बुरातिनो - 13
बुरातिनो - 13
13
नीली आंखों वाली बच्ची बुरातिनो को संभालना चाहती है
अनुवाद: चारुमति रामदास
सुबह बुरातिनो उठा – प्रसन्न और तंदुरुस्त, जैसा कुछ हुआ ही न था.
नीले बालों वाली लड़की, छोटी मेज़ के पास बैठी, जिस पर गुड़ियों के बर्तन रखे थे, बाग़ में उसका इंतज़ार कर रही थी.
उसका चेहरा अभी अभी धुला था, ऊपर मुड़ी हुई नाक और गालों पर फूलों के पराग थे.
बुरातिनो का इंतज़ार करते हुए, वह गुस्से से तंग कर रही तितलियों को भगा रही थी:
“चलो भी, बस हो गया...”
उसने लकड़ी ने बच्चे को सिर से पांव तक देखा, त्यौरियां चढ़ा लीं. उसे मेज़ पर बैठने को कहा और छोटे से कप में कोको डाला.
बुरातिनो मेज़ पे बैठ गया, पैर अपने नीचे मोड़ लिया. वह बादाम की बर्फी पूरी की पूरी मुंह में डाल रहा था और बिना चबाए निगल रहा था.
खीर वाले बाउल में सीधा उंगलियाँ डाल देता और मज़े से उन्हें चूसता.
जब बच्ची ज़मीन पर रेंगने वाले बुज़ुर्ग भौंरे को कुछ टुकड़े फेंकने के लिए वापस आई, तो उसने कॉफी पॉट पकड़ लिया, और पूरा कोको टोंटी से पी गया. उसका गला बंद हो गया, कोको मेज़पोश पर गिरा दिया.
तब बच्ची ने कड़ाई से उससे कहा:
“अपने नीचे से पैर बाहर खींचो और उसे मेज़ के नीचे लटकाओ. हाथों से मत खाओ, इसके लिए चम्मच और कांटे हैं.
गुस्से से वह पलकें फडफडाने लगी.
“तुम्हारी देखभाल कौन करता है, बताएंगे, प्लीज़?”
“कभी पापा कार्लो मेरी देखभाल करते हैं, और कभी – कोई नहीं.”
“अब मैं तुम्हारी देखभाल करूंगी, इत्मीनान रखो.”
‘मैं तो फंस गया,’ बुरातिनो ने सोचा.
घर के चारों और घास पर कुत्ता अर्तेमोन छोटे छोटे पंछियों के पीछे भाग रहा था. जब वे पेड़ों पर बैठते, वह अपना सिर उठाता, उछलता और विलाप करते हुए भौंकता.
‘बढ़िया पंछी पकड़ता है,’ बुरातिनो ने ईर्ष्या से सोचा.
मेज़ पर सलीके से बैठने के कारण उसके पूरे बदन पर चींटियाँ रेंग रही थीं.
आखिरकार दर्दभरा नाश्ता ख़त्म हो गया. बच्ची ने उससे नाक से कोको साफ़ करने को कहा. उसने अपनी पोशाक की सलवटें और रिबन ठीक किये, बुरातिनो को हाथ से पकड़ा और घर के भीतर ले गई – उसे तौर तरीके सिखाने के लिए.
और हंसमुख कुत्ता अर्तेमोन घास में भाग रहा था और भौंक रहा था; पंछी, जो उससे बिलकुल नहीं डरते थे, खुशी से सीटियाँ बजा रहे थे, पेड़ों के ऊपर हवा प्रसन्नता से बह रही थी.
“अपने चीथड़े उतारो, आपको बढ़िया जैकेट और पतलून देंगे,” बच्ची ने कहा.
चार दर्ज़ियों – मास्टर-अकेला, उदास केकड़ा शेप्तालो, भूरा कठफोडवा कलगी वाला, बड़ा भौंरा रगाच और चूहे लिज़ेता ने – बच्ची के पुराने कपड़ों से लड़कों की ख़ूबसूरत पोशाक तैयार कर दी. शेप्तालो, कठफोडवा ने ड्रेस काटी, केकड़े ने चोच से छेद बनाए और सिल दिए, भौंरा पिछले पैरों से धागा डाल रहा था, लिज़ेता उन्हें कुतर रहा था.
बुरातिनो को लड़की की उतरन पहनने में शर्म आ रही थी, मगर कपड़े बदलने ही पड़े. नाक सुड़सुड़ाते हुए, उसने जैकेट की जेब में सोने के चार सिक्के छुपा दिए.
