भारत के वीर सपूत बंधु सिंह
भारत के वीर सपूत बंधु सिंह
पूर्वी उत्तर प्रदेश का जनपद गोरखपुर अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिये मशहूर है नेपाल की सिंमाओ से लगा यह जनपद गुरु गोरक्षनाथ की तपो भूमि है साथ ही साथ धार्मिक पुस्तकों के मशहूर प्रकाशन गीता प्रेस के लिए भी जाना जाता हैं। राजनीति रूप से संवेदनशील जनपद भारतीय स्वतंत्रता के संग्राम में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के लिये भी जाना जाता है इसी जनपद से तीस किलोमीटर पर कस्बा सरदार नगर स्थित है यही एक डुमरी खास एक छोटी रियासत थी जिसके जमींदार शिव प्रसाद सिंह के पांच बेटे दल हनुमान सिंह, तेजय सिंह, फतेह सिंह, झिनक सिंह ,और करिया सिंह एक मई अठारह सौ तैतीस को उत्तर प्रदेश की पावन माटी अपने कण कण से प्रफुल्लित आह्लादित थी इसी दिन शिव प्रसाद सिंह के घर में अद्भुत बालक ने जन्म संभ्रांत क्षत्रिय परिवार के मुखिया थे शिव प्रताप सिंह इनके परिवार में जन्मा बालक इनकी छठी संतान तेजश्वी साक्षात किसी अवतार जैसा लगता था पिता शिव प्रसाद के साथ साथ परिवार के लांगो को बंधु सिंह का बचपन देखकर आश्चर्य होता बचपन से ही जिस बात की जिद करता उसे हासिल करने के लिये कोई प्रयास करता अपने भाइयों में विलक्षण प्रतिभा का धनी बालक अपने कारनामों से सबको आश्चर्य चकित कर देता बचपन से ही विशेषताओं खूबियों का धनी बालक पूरे क्षेत्र में बंधु सिंह के नाम से जाना जाने लगा। धर्म में उसकी प्रबल आस्था थी और बचपन से ही माँ का भक्त था बंधु सिंह की माँ की भक्ति सर्व विदित थी हालांकि इस माँ भारती के वीर सपूत के विषय मे अंग्रेजी हुकूमत के पास जो भी जानकारी थी सत्य तथ्यों को छुपाने के लिये उनसे संबंधित फाइलों को अभिलेख से गायब कर दिया। बन्धु सिंह माँ की भक्ति में अपने जीवन को समर्पित कर दिया डुमरी रियासत में ही देवीपुर जंगल जिसे बन्धुसिंह ने जीवन की कर्म स्थली बनाई। बंधु सिंह ने जीवन में कुल पच्चीस बसंत और होली देखी पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह बीरकुल शिरोमणि अपने आप में क्रांति का चिराग मिशाल मशाल था बंधु सिंह भारत माता की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिये बेचैन रहते और कोई ऐसा अवसर नहीं जाया करते जब भी उन्हें अवसर मिलता भारत की आजादी की मुखर आवाज बन उंसे बुलन्द करते अगर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में युवा बलिदानों की गाथा का इतिहास देखा जाये तो अमर शहीद बंधु सिंह, बिरसा मुंडा और खुदी राम बोस के बराबर है क्योंकि तीनों ने ही भारत की स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में बहुत अल्पकाल में ही जीवन का बलिदान कर दिया फर्क है तो सिर्फ इतना कि भगवान बिरसा मुंडा और खुदीराम साधरण पृष्ट भूमि के क्रांतिकारी थे और बंधु सिंह एक रियासत की पीढ़ी के नौजवान बंधुसिह ने सुख सुविधाओं का त्याग कर पहले तो माँ की आराधना ध्यान में अपना जीवन लगाया देवीपुर के जंगलों में एक ताड़(तरकुल) के पेड़ के नीचे बैठ कर देवी आराधना करते थे माँ दुर्गा इतनी प्रसन्न थी बंधु सिंह पर की उन्होंने बंधुसिह को अपनी संतान की तरह स्वयं प्रगट होकर आशीर्वाद दिया था। बंधु सिंह की भक्ति से माँ अत्यंत प्रसन्न रहती प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अठारह सौ सत्तावन में पूर्वांचल में आजादी की लड़ाई के आशा के केंद्र बाबू बंधु सिंह ही थे चौरी चौरा के आस पास के नौजवानों को