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Shadab Ahmad

Inspirational

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Shadab Ahmad

Inspirational

मेरे बचपन की पहली यात्रा

मेरे बचपन की पहली यात्रा

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   ये एक बार की बात है कि जब मैं करीब 13 साल का था उस समय में आठवीं कक्षा पार करके नौवीं कक्षा में प्रवेश लिया था, सुबह के 6:00 बज रहे थे और कड़ाके की ठंड थी, दिसंबर महीने की कुछ आखिरी तारीख चल रही थी, ऐसी हालत में मैं निकला कि मैं तीन स्वेटर पहना हुआ था और मैं ठंड के मारे कब-कब आ रहा था लेकिन फिर भी हौसला करके मैं निकला मैं इतनी कम उम्र में घर से निकला इसकी कुछ वजह थी।

 

मैं घर छोड़कर क्यों निकाला

     हम सब परिवार के सब लोग एक साथ एक खुशहाली परिवार बनकर रह रहे थे। उसी टाइम की यह बात है कि मैं स्कूल जा रहा था। उसे टाइम लेकिन और भी बहुत सारी बातें थी। घर में कुछ नाराजी की वजह थी जिसकी वजह से मेरे भाई से मेरी कुछ मैच हो गई तो मेरे भाई ने मुझे बहुत कुछ बोला, लेकिन वो मेरे बड़े भाई थे इसलिए मैं उनको कुछ कह भी नहीं सकता था। कुछ बोल भी नहीं सकता था। वह बड़े थे। मेरे से उम्र में भी और पढ़े-लिखे भी थे इसलिए मैं उन्हें कुछ भी नहीं बोल सका, फिर मैं यह इरादा किया कि अब मैं घर छोड़कर निकलेगा।

घर छोड़ने की एक और वजह थी। वह यहां मैं लिख रहा हूं।

     मैं एक खुशहाल परिवार में रहता था तो मुझे किसी भी तरह की कोई मशक्कत कभी भी झेलनी नहीं पड़ी, लेकिन मैं अपने सामने देख रहा था कि मेरी से कम उम्र के कुछ लड़के भी हैं जो खुद कमाई करके अपनी जीवन शैली को चला रहे हैं। यह देख कर मुझे रहा नहीं जाता, मैं अपने मन ही मन सोच रहा था कि अगर ये लोग कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकता? लेकिन मेरे घरवालों की तरफ से बहुत सारी पाबंदी थी क्योंकि मैं खुशहाल फैमिली से था तो घर वाले सोच रहे थे कि तुमको यह सब करने की जरूरत नहीं है और वाकई में एक स्टूडेंट की जो लाइफ होती है, उसमें ऐसी कोई जरूरत भी नहीं होती। लेकिन मैं बहुत जिद्दी था, मेरे अब्बू ने भी मुझे बहुत डांटा, लेकिन मैं नहीं माना मेरी अपनी जिंदगी का यही मानना था कि 

                  मैं अपने आप की कम करके अपनी जिंदगी में आगे बढ़े 

 

मैं जब निकला तो पहले कहा गया 

     सुबह के 6:00 मैं अपना बैग छिपाकर घर से निकाला और एक ऑटो पकड़ लिया उस टाइम मेरे जेब में सिर्फ और सिर्फ ₹140 था मैं अपने गांव से ऑटो पकड़ और करीब 20 किलोमीटर दूर जाकर एक फेमस इलाके में ठहरा, इस 20 किलोमीटर दूर जाने में मेरा करीब ₹50 का किराया भी लगा वहां पर जब मैं पहुंचा तो बहुत कुछ काम वगैरह ढूंढा। लेकिन वहां पर कोई काम मुझे ना मिलने की वजह से फिर वहां से मैं और दूर जाने का इरादा किया, उसे टाइम ना मेरे पास कोई मोबाइल था ना ही किसी का मोबाइल नंबर था कि मैं कहीं पर किसी से बात करके यह पूछ लूंगी। किस एरिया में जाए कि वहां पर अच्छा सा काम मिल जाए, फिर मैं यहां से निकला तो एक और वहां से करीब 50 किलोमीटर दूर के इलाके में गया तो वहां पर भी मैं बहुत काम ढूंढा, लेकिन मुझे कोई भी नहीं मिला, जब मैं यहां पर पहुंचा तो यहां पर अब मेरी जेब में सिर्फ ₹40 रह गए थे, यहां पर भी मैं बहुत काम ढूंढ रहा, लेकिन मुझे कोई काम नहीं मिला फिर मैं और आगे जाने का इरादा किया।

