गुड्डी । दोनों को पढ़ा-लिखाकर अच्छे घरों में शादी करा दी । एक बेटा है " एजाज़ " । जो बैंक में ऑफ़िसर है ।


कॉल बेल बजने पर बेग़म दरवाज़ा खोलती हैं । मौलाना साहब अंदर आकर बेग़म को सूटकेस पकड़ाते हैं , और एक कुर्सी पर बैठ जाते हैं ।


बेग़म :- ये सूटकेस क्या फ़ेयरवेल पे मिला ?


मौलाना साहब :- जी हाँ । ये रिटायरमेंट बहुत बुरी चीज़ होती है । रिटायरमेंट से पहले इंसान ये सोचता है कि कब रिटायर करेंगे , और रिटायरमेंट के बाद ये सोचता है कि अब घर बैठकर क्या करेंगे । बेग़म साहिबा मुस्कुराती हुई अंदर जाती हैं और मौलाना साहब के लिए पीने का पानी लेकर वापस आती हैं । मौलाना साहब को पानी पिलाने के बाद बेग़म साहिबा सूटकेस खोलती हैं । सूटकेस के अंदर एक तौलिया और एक किताब है । बेग़म साहिबा पहले तौलिये को उलट-पुलट कर देखती हैं , फ़िर किताब को हाथ में उठाती हैं । जिसपे लिखा है " रसोई का खज़ाना " । बेग़म साहिबा मुस्कुराती हुई किताब को मौलाना साहब के तरफ़ बढ़ाती हैं । और कहती हैं :- ये आपके काम की चीज़ है । मौलाना साहब भी किताब का नाम पढ़कर हँसने लगते हैं ।


दरअसल मौलाना साहब खाने-पीने के बहुत शौकीन हैं । घर में , और ऑफ़िस में भी , जब भी मौका मिले कोई न कोई नया खाने का नुस्खा ज़रूर बताते हैं । वैसे तो मौलाना साहब की बेग़म बहुत अच्छा खाना बनाती हैं , लेकिन मौलाना साहब को इस बात का अफ़सोस है कि उनकी बेग़म को मुर्ग़ मुसल्लम बनाना नहीं आता । आज इस किताब को देखते ही उन्हें फ़िर से मुर्ग़ मुसल्लम की याद आ गई ।


मौलाना साहब :- बेग़म ! मैं नौकरी से रिटायर कर गया । अब तो ज़िंदगी के चार दिन बचे हैं । लेकिन अफ़सोस , अब तक मुर्ग़ मुसल्लम नसीब नहीं हुआ । वैसे मैंने खबर लिया है । एक कारीगर है । " इरफ़ान अहमद " । सुना है कि सिर्फ़ इस शहर में ही नहीं बल्कि बाहर से भी उनका बुलावा आता है । लोग कहते हैं कि उनके हाथ का बना हुआ " कोफ़्ता , कवाब " लाजवाब होता है । सोचता हूँ एक दिन उनसे मिलकर आऊँ । न हो तो किसी दिन उन्हीं से बनवाता हूँ मुर्ग़ मुसल्लम ।


बेग़म :- अब आप की तमन्ना है तो पूरा कर ही डालिए । मैंने कब मना किया है ।


एक दिन वक़्त निकालकर सुबह-सुबह मौलाना साहब खाना बनाने वाले कारीगर इरफ़ान अहमद के घर पहुँचे । इरफ़ान अहमद के घर का हाल-चाल देखकर मौलाना साहब समझ गए कि , जैसा सुना था , वह सही है । यह कोई मामूली कारीगर का घर नहीं है । इनके हाथों में वाकई जादू होगा । इरफ़ान साहब बैठक में पधारे । दोनों में सलाम-दुआ हुआ , और वो आमने-सामने सोफ़े पर बैठ गए ।


मौलाना साहब :- आपके बारे में बहुत सुना है । मेरी बहुत पुरानी दिली ख़्वाहिश है , मुर्ग़ मुसल्लम खाने की । इसलिए मैंने सोचा कि आपसे एकबार मिलूँ ।


