मैं हूॅं ना
मैं हूॅं ना
साहित्य वह नदी जिसमें लिखना नहीं आता तो पढ़ कर बह सकते हैं।
एक बार की बात है, पिता और पुत्र नदी स्नान के लिए गए हुए थे, और तैरना दोनों में से किसी को भी नहीं आता था। बच्चा घुटने भर पानी में नहा रहा था !
"कहीं डूब न जाऊं" पिता ने बच्चे के अंदर के हौसले को बढ़ाते हुए कहा; थोड़ा और अंदर जाकर नहाओ।
बच्चे ने साहस किया और थोड़ा सा आगे बढ़ गया, अभी कुछ देर ही हुआ था। नदी की तेज बहाव में बहने लगा अब पिता डर गया लेकिन बेटे को डूबते हुए नहीं देखना चाहता था।
अतएव तैरना नहीं जानते हुए भी उसे बचाने के लिए पानी में कूद पड़ा ! अब दोनों डूब रहे थे। बेटे ने कहा,
आप क्यों डूब रहे हैं। आप ने तो मुझे साहस दिखाया, अगर डूबूंगा तो आप बचा लेंगे। आप रूक जाइए मैं थोड़ा हाथ पैर मारता हूॅं , शायद बच जाऊं।
बच्चे के पिताजी अभी गहरे पानी में नहीं उतर पाए थे। उन्होंने अपने पैर पानी के अंदर की जमीन पर टिका दिया। बच्चे ने अपना हाथ पैर चलाया और नदी के दूसरे किनारे तक पहुॅंच गया, सचमुच विहंगम दृश्य उभर आया।
बच्चे ने कहा पिता जी मैं बच तो गया। लेकिन वह नदी के दूसरे किनारे पर होने की वजह से डर रहा था। पिता ने पुनः बच्चे के अंदर साहस भरते हुए कहा तुम चिंता मत करो, "मैं हूॅं ना" तुम्हें दूसरे किनारे से पहले किनारे पर वापस ले आऊंगा। तुम डरो मत। नहीं जानते हुए भी तैरते रहिए कहीं न कहीं किनारा अवश्य मिल जाएगा।
कहा भी गया है डूबते को तिनके का सहारा।
