Buratino - 2
Buratino - 2
बुरातिनो - 2
अनुवाद: चारुमति रामदास
नाक घूम रही थी, पूरी तरह घूम गई और वैसी ही रह गई – लम्बी-लम्बी, जिज्ञासु, तीखी नाक.
कार्लो मुंह बनाने लगा. मगर वह सिर्फ होंठ ही बना पाया था, - मुंह अचानक खुल गया:
“ही-ही-ही, हा-हा-हा!”
और उसमें से, चिढाती हुई, छोटी सी लाल नाक.
इन शरारतों की ओर ध्यान दिए बिना कार्लो, छीलता रहा, लकड़ी से तराशकर अवयव बनाता रहा. उसने गुडिया की ठोढी, गर्दन, कंधे, धड़, हाथ बना दिए...
मगर जैसे ही उसने अंतिम उंगली तराशी, बुरातिनो अपनी मुट्ठियों से कार्लो के गंजे सिर पर मारने लगा, उंगलियां चुभाने लगा, गुदगुदी करने लगा.
“सुन,” कार्लो ने सख्ती से कहा, “अभी तो मैंने तुम्हें पूरा बनाया भी नहीं है, और तुम अभी से शरारत करने लगे हो...आगे क्या होगा...आं?”
और उसने सख्ती से बुरातिनो की तरफ़ देखा. और बुरातिनो ने, अपनी गोल गोल, चूहे जैसी आंखों से, पापा कार्लो को देखा.
कार्लो ने छिपटियों से उसकी बड़े बड़े तलवों वाली लम्बी टांगें बनाईँ. इसके बाद काम ख़त्म करके उसने लकड़ी के बच्चे को फर्श पर रखा, ताकि उसे चलना सिखा सके.
बुरातिनो अपने पतले पैरों पर लड़खड़ाया, लड़खड़ाया, उसने एक कदम बढाया, दूसरा कदम बढाया, उछला, उछला, - सीधा दरवाज़े की ओर, देहलीज़ से होकर और – सड़क पर.
कार्लो, परेशान होकर, उसके पीछे गया:
“ऐ, बदमाश के बच्चे, वापस आ!...”
मगर कहाँ! बुरातिनो रास्ते पर भाग रहा था, हिरन की तरह, सिर्फ उसके लकड़ी के तलवे – टुकी-टुक, टुकी-टुक – पत्थरों पर टकटक कर रहे थे...
“उसे पकड़ो!” कार्लो चिल्लाया.
आने जाने वाले उँगलियों से भागते हुए बुरातिनो की तरफ़ इशारा करते हुए हंस रहे थे. चौराहे पर भारी-भरकम पुलिसवाला खड़ा था ताव देती मूंछों और तिकोनी टोपी में.
भागते हुए लकड़ी के आदमी को देखकर उसने अपने पैर चौड़े फैला लिए, और पूरे रास्ते को रोक दिया. बुरातिनो ने उसकी पैरों के बीच से कूदकर जाना चाहा, मगर पुलिसवाले ने उसे नाक से पकड़ लिया और तब तक पकड़े रखा जब तक पापा कार्लो वहां नहीं पहुँच गया...
“अच्छा, थोड़ा रुक जा, मैं अभी तुझसे निपटता हूँ,” धक्का देते हुए कार्लो ने कहा, और बुरातिनो को अपने जैकेट की जेब में रखने लगा...
बुरातिनो को ऐसे खुशनुमा दिन, सबके सामने जैकेट की जेब से पैर ऊपर उठाए रखना अच्छा नहीं लग रहा था, - वह बड़ी होशियारी से मुडा, रास्ते पर गिर गया और ऐसा नाटक किया, मानो मर गया हो...
“आय, आय,” पुलिसवाले ने कहा, “बात खतरनाक है!”
आने जाने वाले लोग इकट्ठा होने लगे. सड़क पर पड़े हुए बुरातिनो को देखकर सिर हिलाने लगे.
“बेचारा,” वे कह रहे थे, “हो सकता है, भूख से...”
“कार्लो उसे मरते दम तक मारता रहा,” कुछ और लोग कह रहे थे, “ये बूढा बाजे वाला सिर्फ दिखाता है, कि अच्छा आदमी है, वह बुरा आदमी है, दुष्ट है...”
यह सब सुनकर मुच्छड़ पुलिसवाले ने अभागे कार्लो को कॉलर से पकड़ लिया और घसीटते हुए पुलिस थाने ले गया.
कार्लो जूतों की धूल झाड़ रहा था, और ज़ोर ज़ोर से कराह रहा था:
“ओह, ओह, इस लकड़ी के छोकरे को बनाकर मैंने अपने आप मुसीबत मोल ली है!”
जब सड़क खाली हो गयी, तो बुरातिनो ने नाक ऊपर उठाई, चारों ओर देखा और छलांग मारकर घर भाग गया...
बोलने वाले झींगुर ने बुरातिनो को एक काम की सलाह दी.