इरफ़ान अहमद :- मुझे बहुत खुशी होती है , जब कोई मुग़लों के ज़माने के पकवान की बातें करते हैं । ये जो मुर्ग़ मुसल्लम है , यह भी मुग़लों के ज़माने का पकवान है । ये बताना तो मुश्किल है कि इस पकवान को सबसे पहले किसने बनाया । लेकिन ये बात सच है कि हर एक मुग़ल बादशाह , मुर्ग़ मुसल्लम के बड़े शौकीन हुआ करते थे ।


ये सब बातें सुनकर मौलाना साहब के चेहरे पर काफ़ी खुशी झलक रही थी । वो सोच रहे थे कि , कितना अच्छा लगता है किसी जानकर इंसान के साथ बातें करने में । इरफ़ान साहब ने मौलाना साहब को मुर्ग़ मुसल्लम के बारे में और भी बहुत सारी बातें बताई । उन्होंने ही मौलाना साहब को ये बताया कि वैसे तो किसी भी मुर्ग़े से मुर्ग़ मुसल्लम बनाया जा सकता है । मगर इस काम के लिए सबसे अच्छा होता है पहाड़ी मुर्ग़ा । ये आपको चाँदनी चौक पर मिल जाएगा । मुर्ग़ मुसल्लम बनाने के लिए अट्ठाईस किस्म के अलग-अलग मसाले लगते हैं । इतना जुगाड़ करना आपके लिए मुश्किल होगा । इसलिए मसाले मैं साथ में लेता आऊंगा । वैसे कहना तो अच्छा नहीं लगता फ़िर भी पेशा है इसलिए कहना पड़ता है कि , मेरा रेट " दो हज़ार " रूपए है । और मैं हमेशा पचास पर्सेंट ऐडवांस पर ही काम पे जाता हूँ ।


मौलाना साहब को कुछ घरेलू सामान लेना था । लेकिन मुर्ग़ मुसल्लम के कारीगर इरफ़ान अहमद के बातों से वो इतना प्रभावित हुए कि फ़ौरन " एक हज़ार रूपए " निकालकार उन्हें ऐडवांस में दे दिया , और कहा कि मैं मुर्ग़ों का इंतज़ाम होते ही आपको इत्तला करता हूँ ।


बातों-बातों में बहुत वक़्त निकल गया । मौलाना साहब अपने घर वापस चले गए । बेग़म को उन्होंने मुर्ग़ मुसल्लम के बारे में वो एक-एक बातें बताई , जो उन्हें इरफ़ान अहमद ने बताया था ।


अगले ही दिन मौलाना साहब चाँदनी चौक के लिए रवाना हो गए । वो कुछ देर तक चाँदनी चौक के चिड़िया बाज़ार में घूमते रहे । लेकिन पहाड़ी मुर्ग़ा किसी के पास नहीं था । उन्हें परेशान देखकर एक सज्जन दुकानदार ने पास बुलाकर बताया कि एक हफ़्ते के बाद पहाड़ी मुर्ग़ा आनेवाला है । मगर " पाँच सौ रूपए " जोड़ा मिलेगा । मौलाना साहब राज़ी हो गए ।


ठीक एक हफ़्ते के बाद मौलाना साहब फ़िर चाँदनी चौक चिड़िया बाज़ार गए । उस दुकानदार ने मौलाना साहब को दो छोटा-छोटा चूज़ा दिया । मौलाना साहब दंग रह गए । उन्होंने दुकानदार से पूछा :- अरे भाईसाहब , मुझे मुर्ग़ मुसल्लम बनाना है , मैं इन चूज़ों का क्या करूंगा ? दुकानदार ने कहा :- मौलाना साहब ! ऐसा है , कि पहाड़ी मुर्ग़ा जब भी मिलेगा चूज़ा ही मिलेगा । वो इसलिए कि पहाड़ी मुर्ग़ों का सप्लाई आजकल बहुत कम हो गया है । इसलिए ये जब छोटा रहता है , तभी बिक जाता है । बड़े मुर्ग़े को कोई नहीं बेचता । मौलाना साहब ने कुछ देर सोचा , फ़िर " पाँच सौ रूपए " में दो पहाड़ी चूज़ा लेकर घर आ गए ।