      अब जब मैं खुद से काम ढूंढ ढूंढ कर थक गया तो अब मैं एक आदमी से जो दुकान चलाता था उससे मैं काम के बारे में पूछा तो उसने मुझे बताया कि फला जगह जो वहां पर एक आदमी है जो स्टील की कंपनी खिला हुआ है। वहां पर बहुत सारे स्टील के मैटेरियल्स स्टील के प्रोडक्ट जैसे मैच कुर्सी और भी बहुत सारी चीज बनाई जाती थी इस आदमी के दिए हुए एड्रेस पर मैं आगे चलना शुरू किया तो वहां पर पहुंचते पहुंचते मेरा जब अब पूरी तरह खाली हो चुका था फिर जैसे तैसे मैं उसे कंपनी में पहुंचा।

     अब जब मैं उसे कंपनी के अंदर पहुंचा तो वहां पर जाकर एक दिन रुक करी। फिर वहां के मालिक ने हमसे यह बात किया कि अब तुमको यहां पर ₹3000 महीने में पूरा 12 घंटे ड्यूटी देना है, ड्यूटी 12 घंटे के हिसाब से 3000 सैलरी तो बहुत कम थी लेकिन इसके अलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं था।तो इतनी कम सैलरी में मैं काम तो नहीं कर सकता था इसलिए मैं थोड़ा सोच रहा था तो उसे आदमी ने खुद से ही बोल दिया। ठीक है। तुम थोड़ा टाइम ले लो और सोच लो, तुमको क्या करना है? फिर मैंने यह इरादा किया ठीक है। मैं कुछ दिन इतनी ही शैली में कुछ काम यहां पर सीख लेता हूं। काम सीखने के बाद तो वहां की हमारी जो सैलरी है, वह तो बढ़ ही जाएगी। इसलिए मैं यहां पर हां बोल दिया और काम करने लगा।

     अब मैं तो यहां काम पर हां बोल दिया, लेकिन वहां का जो कंपनी का मालिक था, उसने मुझे मेरा आधार कार्ड और भी बहुत सारी चीज मेरी। लेकिन उसे टाइम मेरे पास आधार भी नहीं था, तो मेरा यह हाल देख कर वो आदमी समझ गया कि लगता है। अब यह घर छोड़कर ही आया हुआ है। लेकिन फिर भी जैसे तैसे करके उसे आदमी ने मुझे वहां पर काम पर रख लिया।

     उसने मुझे कम पर रखने में यह शर्त रखी की चादर कोई यहां पर तुम को तुम्हारे बारे में पूछने आया तो तुम यही बोलोगे कि मैं अपनी मर्जी से आया। मुझे किसी ने जबरदस्ती नहीं रखा। यह अपनी बचाव के लिए उसने मेरे से यह शर्त रखो तो भी मैं मान गया।

