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यमुना धर त्रिपाठी

Drama


4  

यमुना धर त्रिपाठी

Drama


काका की घड़ी

काका की घड़ी

6 mins 372 6 mins 372

रमई काका अच्छी खेती करते थे। गांव के लोग उनकी अच्छी फसल को देखकर दांतों तले अंगुली दबा लिया करते थे। उनकी अच्छी फसल होने का सारा श्रेय रमई काका को ही जाता था। रमई काका थे भी बड़े मेहनती। दिन-रात खेत में जी-तोड़ मेहनत करते थे। करें भी क्यों न, बचपन से ही इन्होंने मेहनत कर के जीवन बिताया था। गांव के लोग बताते हैं कि रमई काका जब ढाई साल के थे तभी उनके पिता जी का स्वर्गवास हो गया था। उनकी माता जी ने बड़ी तंगी हालत में उनका लालन-पालन किया। धीरे-धीरे काका के परिवार में खुशी अपने पांव पसार ही रही थी कि नियति ने एक बार फिर उनके मन और मस्तिष्क में खामोशी ला दी। जैसे ही रमई काका 9 साल के हुए, नियति ने उनकी माँ को उनसे अलग कर दिया। किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित उनकी माँ दुनिया से चल बसीं। रमई काका ने जैसे-तैसे खुद को संभाला, और जीवन की पटरी पर धीरे-धीरे चलना शुरू कर दिया। रमई काका स्वभाव से बड़े सरल थे। किसी से कोई आपत्ति नहीं, किसी से कोई उलाहना नहीं, उनका मात्र स्वयं से मतलब रहता था। उनका आरंभिक जीवन अभावों में गुजरा। कभी भर पेट खाना मिला, तो कभी भूखे पेट भी गुजारा करना पड़ा। जीविकोपार्जन का प्रमुख साधन कृषि रही। कृषि को ही उन्होंने अपना सबसे करीबी साथी चुना। दिन भर खेत में काम करना और रात में फसल की रखवाली करना उनकी दैनिक दिनचर्या बन गई थी।

धीरे-धीरे समय व्यतीत होता गया। अब गांव के संभ्रांत लोग उनके परिश्रम को देखकर उनसे बहुत प्रभावित रहने लगे। पुराने समय में किसी व्यक्ति का सबसे प्रमुख गुण परिश्रमी होना ही था। कठोर परिश्रमी होने के कारण रमई काका गांव के सबसे लायक युवा हो गए थे। गांव के ही एक दादा जी ने उनका विवाह दूसरे गांव के अपने एक परिचित मित्र की लड़की से करवा दिया। अब काका के साथ काकी भी आ गईं। रमई काका का परिवार अब एक से दो हो गया था काकी के आने के बाद रमई काका का जीवन मानों बदल गया था। उनका दिन का पूरा समय जहाँ खेतों में गुजरता था, अब वहीं कुछ समय घर पर भी गुजरने लगा। रमई काका अब थोड़े शौकीन भी हो गए थे। काकी ने उनके जीवन में प्रवेश करने के पश्चात उनके जीवन शैली को थोड़ा बहुत परिवर्तित कर दिया था। पहले जहां रमई काका स्वयं और खेतों में ही मस्त रहते थे, वहीं अब गांव के लोगों से भी व्यवहार बनाने लगे थे। समय सरसराता हुआ बीतने लगा था। और रमई काका काकी के साथ आनंद के साथ जीवन जी रहे थे। इसी बीच भगवान ने उन्हें एक और उपहार दिया। कुआर के महीने में काकी ने एक नवजात बच्चे को जन्म दिया। बच्चे को पाकर काका और काकी के जीवन में बहार आ गई। काका बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बच्चे के निष्क्रमण (निष्कासन) संस्कार के अवसर पर भोजनार्थ पूरे गांव को आमंत्रित किया। काका और काकी ने एक पैर पर खड़े होकर आए हुए सभी लोगों का विधिवत सत्कार किया। गांव के लोगों ने भी उनके द्वारा किये गए सत्कार की भूरी-भूरी प्रशंसा की। 