बेग़म साहिबा खाना बनाकर मौलाना साहब का इंतज़ार कर रही थी । मौलाना साहब के लौटते ही बेग़म ने पूछा :- इतनी देर कहाँ लगा दी ? मैं कब से इंतज़ार कर रही हूँ । मौलाना साहब ने बेग़म को चूज़ों का ब्योरा देने में पन्द्रह-बीस मिनट और लगा दिए । फ़िर चूज़ों को बेग़म के हवाले करके गुसलखाने चले गए ।


मौलाना साहब थके हुए थे । खाना खाने के बाद , चूज़ों के लिए दाना , जो कि वो दुकानदार से लेकर ही आए थे , थोड़ा सा फ़र्श पर छींट दिया और थोड़ी देर के लिए लेटने चले गए ।


शाम को बेग़म ने चाय बनाकर उनको जगाया तो उन्होंने देखा कि चूज़ों ने फ़र्श को कई जगह गंदा कर रक्खा है । उन्होंने पहले चाय पी । फ़िर फ़र्श को साफ़ किया । दोनों चूज़ा बहुत प्यारा लग रहा था । मौलाना साहब जब चूज़ों के पास बैठते , तो वो कभी उनके हाथ में तो कभी पैर पर चढ़ जाता । मौलाना साहब बहुत खुश हो रहे थे और अपनी बेग़म को बुलाकर उनकी करतूतें दिखा रहे थे ।


मौलाना साहब ने अपने दोनों बेटियों को फ़ोन करके चूज़ों के बारे में सारी बातें बताई । अब उनके बच्चे , मुर्गी का बच्चा देखने के लिए नानी घर जाने का ज़िद करने लगे । अगले इतवार के लिए मौलाना साहब ने अपने दोनों बेटी-दामाद को न्योता दे दिया । बच्चे खुश हो गए । मौलाना साहब का बेटा एजाज़ शाम को ऑफिस से लौटा तो घर में मुर्गी का बच्चा देखकर दंग रह गया । जब अम्मी ने उसे सारी कहानी बताई , तो वह मुस्कुराता हुआ अपने कमरे में चला गया ।


अगले दो दिनों में ही मौलाना साहब को ये समझ में आ गया कि ऐसे काम नहीं चलेगा । ये मुर्ग़े घर को बहुत गंदा करते हैं । इनके लिए अलग से घर बनाना ज़रूरी है । तय हुआ कि बरामदे के एक कोने में छोटा सा घर बना दिया जाए ।


मौलाना साहब ने दौड़-धूप करके ईंटा , बालू , सीमेंट , लकड़ी , जाली और कुछ ज़रूरी सामान मंगवाकर , मिस्त्री बुलवाया , और चूज़ों के लिए घर बनवा दिया । बेग़म कहने लगी कि बरामदे का शो खराब हो गया , तो मौलाना साहब ने उन्हें समझाते हुए कहा कि _ थोड़े दिनों की तो बात है । चूज़ा बड़ा होते ही एक दिन तय करके दोनों बेटी दामाद को बुलाएंगे , और मुर्ग़ मुसल्लम का शौक पूरा कर लिया जाएगा । फ़िर ये घर भी तुड़वा देंगे ।


अगले इतवार को दोनों बेटी दामाद , बच्चों को साथ लेकर मौलाना साहब के यहाँ घूमने आए । लाडली की दो बेटी और गुड्डी का एक बेटा , तीनों बच्चे दिन-भर चूज़ों के पीछे ही पड़े रहे । बच्चों ने प्यार से दोनों चूज़ों का नाम सोनू और मोनू रक्खा । वो अपने नाना से सोनू-मोनू के बारे में न जाने कितने सवाल पूछे । वापस जाते वक़्त मौलाना साहब ने दोनों बेटी दामाद को मुर्ग़ मुसल्लम के दावत में शामिल होने की बात याद दिला दी ।