      वहां पर मैं दो या तीन दिन ही काम किया था। फिर वह आदमी ने मेरे बारे में बहुत कुछ सोचा। सोने के बाद वह बोला कि देखो भाई तुम कुछ भी बात नहीं रहे होंगे। कहां से आए हो, कहां रहते हो। तुम्हारे घर का कोई कांटेक्ट भी नहीं है तो मैं तुम्हें कम पर कैसे रखूं? तो फिर उसने यही कुछ सोचकर उसने मुझे ₹500 दिया और बोला ठीक है अब तुम यहां से जा सकते हो? अब मैं इस कंपनी से बड़ा ही मायूस चेहरा लेकर निकल निकालने के बाद मैं फिर इरादा किया कि अब मैं एक दूर की सिटी लखनऊ में जाकर रहूंगा।

मेरी लखनऊ की यात्रा

      अब मैं वहां से बस पकड़ कर करीब सैकड़ो किलोमीटर दूर जाकर एक स्टेशन पर पहुंचे रेलवे स्टेशन पर पहुंचा वहां रेलवे स्टेशन पहुंचकर मैं देखता हूं कि वहां पर बहुत सारी ट्रेनें आती जाती हैं और बहुत ज्यादा भीड़ है और भाग दौड़ी चल रही है। लेकिन यह मेरी पहली यात्रा थी इसलिए मुझे कुछ मालूम ही नहीं था, मैंने लोगों से पूछा कि लखनऊ वाली ट्रेन कौन सी है तो ऐसे पूछ पूछ कर मैं उसे ट्रेन के प्लेटफार्म पर पहुंचा जब ट्रेन के आने वाली प्लेटफार्म पर मैं पहुंचा तो वहां पर मैं ट्रेन का काफी इंतजार किया, लेकिन इंतजार करने के बाद ट्रेन आई और मैं उसे ट्रेन में बिना ही टिकट लिए चढ़ गया, बिना टिकट के ही मैं ट्रेन में चल अच्छा हुआ। उसे टाइम की ट भी नहीं आया। टिकट चेक करने के लिए। लेकिन वहां पर रहने वाले या फिर ट्रेन पर सवार सवारी बहुत सारे लोग मुझे यह पूछ रहे थे कि आप इतनी कम उम्र में अकेले ही कहां जा रहे हैं तो मैंने उनको बस इतना ही बोला कि मैं लखनऊ जा रहा हूं। वहां पर मेरा एक दोस्त रहता है और उसके साथ मुझे काम करना है और उसी ने मुझे बुलाया है। वहीं पर जाऊंगा तो वह मुझे रिसीव करने के लिए भी आ जाएगा।

      अब मैं इतना दूर यात्रा करके लखनऊ तक तो पहुंच गया, लेकिन यह मेरे लिए एक अनजान इलाका था मुझे इस इलाके के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था, लेकिन फिर भी मैं वहां ट्रेन से उतरा तो पैदल ही ऐसे रास्ते में बहुत सारी दुकानों पर जाकर काम मांगा, लेकिन कहीं काम नहीं मिला, वहां पर मैं सुबह से ले शाम तक करीब ढूंढता रहा ढूंढता रहा लेकिन मुझे कोई काम नहीं मिला।

      अब करीब शाम के वही 4:00 रहे थे तो उसे टाइम पर मुझे एक आदमी एक रेस्टोरेंट या होटल वाला मुझे बुलाया, वह आदमी मुझे इतना चलता फिरता देख कर यह समझ गया कि लगता है ये घर से गुस्सा करके घर से भाग कर आया हुआ है। उसने मुझे बुलाया और सीधा-सीधा यही बात पूछ। क्या तुम घर से भाग कर आए हो तो मैं बोला हां, फिर उसने पूछा कि तुम काम ढूंढ रहे हो तो मैं बोला, फिर उसने बोला, मेरे यहां पर काम करोगे। हम बोले हां कर लेंगे। कोई दिक्कत नहीं है तो उसने मुझे कम पर रख लिया, अब इस आदमी ने मुझे ₹4000 सैलरी पर रखा और बोला कि इतना कर इतने में काम करो फिर उसके बाद जब तुम आगे करते रहोगे। तुम्हारी सैलरी और बढ़ा देंगे तो मैं भी कर लिया तो वहां पर मेरा काम यह था कि वहां पर जो रहने वाले आते थे, उनके लिए जो भी खाना वगैरह जो भी मंगवाएंगे वह रहने वाला होटल था तो रहने वाले होटल में क्या रहता है। बिस्तर वगैरा लगाना होता था तो यही सब करने वाला काम उसने हमको दिया यहां पर मैं करीब दो या तीन दिन काम किया तो मैं खुद ही समझ गया कि इस काम में करके मुझे आगे कोई भी मतलब नहीं है। कुछ भी सीख नहीं मिलेगी। मुझे कोई स्किल सीखना है, और फिर से मैं यहां से भी जाने का इरादा कर लिया और फिर वहां के मालिक से जाकर बोला कि अब मुझे यहां नहीं रहना।

