saloni sethiya

Drama


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मानवता ही धर्म

मानवता ही धर्म

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यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जिसने मानव सेवा को ही असली धर्म समझा। एक व्यक्ति थे वे शुगर मिल में नौकरी करते थे उस समय वे बहुत ही गरीबी से गुजर रहे थे उनके चार बेटे थे चारो ही अलग - अलग जगह नौकरी करते थे गरीबी का दौर था इसलिए घर में जो होता था वहीं खाकर अपना गुजारा करते थे। समय गुजर रहा था उनके बेटों की भी शादियां हो गई चार बेटे थे इसलिए परिवार में पोते-पोतियों का शोर था धीरे-धीरे उनका संयुक्त परिवार हो गया अब वे गरीबी से उपर उठ रहे थे उनके बेटों ने भी अपना व्यवसाय शुरू कर दिया था।

अब वह सम्पूर्ण रूप से सक्षम थे।

एक समय आया जब उनके करीबी रिश्तेदार को भी गरीबी से गुजरना पड़ा वे उस दौर को जानते थे इसलिए वे हर तरह से उनके रिश्तेदार के परिवार की उनके बच्चों की मदद करते थे वे हर जरूरत का सामान उनके घर रखते थे उनके बच्चों को किताबे या जरूरत का सामान दिलाते थे रिश्ते में वे उनके बड़े पिता थे अब उनके रिश्तेदार के बच्चे भी बड़े हो रहे थे वे देख रहे थे किस तरह उनके बड़े पिता ने उनकी मदद की है कई बार उनके परिवार को भी पता नहीं होता था और वे अपने रिश्तेदार के यहां जरूरत का सामान खरीदकर दे देते थे। वे परिवार की सेवा को ही असली धर्म समझते थे। किसी की मदद करो क्योंकि हमें नहीं पता किसकी दुआ किस रूप में हमें लगती है यही सिख वे अपने परिवार को भी देते थे। समय गुजर रहा था अब उनके रिश्तेदार भी सक्षम हो रहे थे थोड़े समय बाद उनके रिश्तेदार दूसरे शहर चले गए और वही अपना व्यवसाय शुरू किया।

अब समय और गुजर रहा था वे व्यक्ति बुजुर्ग थे और शुगर की बीमारी के कारण शारीरिक रूप से भी कमजोर हो रहे थे।

एक दिन ऐसा आया जब उनकी सांसें थम गई और परिवार में जैसे दुख के बादल छा गये। अंतिम समय में सभी के कुछ ना कुछ शब्द थे पर उनके रिश्तेदार जिनकी उन्होंने मदद की उनके शब्द कुछ इस तरह थे-

सब के दिल को जीतकर भी ऐसे कोई जता है

उपर वाला भी बहुत मुस्कुराया होगा

जब उसने आपको परलोक बुलाया होगा।


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