संगठित कर उन्हें आजादी की लड़ाई के प्रति जागरूक करते देवी पुर जंगलों में रहते और जो भी अंग्रेज उन्हें उधर से गुजरता दिख जाता उसे वे अपनी आराध्य देवी के चरणों में बलि देते। अंग्रेजों के विरुद्ध बंधु सिंह ने गुरिल्ला युद्ध छेड़ रखा था अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिया अंग्रेजों ने देवी पुर के जंगलों में तलाशी सैन्य अभियान चलाकर बंधु सिंह को की तलाश करती मगर उनके हाथ कुछ भी नहीं लगता एक देश द्रोही मुखबिर के शिनाख्त पर अंग्रेज बन्धु सिंह को पकड़ पाए और बारह अगस्त अठारह सौ अट्ठावन को उन्हें अली नगर चौराहे पर अंग्रेजों ने फांसी पर लटकाने के लिये जल्लाद बुलाया जल्लाद ने छः बार बंधु सिंह को फांसी का फंदा लगाया और टूट गया अंग्रेजों को समझ में नहीं आ रहा था कि फंदा कमजोर कैसे हो सकता है और फंदा कमजोर नहीं है तो टूट कैसे जा रहा है वास्तविकता यह थी कि देवीपुर के जंगलों में ताड़ के पेड़ के नीचे बैठ कर माँ दुर्गा जिसका आशीर्वाद बन्धुसिंह को प्राप्त था के गले के फांसी के फंदे का बंधन काट देती थी जव बंधु सिंह छः बार गले में फंदा लगने और टूटने की पीड़ा और माँ के आशीर्वाद के मध्य माँ से निवेदन किया
(माई मर जायेदे हमें बढ़ा कष्ट होता) बंधु सिंह के इतना कहते ही जब जल्लाद ने सातवीं बार फांसी का फंदा बंधु सिंह के गले मे डाला अपने आप कस गया और बंधु सिंह भरत की स्वतंत्रता के लिये अलपायु में ही अपना बलिदान दे दिया। ज्यों ही फांसी का फंदा बन्धुसिंघ के गले में कसा उनके प्राण पखेरू उड़ते ही देवी सिंह के जंगलों में जिस तरकुल के वृक्ष के नीचे बैठ कर माँ की आराधना करते थे उस तरकुल का ऊपरी हिस्सा अपने आप टूट गया और उसमें से रक्त की धारा बह निकली वह तरकुल का ठूंठ पेड़ आज भी बारह अगस्त सन अठारह सौ अट्ठावन की आँखों देखी गवाही दे रहा है। बंधु सिंह देश की आजादी के लिये शहीद हो गए देवीपुर के जंगलों में जहां बन्धु सिंह तरकुल के पेड़ के नीचे बैठ कर माँ की आराधना करते थे वहां आज तरकुलहा देवी का मन्दिर है जहाँ प्रति वर्ष वासंतिक नवरात्रि में भव्य मेले का आयोजन होता है जो दो महीने तक चलता है लेकिन पूरे वर्ष यहां दर्शनार्थियों का प्रतिदिन ताता लगा रहता है यहां बकरे की बलि दी जाती है और उसी मांस के प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा है ।चूंकि बंधु सिंह अंग्रेजों की बली माँ के चरणों मे देते थे वही प्रथा आज भी जीवंत है और दर्शनार्थी बकरे की बलि देकर बन्धुसिंघ के स्वतंत्रता संग्राम के देवीपुर जंगलों की गुरिल्ला युद्ध के विजय प्रतीक के स्वरूप करते है।
माँ भारती के बीर अमर सपूत बन्धुसिंह ने आजादी की लड़ाई की ऐसी क्रांति की ज्योति अपने बलिदान से जलाई की वह कभी मद्धिम नहीं हुई और भारत की आजादी तक अनवरत जलती रही बारह अगस्त सन अठारह सौ अट्ठावन की सहादत इतनी
प्रभवी थी कि डुमरी खास चौरी चौरा के नौजवानों आजादी के संग्राम में संगठित होकर लड़ते रहे।
चौरी चौरा कांड का कोई सीधा संबंध तो अमर शहीद बंधुसिह के शहादत से नहीं हैं मगर यह बिल्कुल सत्य है कि इस पूरे क्षेत्र में बंधुसिह की शहादत युवाओं को संगठित होकर स्वतंत्रता संग्राम लड़ाई के लिये प्रेरणा देकर जागरूक कर गई इस सच्चाई से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है बंधु सिंह अपने बलिदान से स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी सुलगा गए जो समय समय पर क्रांति की ज्वाला बनकर फटती रही और आगे बढ़ती रही।