     जब मैं उसे आदमी से जाकर यह बोला कि मुझे यहां पर काम नहीं जम रहा है। मुझे काम नहीं करना है। मुझे इतने दिन की पैसे दे दो और मैं जा रहा हूं तो फिर वह बहुत गुस्से में आ गया और बोला ऐसा थोड़ी होता है कि 2 दिन काम करोगे। उसका पैसा मिल जाएगा, लेकिन उसने सिर्फ मुझे ₹100 दिए वह ₹100 लेकर फिर मैं वहां से निकला स्टेशन के लिए, अब मैं फिर यहां से दिल्ली जाने का इरादा किया।

मेरी दिल्ली की यात्रा!

      अब यहां से मैं स्टेशन के लिए निकला स्टेशन पर जाकर मैं वहां पर दिल्ली के लिए ट्रेन का इंतजार करने लगा, बहुत इंतजार के बाद वहां पर ट्रेन आई और मैं उसे ट्रेन में चढ़ गया। फिर ट्रेन में भी मैं बिना टिकट के ही गया और मैं यहां इस ट्रेन से निकला तो फिर कई घंटे के बाद जाकर में दिल्ली पहुंचा।

      यह दिल्ली भी मेरे लिए एक अनजान इलाका था। मैं यहां पर ना किसी को जानता था ना मुझे कोई जानता था लेकिन मेरा जुनून था कि मैं काम करके खुद से आगे बडूंगा तो मैं काम बहुत ज्यादा ढूंढने लगा। कई जगहों पर काम ढूंढा, लेकिन मुझे कोई काम नहीं मिला अब मैं यहां पर काम के बारे में पूछते पूछते बहुत आगे निकला तो स्टेशन के थोड़ा दूरी पर जाकर मैंने कुछ रिक्शा ड्राइवर से बात किया कि यहां पर कोई काम मुझे मिल जाएगा, तो उन रिक्शा ड्राइवर वालों नाम मुझ पर यह शक किया कि लगता है। तुम घर से भाग कर आए हुए हो। मैं बोला कि हां, मैं घर से भाग कर आया हूं।

     यह कई घंटे का मैं सफर किया था लेकिन मैं कुछ खाया पिया नहीं था। इस वजह से मुझे भूख तो बहुत जोरों की लगी थी, फिर वहां के लोगों ने मुझे जाकर पूरी सब्जी खिलाया तो जाकर मेरी भूख मिटी, फिर वहां के लोगों ने मुझे बहुत डराया और यह बोला कि देखो यह दिल्ली एक ऐसा इलाका है। यहां पर कट मार का बहुत खतरा रहता है। यहां पर लोग रातों------------ रात लोगों के गार्डन में काट दिया करते हैं, यह सब सुनकर मैं तो थोड़ा डर गया, लेकिन वह लोगों ने मुझे बोला, ठीक है डरो नहीं, फिर उन्होंने मुझे बहुत समझाया।

