गूँज
गूँज
कमरे में घुटन इस कदर थी कि हवा भी भारी महसूस हो रही थी। रात के ठीक दो बज रहे थे। टेबल पर रखा सफेद पन्ना कबीर को एक अंतहीन खाई की तरह लग रहा था। कल सुबह उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन था, और उसका दिमाग पूरी तरह सुन्न था।
"तुमसे नहीं होगा, कबीर," अंधेरे कोने से एक तीखी, ठंडी आवाज़ आई।
कबीर ने चौंककर चारों तरफ देखा। कमरे में कोई नहीं था। दरवाज़ा बंद था, खिड़कियां बंद थीं। लेकिन वह आवाज़ इतनी साफ थी, जैसे कोई उसके कान के बिल्कुल पास आकर फुसफुसा रहा हो।
"याद करो पिछली बार क्या हुआ था?" वह आवाज़ फिर गूँजी, इस बार थोड़ी तेज़, थोड़ी ज़्यादा ज़हरीली। "सब हँसे थे तुम पर। तुम बस एक नाकामयाब इंसान हो। अपनी औकात मत भूलो। रुक जाओ।"
यह आवाज़ किसी भूत या साए की नहीं थी। यह कबीर के अपने ही कंठ से निकली उसकी अपनी आवाज़ थी, जो उसके दिमाग के भीतर तांडव मचा रही थी। यह उसका 'सेल्फ-डाउट' और 'एंग्जायटी' था, जो हर बार उसकी रगों में खून की जगह खौफ बनकर दौड़ने लगता था। कबीर का गला सूख गया। छाती पर जैसे कोई भारी पत्थर रख दिया गया हो—सांस लेना मुमकिन नहीं लग रहा था। वह ओवरथिंकिंग की उस गहरी दलदल में था, जहाँ हर एक विचार उसे नीचे खींच रहा था।
उसने कांपते हाथों से अपने कान बंद कर लिए। उसने चीखना चाहा, पर गले से आवाज़ नहीं निकली। वह घुटनों के बल फर्श पर बैठ गया। वह खुद की ही बनाई जेल का कैदी था, जहाँ जल्लाद भी वह खुद था और शिकार भी वह खुद।
तभी, असहनीय दर्द के बीच, कबीर की आँखों से एक आंसू टपका और सीधे उसकी उंगलियों पर गिरा। उस ठंडी बूंद के छूते ही जैसे उसके भीतर कुछ टूट गया। एक अजीब सी खामोशी छा गई।
उसने अपनी आँखें खोलीं। सामने लगे शीशे में उसने खुद को देखा। उसके चेहरे पर डर था, लेकिन उस डर के ठीक पीछे एक सुलगती हुई आग थी। उसने महसूस किया कि वह अब तक इस आवाज़ से भाग रहा था, इसीलिए यह उस पर हावी हो रही थी।
"अगर यह आवाज़ मेरी है... तो इसकी औकात मुझसे बड़ी नहीं हो सकती।" यह विचार उसके दिमाग में किसी धमाके की तरह गूँजा। यह वह पल था जब उसका पूरा वजूद बदल गया।
कबीर खड़ा हुआ। उसके हाथों का कांपना बंद हो चुका था। उसने पन्ने को देखा, पेन उठाया और लिखना शुरू किया। उसने किसी काल्पनिक नायक की कहानी नहीं लिखी। उसने लिखा उस खौफ के बारे में जो इस वक्त उसकी छाती को चीर रहा था। उसने लिखा उस काली आवाज़ के बारे में जो उसे रोकने की कोशिश कर रही थी। उसने अपने डर को, अपनी एंग्जायटी को शब्दों के तीखे तीरों में बदल दिया।
सुबह जब जजों ने उसकी कहानी पढ़ी, तो कमरे में सन्नाटा पसर गया। एक जज के हाथ से पन्ना छूट गया, उनकी आँखों में खौफ और सम्मान का मिला-जुला भाव था। कहानी के आखिरी शब्द थे:
"मैंने अपने भीतर के राक्षस को मार डाला है। अब जो आवाज़ गूँजेगी, वह सिर्फ मेरी होगी।"
कबीर उस कमरे में खड़ा मुस्कुरा रहा था। वह सिर्फ प्रतियोगिता नहीं जीता था, वह खुद से जीत चुका था। उसकी आत्मा अब पूरी तरह आज़ाद थी।