तीन महीने हो गए । सोनू-मोनू अब काफ़ी बड़ा हो गया है । मौलाना साहब उन्हें हर शाम थोड़ी देर के लिए खोलते हैं । लेकिन घर का दरवाज़ा बंद रखते हैं , ताकि वो बाहर नहीं जा सके । शाम को खोलते ही सोनू-मोनू , घर के अंदर उछल-कदमी शुरू कर देता है । एक सोफ़े पे चढ़ जाता है , तो दूसरा टी ॰ वी ॰ के ऊपर । कभी दोनों बिस्तर के ऊपर चढ़ जाते हैं । दोनों मिलकर घर को काफ़ी गंदा भी करते हैं । बेग़म बिगड़ने लगती हैं । पर मौलाना साहब उन्हें समझा-बुझा कर मना लेते हैं ।


एक दिन शाम को सोनू-मोनू को खोलते वक़्त बाहर जाने का दरवाज़ा गलती से खुला रह गया । खोलते ही मौका देखकर एक मुर्ग़ा बाहर निकल गया । उसे घर वापस लाने में मौलाना साहब को काफ़ी परेशानी उठानी पड़ी । अपनी आदत की वजह से सोनू-मोनू दिन में और रात में भी कई बार कड़क आवाज़ में " कु-कर-कु " करते रहते हैं । जिसकी वजह से आस-पड़ोस के लोगों ने कई बार मौलाना साहब को टोका भी है । मौलाना साहब उन लोगों को समझा देते हैं कि बस , कुछ दिन और । फ़िर हम इनका हलाल करने वाले हैं । मौलाना साहब का स्वभाव काफ़ी अच्छा है और पड़ोसी होने के नाते वो भी मान जाते हैं ।


एक दिन लाडली अपनी दोनों बेटियों के साथ आई । उसकी छोटी बेटी मुर्ग़े से खेलने गई तो एक मुर्ग़ा उसकी ऊँगली में ऐसा ठोकर मारा कि ऊँगली लहू-लुहान हो गया । जल्दी से उसे डॉक्टर के पास ले जाया गया । डॉक्टर ने दवा दिया , पट्टी बाँधी । बच्ची का रोना बंद ही नहीं हो रहा था । मौलाना साहब को बहुत अफ़सोस हुआ ।


अब सोनू-मोनू छे महीने का हो गया है । दोनों काफ़ी तगड़ा भी हो चूका है । मौलाना साहब कारीगर इरफ़ान अहमद के पास गए । उनके साथ तारीख तय हुई । फ़िर उन्होंने अपने दोनों बेटी दामाद को फ़ोन करके मुर्ग़ मुसल्लम का न्योता दे दिया ।


मुर्ग़ मुसल्लम पकाने की सारी तैयारी हो गई । एक हफ़्ता बाकी है । आज इतवार है , और अगले इतवार के लिए मुर्ग़ मुसल्लम की तारीख तय हुई है । शाम को अपने रूटीन के मुताबिक मौलाना साहब ने सोनू-मोनू को खोल दिया । आज भी गलती से दरवाज़ा खुला रह गया था । अचानक ही सोनू-मोनू दोनों एक साथ बाहर निकल गया । मौलाना साहब चिल्लाते हुए उनके पीछे-पीछे दौड़े । पर सोनू-मोनू बाहर की दीवार फांदकर रास्ते में निकल चूका था । बाहर बच्चे खेल रहे थे । उनमें से किसीने एक मुर्ग़े को छेड़ा । और वह मुर्ग़ा गुस्से में आकर उस बच्चे के सर पर चढ़ गया , और अपनी मज़बूत चोंच से उस बच्चे के सर पर जमकर दो ठोकर मारी । बच्चा रोने लगा । दूसरे बच्चे भी शोर मचाने लगे । काफ़ी भीड़ इकट्ठी हो गई । बच्चे के सर से खून बहने लगा ।


मौलाना साहब ने पहले कुछ लोगों की मदद से सोनू-मोनू को काबू में लाए , और उन्हें घर में बंद किया । फ़िर बच्चे की हालत देखकर खुद ही उसे लेकर अस्पताल गए । कुछ और लोग भी उनके साथ हो लिए । बच्चा पड़ोस के मुहल्ले का था । जब खबर बच्चे के घर पहुँची , तो उसके घरवाले अपने कुछ मुहल्लेवालों को साथ लेकर अस्पताल पहुँच गए । मौलाना साहब ने उस बच्चे के घरवालों से कहा कि घबराने वाली कोई बात नहीं है । मामूली सा चोट है , ठीक हो जाएगा । वैसे इसके लिए जो भी खर्च आएगा वो मैं दे दूंगा ।


