माँ
माँ
रमेश की पत्नी चिन्तित थी कि उन्होंने आठ महीने से अपनी सास को अपने पास रखा हुआ है। किन्तु उनका जेठ एक बार भी माँ की खबर लेने नहीं पहुँचा। रमेश भी सोचता था कि उसके भाई ने कोई पैसे नहीं भेजे। एक दिन उसका भाई सुरेश आ गया। रमेश ने उसे साफ़ कह दिया कि माँ के खर्च के लिए कुछ पैसे भेजा करो किन्तु सुरेश ने कहा कि अभी तो मेरी गुंजाइश नहीं है। कभी उनमें बात होती कि माँ को छह महीने एक भाई रखे तो छह महीने दूसरा। किन्तु सुरेश इस बात पर भी राज़ी नहीं हुआ क्योंकि उसकी पत्नी माँ को रखने को तैयार नहीं थी। रमेश माँ को रखना चाहता था किन्तु वह सुरेश से माँ के खर्चे के पैसे माँगता। दोनों में कोई फैसला नहीं हो रहा था।
इतने में गाँव के मुखिया चौधरी जी दिखाई दिए। रमेश ने उन्हें सारी बात बता दी और कहा कि चौधरी साहब आप भी दो भाई हो, आपकी माँ आपके पास रहती है तो क्या आपका भाई आपको माँ के खर्चे के पैसे भेजता है? उसने कहा कि आप हमारी बात का हल निकालें। चौधरी साहब उसकी सारी बात सुनते रहे। उन्होंने उसे समझाते हुए कहा कि सच बात तो यह है कि मैंने अपनी माँ को अपने पास नहीं रखा बल्कि मैं अपनी माँ के पास रहता हूँ और वह भी तब से जब से मेरा जन्म हुआ है और यह मेरा सौभाग्य है कि मैं अपनी माँ के पास रहता हूँ। दोनों भाई उनकी बात सुनकर बड़े लज्जित हुए। उन्हें सीख मिल गई थी।
उस दिन के बाद रमेश ने कभी सुरेश से माँ के खर्चे के पैसे नहीं माँगे और माँ के साथ खुशी-खुशी रहने लगा।
