चाय पर चर्चा, कॉकरोच का तमाशा!
चाय पर चर्चा, कॉकरोच का तमाशा!
अरे भाई, सच कहूँ तो परिवार से बढ़कर कोई ड्रामा और मनोरंजन की जगह दुनिया में है ही नहीं! हर घर में कुछ ऐसे किस्से दबे होते हैं, जिन्हें याद करते ही आज भी हँसी के फव्वारे छूट जाते हैं। चाहे वो चाय की चुस्कियाँ हों या दोस्तों के साथ गपशप, हमारे परिवार की वो 'अजीबो-गरीब' कहानियाँ ही महफ़िल में जान फूँकती हैं।
हर खानदान की अपनी कुछ विरासत होती है। किसी के यहाँ पुश्तैनी ज़ेवर चलते हैं, किसी के यहाँ दादी माँ के नुस्खे, लेकिन हमारे खानदान में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सिर्फ एक चीज़ पास होती है—"बेइज्जती"। और अगर उस बेइज्जती में 'कॉकरोच' का तड़का लगा हो, तो भाई साहब, वो किस्सा चाय के साथ समोसे की तरह हर शाम परोसा जाता है।
शाम के ठीक पांच बजे थे। सूरज खिड़की से ऐसे झाँक रहा था जैसे उसे भी मोहल्ले की गॉसिप सुननी हो। घर की औरतें 'वार्म-अप' कर रही थीं (जिसे दुनिया 'गॉसिप' कहती है)। मीनू चाची अभी किसी की बहू के ममेरे भाई की सगाई टूटने का दुखद (मगर उनके लिए रोमांचक) किस्सा सुना ही रही थीं कि अचानक...
सोनू दीदी के मुँह से वही 'वर्जित' शब्द निकल गया। अब उस शब्द में न जाने ऐसा क्या जादू है, या शायद दीदी ने उसे जिस अंदाज़ में बोला—बस फिर क्या था!
कमरे में सन्नाटा छा गया। बिस्किट चबाते हुए दो-तीन भाई-बहनों के गले में अटक गए। और तभी, जैसे किसी ने भूतिया फिल्म का ट्रेलर चला दिया हो, "वो महान हादसा" ज़िंदा हो उठा।
"याद है ना?" सोनू दीदी ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा, "वो शाम, जब शर्मिला चाची ने कॉकरोच के साथ वो एक्शन मूवी वाला तांडव किया था?"
शर्मिला चाची ने चाय का कप ऐसे नीचे रखा जैसे वो बम फटने का इंतज़ार कर रही हों। "हे भगवान! फिर वही कहानी? ज़हर दे दो मुझे पर ये मत सुनाओ!" वो कराह उठीं। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। रायता फैल चुका था।
कमरे का सन्नाटा ऐसा टूटा कि मानो हँसी का बम फट गया हो।
सबके सब बेहाल! कोई सोफे पर लोट-पोट हो रहा है, तो किसी की आँखों से हँसते-हँसते पानी निकल आया। आलम ये था कि हम एक-दूसरे की शक्ल देख रहे थे और हँसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।
दो साल पहले की वो डरावनी रात,पूरा कुनबा डिनर पर जुटा था। किचन में कुकर की सीटी ऐसे बज रही थी जैसे उसे थेरेपी की सख्त ज़रूरत हो। हम भाई-बहन इस बात पर लड़ रहे थे कि आखिरी गुलाब जामुन किसने चोरी किया। तभी—बिना किसी वॉर्निंग के—एक हट्टा-कट्टा, पंख वाला, 'इंटरनेशनल लेवल' का एथलीट कॉकरोच कमरे में ऐसे दाखिल हुआ जैसे उसने प्रॉपर्टी के पेपर अपने नाम करवा रखे हों।
किस्मत देखिए, उस कॉकरोच को पूरे घर में लैंडिंग के लिए सिर्फ एक ही रनवे मिला—शर्मिला चाची का कंधा!