सीढ़ियों के नीचे वाली कोठरी में आने के बाद, बुरातिनो मेज़ की टांग के पास फर्श पर धम्म से बैठ गया.
“और क्या सोचना चाहिए?”
ये नहीं भूलना चाहिए, कि बुरातिनो अपने जन्म के बाद पहली बार चला था. उसके विचार छोटे-छोटे थे, संक्षिप्त-संक्षिप्त, मामूली-मामूली थे.
इसी समय एक आवाज़ सुनाई दी;
“क्रीई-क्री , क्रीई-क्री, क्रीई-क्री...”
बुरातिनो ने कोठरी में देखते हुए सिर घुमाया.
“ऐ, कौन है यहाँ?”
“यहाँ मैं हूँ, - क्रीई-क्री...”
बुरातिनो ने एक प्राणी को देखा, जो काफ़ी कुछ तिलचट्टे जैसा था, मगर जिसका सिर टिड्डे जैसा था, वह भट्टी के ऊपर वाली दीवार पर बैठा था और हौले से ‘क्रीई-क्री’ कर रहा था, - अपनी बाहर निकली, कांच जैसी, इन्द्रधनुष जैसी आंखों से देख रहा था, अपनी मूंछें हिला रहा था.
“ऐ-इ, तू कौन है?”
“मैं - बोलने वाला झींगुर हूँ,” उस प्राणी ने कहा, “ मुझे इस कमरे में रहते हुए सौ साल से ज़्यादा हो गए हैं.”
“यहाँ मैं मालिक हूँ, तू यहाँ से भाग जा.”
“अच्छी बात है, मैं चला जाता हूँ, हांलाकि इस कमरे को छोड़ते हुए मुझे अफ़सोस हो रहा है, जहां मैंने सौ साल बिताए हैं,” बोलने वाले झींगुर ने जवाब दिया, “मगर इससे पहले कि मैं चला जाऊं, मेरी एक उपयोगी सलाह सुन लो.”
“बहुहुहुत ज़रुरत है मुझे बूढ़े झींगुर की सलाहों की...”
“आह, बुरातिनो, बुरातिनो,” – झींगुर ने कहा, “ लाड़ लड़ाना छोडो, कार्लो का कहना सुनो, बिना काम के घर से बाहर न भागो और कल से स्कूल जाना शुरू करो. ये मेरी सलाह है. वरना भयानक खतरों और मुसीबतों का सामना करना पडेगा. तुम्हारी ज़िंदगी के लिए मैं एक मरी हुई, सूखी मक्खी भी नहीं दूंगा.”
“क् क् क्यों?” बुरातिनो ने पूछा.
“तुम खुद ही देख लेना - क् क् क्यों,” बोलने वाले झींगुर ने जवाब दिया.
“ऐख तू, सौ साल के झींगुर-खटमल!” बुरातिनो चीखा, “दुनिया में अगर मुझे कुछ पसंद हैं तो वो हैं साहसी कारनामे. कल पौ फटते ही मैं घर से भाग जाऊंगा – बागडों पर चढूँगा, पंछियों के घोसले बरबाद कर दूंगा, बच्चों को चिढाऊँगा, कुत्तों और बिल्लियों के पूँछें खीचूँगा...मैं कुछ और भी सोचूंगा!...”
“मुझे तुम पर दया आती है, बुरातिनो, दया आती है, तू आंसुओं के कड़वे घूंट पिएगा.”
“क् क् क्यों?” बुरातिनो ने फिर पूछा.
“क्योंकि तेरे पास लकड़ी का बेवकूफ सिर है.”
तब बुरातिनो उछल कर कुर्सी पर चढ़ गया, कुर्सी से मेज़ पर, हथौड़ा लिया और उसे बोलने वाले झींगुर के सिर पर दे मारा.
बूढ़े, होशियार झींगुर ने गहरी आह भरी, उसने अपनी मूंछें हिलाईं और भट्टी के पीछे रेंग गया, - इस कमरे से हमेशा के लिए चला गया.
अपने ओछेपन के कारण बुरातिनो लगभग मरते-मरते बचा. पापा कार्लो ने उसके शरीर पर कागज़ की ड्रेस चिपकाई और वर्णमाला की किताब खरीदी.
बोलने वाले झींगुर के साथ हुई घटना के बाद सीढ़ियों के नीचे वाली कोठरी में बहुत उकताहट होने लगी. दिन लंबा-लंबा होने लगा. बुरातिनो के पेट में भी खलबली होने लगी.
उसने आंखें बंद कीं, और अचानक प्लेट में तली हुई मुर्गी देखी.
जोश में आंखें खोलीं, - प्लेट पर पड़ी मुर्गी गायब हो गई.
उसने फिर से आंखें बंद कीं – खीर से भरी प्लेट देखी, रास्पबेरी जैम के साथ.
आंखें खोलीं – खीर और रास्पबेरी जैम वाली प्लेट गायब हो गई थी.