मौलाना साहब को घर लौटने में रात हो गई । बेग़म बहुत परेशान थी । उन्हें डर लग रहा था कि बच्चे को कुछ हो न जाए । रात को मौलाना साहब को ठीक से नींद नही आई । अगली सुबह तबीयत ठीक न होने की वजह से मौलाना साहब उस बच्चे को देखने के लिए अस्पताल नहीं जा सके । मगर उन्होंने दूसरों से पूछताछ करके ये पता कर लिया था कि बच्चा बिलकुल ठीक-ठाक है । लेकिन चोट थोड़ा गहरा होने की वजह से बच्चे को एक-दो दिन और अस्पताल में रहना पड़ेगा ।


उधर मामला बिगड़ चूका था । मौलाना साहब के अस्पताल नहीं पहुँचने पर उस बच्चे के घरवालों ने ये सोचा कि मौलाना साहब शायद इस झंझट से पीछा छुड़ाना चाहते हैं । और यह सोचकर उन लोगों ने मौलाना साहब के खिलाफ़ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी ।


मौलाना साहब अरेस्ट हो गए ।


मौलाना साहब के बेटे एजाज़ ने दौड़ -धूप शुरू कर दिया । एक वकील का इंतज़ाम किया गया । जो कि मौलाना साहब के ज़मानत की कोशिश में लग गए । थानेदार ने ज़मानत देने से इनकार कर दिया । जिसकी वजह से मौलाना साहब को रात-भर थाने के लॉक-अप में ही रहना पड़ा , और अगले दिन उन्हें कोर्ट में पेश कर दिया गया । कोर्ट से उसी दिन उनकी ज़मानत हो गई ।


मौलाना साहब और उनके घरवाले , सभी इस मामले को लेकर काफ़ी परेशान हो गए । बेग़म ने मौलाना साहब से कहा :- अब आप जितनी जल्दी हो सके इन मुर्ग़ों का कुछ कीजिये । ये तो हर रोज़ कोई न कोई नई मुसीबत खड़ी कर रहे हैं ।


अब कोर्ट में केस चलने लगा । केस के लिए तारीख पड़ने लगी । मौलाना साहब के वकील ने कोर्ट में , मौलाना साहब के मुर्ग़ा पालने के मकसद के बारे में ब्योरा पेश किया । दूसरे वकील ने उस बच्चे के सर में चोट लगने , और उस वजह से , भविष्य में उसके दिमाग में असर पड़ने की काफ़ी संभावना है बताकर दलील पेश की । साथ में उन्होंने कोर्ट से यह दरख़्वास्त भी किया , कि जब तक ये केस चलता है , मौलाना साहब को , उन मुर्ग़ों को हलाल करने या बेचने की इजाज़त न दी जाए । क्योंकि ये मुर्ग़े इस केस का अहम हिस्सा है । तारीख पे तारीख पड़ते गए । मुकदमा लम्बा होता चला गया । इसी दरम्यान मौलाना साहब ने अपने बेटे की शादी की ।


चूँकि यह एक अनोखा मुकदमा था , इसलिए यह मुकदमा जब भी कोई नया मोड़ लेता तो अखबार में उसकी खबर आ जाती । एक बार अखबार में मुर्ग़ों के तस्वीर के साथ मौलाना साहब का साक्षात्कार भी आया । इस मुकदमे की वजह से ये मुर्ग़े बहुत मशहूर हो गए । बेटे की शादी में आए हुए हर एक इंसान की ज़ुबान पर सिर्फ़ मुर्ग़ों का ही चर्चा था । शादी में आए हुए एक भी इंसान ऐसा नहीं बचा जिसने कम से कम एक बार जाकर सोनू-मोनू का दर्शन न किया हो ।