“अब बैठ जाओ, हाथ अपने सामने रखो. कूबड़ मत निकालो,” -. बच्ची ने कहा और चाक का टुकड़ा हाथ में लिया. “हम अंकगणित पढेंगे...तुम्हारी जेब में दो सेब हैं...”
बुरातिनो ने चालाकी से पलकें झपकाईं.
“यकीन कीजिये, एक भी नहीं है...”
“मैं कह रही हूँ,” बच्ची ने फ़ौरन दुहराया, “मान लेते हैं, कि आपकी जेब में दो सेब हैं. किसी ने आपसे एक सेब ले लिया. आपके पास कितने सेब बचे?”
“दो.”
“अच्छी तरह सोचो.”
बुरातिनो ने नाक-भौंह चढ़ाईं, - बहुत अच्छी तरह सोचा.
“दो...”
“क्यों?”
“मैं तो किसी को सेब दूंगा ही नहीं, चाहे वह झगड़ा ही क्यों न करे!”
“तुम्हारे पास गणित की काबलियत ही नहीं है,” बच्ची ने चिढ़कर कहा. “चलो, डिक्टेशन लिखते हैं.”
उसने अपनी ख़ूबसूरत आंखें छत की और उठाईं.
“लिखो, ‘और गुलाब का फूल ईसप की हथेली में गिरा’. अब इस जादुई वाक्य को उल्टा करके पढो.”
हमें पता ही है, कि बुरातिनो ने कभी कलम और दवात देखी ही नहीं थी.
बच्ची ने कहा: “लिखो” – और उसने फ़ौरन दवात में अपनी नाक घुसाई और जब नाक से कागज़ पर स्याही का धब्बा गिरा, तो खूब डर गया.
बच्ची ने हाथ नचाए, उसकी आँखों में आंसू छलक आये.
“तुम गंदे, घिनौने शरारती बच्चे हो, तुम्हें सज़ा मिलनी चाहिए.”
उसने खिड़की से बाहर झांका:
“अर्तेमोन, बुरातिनो को अँधेरे कमरे में ले जाओ!”
भला अर्तेमोन सफ़ेद दांत दिखाते हुए दरवाज़े में प्रकट हुआ. उसने बुरातिनो का जैकेट पकड़ा और, पीछे सरकते हुए, उसे कोठरी में ले गया, जहां कोनों में जालों में बड़ी बड़ी मकड़ियां लटक रही थीं. वहां उसे बंद कर दिया, उसे खूब डराने के लिए गुर्राया, और फिर से पंछियों के पीछे भाग गया.
बच्ची, गुड़ियों के लेस वाले पलंग पर गिर गई, और रो पड़ी, क्योंकि उसे लकड़ी के बच्चे के साथ इतनी सख्ती से पेश आना पडा. मगर, यदि देखभाल का ज़िम्मा उठाया है, तो काम पूरा करना ही होगा.
बुरातिनो अंधेरी कोठरी में कुडकुडा रहा था:
‘बेवकूफ़ बच्ची...अच्छी टीचर मिली, ज़रा सोचो...खुद का सिर तो चीनी मिट्टी का है, बदन में रूई ठूंसी हुई है...’
कोठरी में हल्की सी चरमराहट हो रही थी, जैसे कोई छोटे छोटे दांतों से कुतर रहा हो:
“सुन, सुन...”
उसने स्याही के धब्बे वाली नाक उठाई और अँधेरे में छत के नीचे उलटे लटकते हुए चमगादड़ को पहचान लिया.
“तुझे क्या चाहिए?”
“रात का इंतज़ार कर, बुरातिनो.”
“धीरे, धीरे,” कोनों में मकड़ियां सरसराईं, “हमारी जालियों को मत हिलाओ, हमारी मक्खियों को ना डराओ...”
बुरातिनो टूटे हुए घड़े पर बैठा था, अपना गाल टिकाये हुए. वह इससे भी बदतर बदले हुए कपड़ों में रह चुका था, मगर अन्याय उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था.
‘क्या बच्चों को ऐसे पढ़ाते हैं? ...ये तो यातना है, ना कि शिक्षा...ऐसे मत बैठो और ऐसे मत खाओ...अभी बच्ची ने ‘प्राइमर’ नहीं सीखी है, - वह फ़ौरन दवात पर आ जाती है...और कुत्ता शायद पंछियों को भगा रहा है, - उसे कोई फरक नहीं पड़ता...’
चमगादड़ फिर से चीखा:
“रात का इंतज़ार कर, बुरातिनो, मैं तुझे मूर्खों के देस ले चलूंगा, वहां दोस्त तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं."