समय बीतता गया, उनका बेटा थोड़ा बड़ा हुआ। बेटा पढ़ने में तो बहुत अच्छा नहीं था, लेकिन रमई काका की भांति बहुत परिश्रमी था। वह काका के कृषि कार्यों में सदा अपना हाथ बटाता रहता था। लेकिन खेती से ही सब कुछ नहीं हो सकता था। पढ़ाई में उसका मन न लगता हुआ देखकर रमई काका ने शहर में काम कर रहे गांव के ही एक सज्जन से अपने बेटे को कहीं काम दिलवाने के लिए अनुरोध किया। सज्जन उसे स्वीकार करते हुए काका के बेटे को अपने साथ शहर लेकर चले गए। कुछ दिनों तक रमई काका को बेटे के बिना रहना अखरने लगा। लेकिन उसके जीवन के विषय में विचार करके उन्होंने स्वयं को बहलाया-फुसलाया। रमई काका को बेटे के बिना अच्छा नहीं लग रहा था। लेकिन फिर भी वह स्वयं को समझाकर अपने दैनिक दिनचर्या में लग गए। धीरे-धीरे समय ने उन्हें बहुत कुछ सीखा दिया। बचपन, तरुणाई, युवावस्था, किशोरावस्था इत्यादि सभी अवस्थाओं का काका ने विधिवत अनुभव कर लिया था। काका की उम्र भी अब ढल रही थी। ढलती उम्र में शरीर भी अपने भीतर कई सारी विकृतियों को जन्म देने लगती है। फलस्वरूप काका को भी विस्मृति की समस्या आने लगी थी। बैठे-बैठे सोची हुई बातों को भूल जाया करते थे। पहले जहां काका समय से खेत-खलिहान का काम करने में सबसे आगे थे, वहीं अब काका भूल जाते थे कि आज तो खेतों में सिंचाई करनी है।

काका ने अपनी समस्या काकी को बताया। काकी ने काका की इस समस्या के समाधान के लिए विचार करना आरम्भ कर दिया था। बहुत सोचने के बाद समस्या के निदान के लिए काकी ने ने यह बात अपने हमउम्र की महिलाओं से साझा करने का निर्णय लिया। सायंकालीन अपने महिला मित्रों की बैठक में काकी ने काका की समस्या को बताया। सब बड़े आश्चर्य में पड़ गए। सबने इसे बहुत बड़ी समस्या बताकर काकी को और अधिक चिंता में डाल दिया। लेकिन बैठक की नेता ने काकी को घड़ी लेने की सलाह दी। जिससे काका समय देखकर हर एक काम समय से करते रहें। समय से खेती और अन्य काम हो, इसके लिए काकी ने घड़ी खरीदने का निर्णय लिया। "अब घड़ी कैसे खरीदी जाय?" काकी विचार करने लगीं। काकी ने इसके लिए शहर में रहने वाले अपने बेटे का स्मरण किया। काकी ने काका के लिए एक घड़ी लाने के लिए अपने शहरी बेटे को पत्र लिखा, उसमें काका के लिए आने वाली दीवाली में घड़ी लाने की इच्छा प्रकट की। 

समय एक गूढ़ रहस्य छोड़ता हुआ तेजी से निकल गया। अगले सप्ताह दीवाली थी। काका और काकी अपने एकलौते बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रतीक्षा बेटे के आने के साथ-साथ उस घड़ी की भी थी। आखिर वह दिन आ ही गया, जब उनका बेटा और अत्यंत आवश्यक घड़ी भी आ ही गई। काका और काकी ने बेटे का स्वागत किया। बेटे ने आते ही काका-काकी को प्रणाम कर काकी के हाथ में चमचमाती घड़ी थमा दी। दीवाली के दिन पूजन के बाद काका द्वारा घड़ी धारण करने की योजना बनी। आखिर दीवाली का भी दिन आ गया। घड़ी का विधिवत पूजन हुआ। काका ने अंततः घड़ी धारण कर ही ली, वह भी एक दम चमचमाती घड़ी। अब जब रमई काका गांव में घड़ी पहनकर निकलते तो लोग उसे देखकर फुसफुसाने लगते। सबकी दृष्टि घड़ी की ओर ही टिकती।

रमई काका भी घड़ी को पाकर फुले नहीं समा रहे थे। अब काका घड़ी को पहनकर बेहिचक सीना तान कर चलने लगे थे। कुछ दिनों तक घड़ी का जलवा बरकरार रहा। रमई काका का गांव में सम्मान और बढ़ गया था। लेकिन रमई काका की समस्या जस की तस बनी हुई थी। अभी भी वह अपना काम समय से नहीं कर पा रहे थे। एक बार फिर रमई काका ने यह बात काकी को बताई। काकी ने फिर अपना दिमाग चलाना शुरू किया। अपने मन-मस्तिष्क पर दबाव दिया। इधर-उधर दौड़ाया। लेकिन बदले में कुछ नहीं मिला। अब काकी सोचने लगी कि घड़ी भी कुछ नहीं कर सकती। थक-हार कर काकी ने इस समस्या को काका की लाइलाज बीमारी समझकर दिमाग से निकाल दिया, और काकी और काका ने इस विषय पर सोचना बंद कर दिया। किसी के पूछने पर काका-काकी का उत्तर होता था कि अब भगवान के घर जाने के बाद ही इस समस्या से मुक्ति मिलेगी। अब उन्होंने घड़ी को फालतू करार देकर अपने मन को सांत्वना दे दी थी।


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