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Atul Agarwal

Inspirational

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Atul Agarwal

Inspirational

मिठास

मिठास

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आज रविवार था. सुबह के नौ बज रहे थे. राधा बाई अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक फुर्ती से अपने रोजमर्रा के काम निबटा रहीं थीं

बब्बू भैया ने आराम कुर्सी पर बैठे बैठे ही अपनी प्रिय पत्नी से चुटकी ली,

" बहुत फटाफट सब काम हो रहे हैं आज! अपनी अम्मा के घर जो जाना है.”

विवाह के इक्कीस वर्षों बाद भी, अपनी अम्मा और मायके का नाम सुन, राधाबाई के चेहरे पे मुस्कान डेढ़ इंच और बढ़ गई.

आज दूरदर्शन पर एक अत्यंत लोकप्रिय फिल्म ‘अमर अकबर अन्थोनी ‘प्रसारित होने वाली थी जिसे कलर टीवी पर देखने का प्रोग्राम था.

 तीन बजने के पहले ही, कलर फिल्म देखने की ललक में बड़की, छुटकी, लालू, धम्मो और घर के नौकर गोरख के अलावा पड़ोस के बच्चो की पूरी फौज इकठ्ठा हो गई थी. कहीं देर न हो जाये सोच, राधा बाई शीघ्रता से साड़ी लपेटते लपेटते ही बब्बू भैया को आवश्यक निर्देश देने लगीं,

 “नाश्ता समय पर कर लेना खिड़की बंद कर लेना, धूल से आपको खांसी हो जाती है.”

बब्बू भैया ने सबको ख़ुशी ख़ुशी विदा कर दिया किन्तु थोड़ी ही देर में, वह एकाकीपन से ऊब गए. सात बजते बजते उनका दिल बेचैन होने लगा. गलियाँ भी रविवार होने के कारण सूनी- सूनी लगने लगीं थीं. रोज़ नए नए जुर्मो से आत्मसात होने वाले, कचहरी में दबंग वकीलों में गिने जाने वाले, बब्बू भैया विकल हो उठे.

उनका गुस्सा गुबार बन कर फूटता उससे पहले ही एक एक कर सभी रिक्शे घर के सामने रुके. बब्बू भैया के मन में ‘मिठास’ घोलते हुए मोतीचूर के लड्डू फ़ूट पड़े. उनका सारा गुस्सा, बच्चो और राधा बाई का दमकता, तृप्त चेहरा देख, काफूर हो गया.

एक अहम् निर्णय ले चुके थे बब्बू भैया.

फिर अगले ही दिन घर में आया एक नया सदस्य - ‘रंगीन टीवी’!


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