मन का शोर और मेरी आख़िरी उड़ान
मन का शोर और मेरी आख़िरी उड़ान
कहते हैं कि इंसान बाहर की चुनौतियों से नहीं, बल्कि अपने अंदर की कमियों और डर से हारता है। कुछ ऐसी ही कशमकश से गुज़र रहा था भार्गव भट्टराई नाम का एक आम लड़का. उसका सपना बहुत बड़ा था—एक ऐसा मुकाम हासिल करना जिससे उसके माता-पिता और समाज को उस पर नाज़ हो, लेकिन हकीकत की ज़मीन बहुत पथरीली थी। वह जब भी किसी नई राह पर कदम बढ़ाता, असफलता उसके सामने एक दीवार बनकर खड़ी हो जाती। कभी परीक्षाओं के कम अंक उसे तोड़ते, तो कभी लोगों के तीखे ताने उसके हौसलों को बिखेर देते।
धीरे-धीरे हालात ऐसे हो गए कि भार्गव का खुद पर से विश्वास डगमगाने लगा। जब रात के सन्नाटे में पूरी दुनिया सो जाती, तब उसके दिमाग में एक बहुत ही परेशान करने वाला शोर गूँजता था। उसके मन की वो अंदरूनी आवाज़ (The Voice Inside His Head) रोज़ चिल्लाकर कहती—"तुमसे नहीं हो पाएगा भार्गव! तुम एक असफल इंसान हो, हार मान लो।" यह डर उसे धीरे-धीरे डिप्रेशन और गहरी निराशा की ओर धकेल रहा था।
लेकिन सच्चे दोस्त वही होते हैं जो अमावस की रात में भी उम्मीद का दीया जला दें। एक शाम जब भार्गव सिर झुकाए अपनी हार को अपनी नियति मान चुका था, तभी उसके दो सबसे अज़ीज़ दोस्त, आनंद और चंदन उसके पास आए. भार्गव की आँखों में छपी उदासी को उन्होंने पहचान लिया। चंदन ने उसके कंधे पर हाथ रखा और आनंद ने बेहद शांत लेकिन मज़बूत आवाज़ में कहा, "भाई, ये जो मन का डर है न, ये सिर्फ एक धोखा है। तू वो शेर है जो दहाड़ना भूल गया है। उठ और इस डर का सामना कर।"
दोस्तों के इन चंद शब्दों ने भार्गव के भीतर एक चिंगारी का काम किया। उसे समझ आ गया कि अगर वह आज इस मानसिक डर से हार गया, तो कभी खुद से नज़रें नहीं मिला पाएगा। उसने तुरंत अपनी डायरी उठाई, कलम पकड़ी और अपने भीतर के सारे दर्द, गुस्से और हिम्मत को इन अमर पंक्तियों में ढाल दिया:
"असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जितनी बार भी हार मिले उतनी बार फिर उठो तुम,
डरना और झुकना छोड़ो, बस आगे ही आगे बढ़ो तुम।
यह हार सिर्फ इशारा है, रुकने का कोई नाम नहीं,
अपनी कमियों को सुधारो तुम, अभी जीत का मंच बाकी है।
मत बैठो तुम थक कर ऐसे, अभी तो पूरी जान बाकी है,
छोटी-मोटी हार से क्या डरना, अभी तो असली उड़ान बाकी है।"
इन पंक्तियों को लिखते ही उसके मन का वो नकारात्मक शोर हमेशा के लिए शांत हो गया। भार्गव ने समझ लिया था कि असफलता अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है। आज वह अपनी मेहनत के दम पर एक नया इतिहास रचने की राह पर चल पड़ा है, क्योंकि वह जान चुका है कि उसकी असली उड़ान तो अभी बाकी है!
लेखक: भार्गव भट्टराई