     अब इन लोगों ने मुझे कुछ पैसे देकर और यह कसम खिलाई कि तुम कसम खाओ कि अब मैं सीधा अपने घर जाऊंगा, अब मैं यहां दिल्ली पहुंचा तो करीब 10 दिन मुझे हो गए थे। घर से निकले हुए दिन 10 दिनों में बहुत भटका बहुत इधर-उधर दौड़ा बहुत भाग लेकिन कुछ समझ में नहीं आ रहा था, मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था तो अब मैं सिर्फ और सिर्फ यह इरादा कर लिया कि अब मैं घर जाऊंगा तो मैं घर आने का पक्का इरादा करके वहां से निकला इस स्टेशन के लिए।

 

इतना भटकने के बाद मेरा घर के लिए वापसी का सफर!

      अब मैं दिल्ली से सीधा अपने गांव के लिए जाने वाली एक ट्रेन में गया, मैं ट्रेन में गया तो ट्रेन के जनरल बोगी में बैठा और वहां पर बहुत सारी भीड़ होने की वजह से मुझे जगह नहीं मिली तो मैं ट्रेन की गेट से थोड़ा सही अंदर बैठ गया, फिर मैं कई घंटे का सफर करके वहां से मैं अपने घर के लिए निकला और स्टेशन पर जाकर अपने गांव वाले स्टेशन पर पहुंचा, मैं रात में ही अपने गांव वाले स्टेशन पर पहुंच गया। उसे टाइम पर मुझे घर जाने के लिए कोई गाड़ी भी नहीं मिल रही थी तो मैं पैदल ही चल चल के घर जाकर पहुंचा। घर पहुंचने में मुझे पैदल चलने में करीब 2 घंटे लगे। इन 2 घंटे में पैदल चल-चल के मैं बहुत थक गया और घर जाकर सीधा सो गया।

 

मैं घर पहुंचा तो वहां पर मेरे ना होने की वजह से बहुत ही ज्यादा हंगामा चालू था

        अब जब मैं सुबह उठा तो मेरे से बहुत सारी पूछताछ शुरू हो गई। तुम कहां गए थे, क्यों गए थे क्या जरूरत थी जाने के लिए, तू मेरे साथ जो जो घटना हुई थी, मैंने सारी की सारी बातें घर पर जाकर बता 

       अब मैं घर पहुंच कर यह इरादा कर लिया कि अब मुझे सिर्फ पढ़ाई करना है और काम तो करेंगे लेकिन थोड़े दिनों के बाद कम से कम अपना हाई स्कूल का एग्जाम, एग्जाम दे दूं फिर उसके बाद कहीं कमाने के लिए निकलूंगा। फिर मैं वहां पर बहुत ही अच्छे से बहुत ही ध्यान लगाकर पढ़ाई करना शुरू कर दिया फिर मेरा हाई स्कूल का भी एग्जाम आ गया।

       यह मेरी जिंदगी की पहली यात्रा थी और मैं अपनी यात्रा से बहुत कुछ सीखा और मुझे यहां से यह भी सीख मिली कि अब मैं बिना बताए हुए घर से कहीं भी नहीं जाऊंगा और अपने घरवालों की बात मानूंगा और पढ़ाई-------------- लिखाई भी करूंगा क्योंकि बिना पढ़े लिखे जिंदगी का कोई मकसद या फिर कोई काम हल नहीं हो सकता है, क्योंकि शिक्षा जिंदगी के लिए बहुत ही जरूरी है। एक शिक्षित आदमी जिंदगी के बड़ी-बड़ी मशक्कतों को अच्छी तरह से हल कर सकता है और अपनी मुश्किलात से लड़ कर आगे निकल सकता है। ऐसी बहुत सारी सिख मुझे इसमें मिली और मैं काफी होशियार भी हो गया था। इन सारी यात्रा करने के बाद, हम आशा करते हैं कि आप सबको भी मेरी इस कहानी से बहुत सारी सीख मिलेगी और बहुत सारी चीज आप अपनी जिंदगी में हल कर पाएंगे। ..............धन्यवाद!



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