तीन साल तक मुकदमा चलने के बाद किसी ने मौलाना साहब को ये खबर दी , कि आप और आपके विपक्षी , दोनों के वकील आपस में मिले हुए हैं । और दोनों ही अपने-अपने मुवक्किलों को ठग रहे हैं । दोनों वकील जानबूझकर मुकदमे को लम्बा खींच रहे हैं । जिससे यह केस ऐसे ही चलता रहे और उनकी आमदनी होती रहे । यह बात सुनकर मौलाना साहब को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने अपना वकील बदलकर एक दूसरा वकील रख लिया ।


मौलाना साहब के बुलाने पर कारीगर इरफ़ान अहमद एक दिन उनके घर आए । उन्होंने सोनू-मोनू का मुआयना करके बताया कि अब ये मुर्ग़े बूढ़े हो गए हैं । अब ये मुर्ग़ मुसल्लम के लायक नहीं रहे । इन तीन सालों में मौलाना साहब ने कई बार इन मुर्ग़ों को हलाल करने के लिए कोर्ट में अर्ज़ी दी । पर कोर्ट ने हर बार उनकी अर्ज़ी नामंज़ूर कर दी । मौलाना साहब को रिटायरमेंट में जो पैसे मिले थे , उसका काफ़ी हिस्सा इस केस में बह गया । रिटायर करते वक़्त उन्होंने सोचा था कि नौकरी की वजह से , बुलाने पर भी वो किसी के यहाँ नहीं जा पाते थे । अब रिटायर करने के बाद फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत होगा । फ़िर एक-एक करके सभी रिश्तेदारों के यहाँ घूमने जाएंगे । लेकिन इन मुर्ग़ों की वजह से , इन तीन सालों में एक दिन के लिए भी वो अपनी बेटियों तक के यहाँ नहीं जा सके । ऊपर से इस मुकदमे की वजह से हमेशा दिमाग परेशान रहता है । मौलाना साहब बड़े दुःख के साथ ये सब बातें अपनी बेग़म को कहते हैं , और पूछते हैं :- क्या हमारी बाकी ज़िंदगी ऐसे ही कटेगी ? बेग़म दिलासा देकर कहती हैं :- ऊपर-वाले पर भरोसा रखिए । आपने जानबूझकर तो किसी का नुकसान नहीं पहुँचाया है । जो भी हुआ वो एक इत्तफ़ाक था । सब ठीक हो जाएगा ।


अगले दिन । मौलाना साहब ने अखबार उठाया । हेडलाइन देखते -देखते उनकी नज़र बर्ड-फ़्लू की खबर पे अटक गई । उन्होंने वह खबर बेग़म को भी पढ़ाया । जिसमें लिखा था _ बहुत खतरनाक बर्ड-फ़्लू चल रहा है । पिछले दो दिनों में करीब "तीन सौ" मुर्गीयाँ मर चुकी है । सभी पोल्ट्रीवाले हाय-हाय कर रहे हैं । मौलाना साहब घबरा गए । सोचने लगे कि कहीं सोनू-मोनू को कुछ हो न जाए । दरअसल इतने सालों से एक साथ रहने और ये केस मुकदमे अक्सर न्यूज़ में आने की वजह से , सोनू-मोनू अब मौलाना साहब के लिए सिर्फ मुर्ग़े नहीं रहे । ये अब उनके घर का सदस्य हो गए हैं । अभी कुछ दिन पहले ही वो अपनी बेग़म से कह रहे थे :- अब तो ये मुर्ग़े बूढ़े हो गए हैं । इनका मुर्ग़ मुसल्लम अब बन नहीं सकता । इसलिए मैंने सोचा है कि , ना मैं इन्हें काटूंगा और न ही बेचूंगा । ये अब जितने दिन भी जिएंगे ऐसे ही रहने दो ।


फ़िर एक दिन अचानक मौलाना साहब के एक मुर्ग़े को बर्ड-फ़्लू पकड़ लिया । मौलाना साहब फ़ौरन डॉक्टर से सलाह लेकर दवा ले आए । अगले ही दिन दूसरा भी बीमार पड़ गया । और शाम तक सोनू-मोनू इस दुनिया की माया छोड़कर चले गए ।


