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Sameer Kumar

Inspirational


3.9  

Sameer Kumar

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जीवन के आभूषण

जीवन के आभूषण

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जीवन हां यह एक ऐसा शब्द है जो अपनी जीवनशैली को उर्जा प्रदान करती है यह एक ऐसा शब्द है जो एक सफर को दर्शाता है सफर सरल भी हो सकता है या कठिन भी बात की जाए एक बैरिंग कि अगर उसमें तेल दी जाए तो वह आसानी से घूमता है उसी तरीके से जीवन है अगर इसमें रस हो तो जीवन का सफर सरलता पूर्वक पूरा हो जाता है वरना सफर हमारा बीच में खत्म हो जाता है हम मंजिल से अनजान रह जाते हैं

सबसे पहले यह जानना जरूरी है जीवन का रस क्या है यह उत्पन्नन कैसे होता है कई सवाल हैं

सबसे पहले यह बताना चाहूंगा जीवन के चार आभूषण के बारे में यह आभूषण जीवन के रस को उत्पन्न करता है पहला आभूषण शरीर दूसरा आभूषण आत्मा तीसरा आभूषण कर्म और आखरी एहसास यह वह आभूषण हैै जो जीवन के रस को उत्पन्न करती है यह सभी एक दूसरे से जुड़ी हुई है जीवन मेंं जो भी करता है वह शरीर करता है हमारी जीवनशैलीीी हमारे शरीर पर निर्भर रहता हैअगर शरीर जवान है तो वह ज्यादा मजबूत है वह भारी से भारी कार्य सरलता पूर्वक कर लेगा अगर शरीर बूढ़ा़ा है तो उसेेेेेे कोई भी कार्य करने मैं कठिनाई आएगी कोोई भी कार्य करने से पहले 10 बार सोचेगा यह कर सकता हूं या नहीं हमारेेेेे सभी आभूषण का आधार हमारा शरीर है

दूसरा आभूषण है आत्मा यह वह आभूषण है जो कि अमर है इसकी आयु ना बढ़ती है ना घटती है यह परिस्थिति के अनुकूल शरीर से कार्य करवाता है क्या गलत है क्या सही है यह निर्णय लेने वाला हमारा आत्मा आभूषण करना आत्मा है।

तीसरा आभूषण कर्म है यह व आभूषण हैैै जो कि हमारे सफर को तय करता है हमारा सफर लंबा है या छोटा है हमारा सफर कैसा है यह सब निर्णय लेने वालाा कर्म सीधी बात करूं तो सफर का दूसरा नाम सपने हैं जो कि हर व्यक्ति का होता है यह मुझे उल्लेख करने की जरूरत नहीं मुझे ऐसा लगता है किसी के सपने डॉक्टर बनने की किसी के सपने एक्टर बनने की किसी का सपना खूब पैसा कमाना आदि अगर जिनके सपने नहीं होते उनके पास कर्म नहीं होता कर्म के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं।

चौथा और आखिरी आभूषण एहसास यह व आभूषण जिनकेे बिना तीनोंं आभूष व्यर्थ है आपने सुना होगा किसी बच्चे को क्रिकेटर बनना उसका सपना है यानी उसे अब क्रिकेटर के सफर पर निकलना पड़ेगा पर उसके पिता का सपना उसेेे एक उच्च अधिकारी बनाने का है उसे व उच्च अधिकारी के सफर पर भेज देते हैं देखनेे वाली बात बच्चे का शरीर हर रोज विद्यालय जाता है बच्चे की आत्मा पिता के डर से देर रात तक शरीर सेेेेे पढ़ने को कहता है बच्चे का कर्म उसे पता है अब मुझे उच्च अधिकारी बनना पड़ेगा परंतुु उसका मन क्रिकेटर बननेे का कह रहा है उसे एहसास रस इस कार्य मेंंं नहीं मिल  रहा है अब वह उच्च अधिकारी बन भी सकता है या नहीं भी बन भी जाए तो वह कार्य स्थिरता पूर्वक नहींं कर पाएगा क्यों उसे रस मिला ही नहीं

पर क्रिकेटर केेेे सफर पर निकल जाए तो उसेे रस भी मिल जाएगा जिससे कार्य को ऊर्जा भी मिल जाएगी

आत्मा भी कर्म करके रस मगध हो जाएगा वह शरीर से भी सारे कार्य निष्ठा पूर्वक करा सकेगा।


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