अगले ही पल जो हुआ, वो इंसानियत के इतिहास में दर्ज होना चाहिए।
चाची ने ऐसी चीख मारी कि पड़ोसियों ने डर के मारे अपनी ट्यूबलाइट्स जला दीं। वो कुर्सी से ऐसे उछलीं जैसे गुरुत्वाकर्षण नाम की चीज़ उनके लिए ऑप्शनल हो। उन्होंने अपना दुपट्टा हवा में इतनी ज़ोर से लहराया कि वो सीधा 'फटाक' करके महेश चाचा के मुँह पर लगा।
बेचारे महेश चाचा, जो दुनिया से बेखबर अपनी वनीला आइसक्रीम का आखिरी स्कूप एन्जॉय कर रहे थे, अगले ही पल दुपट्टे के थप्पड़ से उनका चेहरा आइसक्रीम के फेशियल में तब्दील हो गया। चाचा ऐसे लग रहे थे जैसे साक्षात 'स्नोमैन' डाइनिंग टेबल पर आ गया हो।
कॉकरोच भी चाची की फुर्ती देखकर कन्फ्यूज हो गया। उसे लगा ये औरत है या शक्तिमान? वो डर के मारे उड़ा और चाची के दूसरे कंधे पर जा बैठा। अब शुरू हुआ असली कॉमेडी सर्कस।
चाची दौड़ीं। नहीं, वो सिर्फ दौड़ी नहीं—वो 'लॉन्च' हुईं!
सोफे पर छलांग मारी तो सोफा ही पलट गया। उन्होंने कुशन उठाया और कॉकरोच की तरफ फेंका, पर वो जाकर बेचारे गोलू को लगा जो चुपचाप दाल खा रहा था।
चाची चिल्लाईं, "ये मेरे ऊपर है! ये मुझे खा जाएगा! गंगाजल लाओ! झाड़ू लाओ! छोटा भीम को बुलाओ! कुछ भी लाओ!"
दादाजी अपनी भारी आवाज़ में चिल्लाए, "अरे मारना मत! वो ईकोसिस्टम का हिस्सा है!" (मानो कॉकरोच उनके बचपन का लंगोटिया यार हो)।
आखिरकार, वो कॉकरोच चाची से तंग आकर नीचे उतरा और बड़े टशन में सीधा गुलाब जामुन के डिब्बे के बगल में जाकर खड़ा हो गया, जैसे कह रहा हो—"अब बोल?"
पूरा परिवार हंसी के मारे ज़मीन पर लोट-पोट था। कुछ लोग तो सोफे के नीचे से हंसी के मारे रो रहे थे। चाची का ड्रामा अभी भी जारी था, "मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है? क्या कॉकरोचों को भी मैं ही सबसे हॉट लगती हूँ?"
तभी हमारा 'नाइट इन शाइनिंग आर्मर' यानी अर्जुन भाई, हाथ में हवाई चप्पल लेकर आगे बढ़ा। "पीछे हट जाओ सब," उसने ऐलान किया, "आज या तो ये रहेगा या इसकी मूछें!"
उसने चप्पल तानी, निशाना साधा और... धप्प!
निशाना चूक गया। कॉकरोच ज़िग-ज़ैग करता हुआ सोफे के नीचे घुस गया। चाची अब डाइनिंग टेबल पर चढ़ चुकी थीं और वहां से 'भरतनाट्यम' के पोज़ दे रही थीं।
अंत में, घर का सबसे शांत इंसान—रामू भैया—आराम से अंदर आए। उन्होंने एक खाली कटोरा लिया, कॉकरोच के ऊपर रखा, नीचे से एक प्लेट सरकाई और बिना एक शब्द बोले उसे बाहर छोड़ आए। उनके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वो रोज़ सुबह नाश्ते में कॉकरोच पकड़ते हों।
हम सबने उन्हें ऐसे स्टैंडिंग ओवेशन दिया जैसे उन्होंने देश का कर्जा चुका दिया हो।
शर्मिला चाची ने अगले एक घंटे तक किसी से बात नहीं की। आज भी जब ये किस्सा खत्म हुआ, चाची ने दुपट्टे से अपना मुँह छिपा लिया। "तुम लोग कभी नहीं सुधरोगे," वो बुदबुदाईं।
तभी पापा ने मज़ाक में चाची का कंधा धीरे से छू दिया। चाची 'करंट' खाकर उछलीं और चाय गिराते हुए चिल्लाईं—"नहीं! फिर से आ गया!"
बस फिर क्या था! अगले दस मिनट तक पूरा घर फिर से पागल हो गया। पापा हंसते-हंसते बोले, "हमारी फैमिली की बायोग्राफी लिखी गई तो ये कांड 'चैप्टर वन' होगा!"
यही तो है हमारी फैमिली। हम एक-दूसरे को तंग करते हैं, हँसते हैं और तब तक बेइज्जती करते हैं जब तक आँखों से आंसू न आ जाएं। पर ये पागलपन ही वो 'घटिया फेविकोल' है जिसने हमें जोड़ कर रखा है।
और वो कॉकरोच? वो तो हमारे खानदान का 'परमानेंट मेंबर' बन चुका है!