मौलाना साहब ने सबसे पहले अपने वकील को खबर की । वकील ने दौड़-धूप शुरू कर दी । चूँकि अदालत का ये आदेश था कि मुकदमा खत्म न होने तक मुर्ग़ों को मार नहीं सकते । इसलिए दोनों मुर्ग़े के लिए पोस्टमॉर्टम का आर्डर हुआ इस बात का पता करने के लिए , कि मौलाना साहब ने खुद ही मुर्ग़ों को मारा है , या ये मुर्ग़े वाकई में बर्ड-फ़्लू से ही मरे हैं । जब सरकारी तौर पर इस बात का यकीन हो गया कि मुर्ग़े बर्ड-फ़्लू से ही मरे हैं , तो सोनू-मोनू को पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के साथ मौलाना साहब को सौंप दिया गया । दोनों लाशों को अपने बाग़ीचे में दफ़नाते हुए मौलाना साहब के आंसू निकल आए । रात को बगैर खाना खाए ही मौलाना साहब सो गए । वो आज बहुत दुखी थे । मौलाना साहब की हालत देखकर बेग़म भी घबरा गई । वो अपने बेटे से कहने लगी :- तुम्हारे अब्बू को बहुत सदमा पहुँचा है । डर लगता है उन्हें कुछ हो न जाए । बेटे ने दिलासा दिया कि सब ठीक हो जाएगा । अब्बू सोनू-मोनू को अपने बच्चों की तरह प्यार करते थे । और अचानक ही दोनों एक साथ गुज़र जाने की वजह से उन्हें बहुत दुःख हुआ है ।


अगले दिन , दिन-भर मौलाना साहब चुपचाप ही रहे । शाम को चाय पीते वक़्त उन्होंने बे-मन से सुबह का अखबार उठाया । जिसमें सोनू-मोनू के मरने और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की खबर , तस्वीरों के साथ सुर्ख़ियों में था । उन्होंने गुस्से में आकर अखबार को मेज़ पर पटक दिया , और तैयार होकर घर से निकल पड़े ।


अपने घर से निकलकर वो सीधे उस लड़के के घर पहुँचे , जिसे उनके मुर्ग़े ने ठोकर मारी थी । मौलाना साहब उस बच्चे को पहचान नहीं पाए । क्योंकि तीन साल में वह बच्चा काफ़ी बड़ा हो गया था । लेकिन आए दिन अखबार में मुर्ग़ों के साथ मौलाना साहब की तस्वीर आने की वजह से वह लड़का मौलाना साहब को देखते ही पहचान गया । वह दौड़कर घर के अंदर गया और अपने पापा को बुला लाया । उस लड़के के पापा ने मौलाना साहब को बाइज़्ज़त बैठक में बिठाया ।


मौलाना साहब ने उस लड़के से पूछा :- अभी तुम्हारी तबीयत कैसी है ? सर की चोट पूरी तरह ठीक तो हो गई होगी ?


लड़के ने हँसते हुए कहा :- वो तो उसी वक़्त ठीक हो गया था । अब तो चोट का निशान तक नहीं है । लड़के के पापा से दो-चार इधर-उधर की बातें करने के बाद मौलाना साहब मुकदमे की बात पर आए । मौलाना साहब ने उन्हें ठंढे दिमाग से अच्छी तरह समझाया कि इस मुकदमे की वजह से हम दोनों को सिर्फ़ नुकसान ही हुआ है , और आगे भी नुकसान ही होगा । कुछ देर तक सलाह-मशवरा करने के बाद यह तय हुआ कि अगली तारीख में हम दोनों एक साथ कोर्ट जाएंगे और इस केस को खत्म कर देंगे । उस लड़के के पापा ने मौलाना साहब को चाय-नाश्ता करवाया , फ़िर मौलाना साहब अपने घर की ओर चल दिए । ये खबर सुनकर बेग़म बहुत खुश हुई ।


कोर्ट की अगली तारीख में मौलाना साहब सुबह जल्दी उठ गए । तैयार होकर नाश्ते के लिए बैठे , और अखबार उठाया तो चौंक गए । कहने लगे :- ये प्रेसवाले भी गिद्ध की तरह होते हैं । अखबार की सुर्ख़ियों में ये खबर छपी थी कि उनका केस आज खत्म होने वाला है ।


कचहरी पहुँचने पर वहाँ कई प्रेसवाले दिख गए । जो कैमरा लेकर घूम रहे थे । मौलाना साहब और उनके विपक्षी को इकट्ठे पाकर कई प्रेसवाले उनका साक्षात्कार और तस्वीरें भी ली । थोड़ी देर बाद ही कुछ मामूली कानूनी कार्रवाई हुई और केस खत्म हो गया । दोनों मुवक्किल गले मिले , एक दूसरे का मुँह मीठा कराया और अपने-अपने घर को रवाना हो गए ।


अगले दिन मौलाना साहब के घर के टेलीफ़ोन की घंटी दिन-भर बजती रही । पहचान वाले उन्हें बधाई दे रहे थे । अखबार के ज़रिए सबको खबर मिल चुकी थी कि मौलाना साहब का केस खत्म हो गया है ।


दोनों बेटियों ने मौलाना साहब को फ़ोन करके बताया कि आज रात का खाना हम आपके यहाँ खाएंगे । शाम को दोनों बेटियाँ अपने-अपने शौहर और बच्चों को साथ लेकर मौलाना साहब के घर पहुँच गए ।


आज सभी लोग बहुत खुश थे । खाने का मेज़ लग चूका था । अचानक बेल बजा । मौलाना साहब ने जाकर दरवाज़ा खोला तो देखा कि कारीगर इरफ़ान अहमद खड़े हैं । मौलाना साहब ने इरफ़ान अहमद को अंदर बुलाया । इरफ़ान साहब अंदर तो आए पर कहने लगे कि आज मैं बहुत जल्दी में हूँ इसलिए बैठूंगा नहीं । उन्होंने मौलाना साहब से कहा :- मैं हमेशा आपके केस की खबर रखता था । और आज जब मुझे ये पता चला कि आपका केस खत्म हो गया है तो मुझे काफ़ी खुशी हुई । इरफ़ान साहब ने मौलाना साहब के दिए हुए ऐडवांस के " एक हज़ार रुपए " बिना मांगे ही उन्हें वापस कर दिया , और कहा कि आपको जानकर खुशी होगी कि मैंने अपना रेस्टुरेन्ट खोल लिया है और आज ही उसका पहला दिन है । उन्होंने एक पैकेट मौलाना साहब के हाथ में पकड़ाते हुए कहा :- ये आपके लिए है । आज आप हमारे रेस्टुरेन्ट का खाना चख कर देखिए । मौलाना साहब ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की , पर वो बाद में आने का वादा करके चले गए ।


मौलाना साहब ने इरफ़ान अहमद का दिया हुआ पैकेट बेग़म को पकड़ाया । सबलोग खाने के मेज़ पर बैठे ही हुए थे तो बेग़म ने उस पैकेट को मेज़ पर ही खोला । " अरे ! ये तो मुर्ग़ मुसल्लम है "। सबलोग ठहाके लगाकर हँसने लगे ।


अब खाने के मेज़ पर खूब हँसी मज़ाक हो रही थी , और साथ में सभी लोग मुर्ग़ मुसल्लम का लुफ़्त भी उठा रहे थे । आखिर मौलाना साहब के मुर्ग़ मुसल्लम खाने का शौक पूरा हो ही गया ।


सभी लोग हँसी-खुशी विदा हो गए । मौलाना साहब अपने बेडरूम में खिड़की के सामने एक कुर्सी लगाकर बैठ गए । यहाँ से उनका सजा हुआ फूलों का बाग़ीचा अच्छी तरह दिखता है । आज बहुत अंधेरा है । फूल-पत्ता-पेड़ कुछ भी नहीं दिख रहा । सिर्फ़ बाग़ीचे के एक कोने में एक हल्की सी रौशनी दिख रही है । ये वो जगह है जहाँ पे मौलाना साहब ने सोनू-मोनू को दफ़नाया था । हर रोज़ तो नहीं पर कभी-कभी मौलाना साहब उस कब्र पे एक मोमबत्ती जलाते हैं । ये उसी की रौशनी है ।



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