बधाई हो
बधाई हो
होशियार चंद जी के नौनिहाल अनोखे लाल की शादी थी। "सेठ विला" को बड़ी खूबसूरती से सजाया गया था। आखिर सेठ जी की इकलौती पांच मंजिला हवेली जो थी। दरवाजे पर दो शहनाई वादक अपनी शहनाइयों की मधुर स्वर लहरियां बिखराकर लोगों को बता रहे थे कि "सेठ विला" में शादी है। आजकल वैसे भी पता ही नहीं चलता है कि किसी के यहां शादी है या कुंआ पूजन। बस , मकान पर रोशनी देखकर ही लोग अंदाजा लगाते हैं कि कोई "फंक्शन" है।
एक जमाना था जब हम छोटे छोटे थे तब हमारे मुहल्ले में जब किसी की सगाई हो जाती थी तब उसी दिन से घर में मिठाई आनी बंद हो जाती थी। हम बच्चे कभी जिद करते कि हमको मिठाई खानी है तो हमें कहा जाता कि अगर अब मिठाई खा लोगे तो "फलां" की शादी में क्या खाओगे ? इस तरह मिठाई का सारा "कोटा" उस शादी में ही पूरा करते थे। हम लोग तो सगाई वाले दिन से ही प्रार्थना करना शुरू कर देते थे कि "हे प्रभु, आप जल्दी से शादी वाली तारीख ला दो ना। अब सब्र नहीं हो रहा है हमसे। उसे बीवी मिले या नहीं , हमें तो बस मिठाई मिलनी चाहिए "। मगर भगवान तो भगवान हैं। ऐसे सबकी प्रार्थना सुनने लगा जायें तो इस धरती से इंसान नाम का प्राणी हमेशा के लिए खत्म हो जाए। क्योंकि कोई न कोई किसी न किसी के लिए कभी न कभी बद्दुआ तो देता ही है।
तो होशियार चंद जी की हवेली में शादी की धूमधाम चल रही थी। दूल्हे की बुआ, चाची-ताई , मौसी, मामी, जीजी सब औरतें नाच गा रही थीं। बधावे , घोड़ी बन्ना गा रही थीं। उधर फूफा लोग अवसर तलाश रहे थे "रूसने मटकने" का लेकिन होशियार चंद जी तो होशियार हैं। उन्होंने अपने भाई खिदमत चंद को उनकी सेवा में लगा रखा था जो कभी पांव दबाता। कभी मालिश करता। कभी मनुहार कर करके खाना खिलाता। बेचारे फूफा लोग उलझन में पड़े हुए थे कि "रूसने" की रस्म निभाने के कोई चांस नजर ही नहीं आ रहे हैं। अब वे अपने पुरखे फूफाओं को कैसे मुंह दिखाएंगे ? बड़ा बुरा भला कहेंगे उन्हें। लेकिन कोई कितना भी होशियार चंद हो या खिदमत चंद हो , सामने वाला आदमी कोई न कोई मौका तलाश कर ही लेता है रूसने का।
हुआ यूं कि दूल्हे को कपड़े पहनाने थे। सभी फूफा लोग दूल्हे को घेरकर खड़े हो गए। उधर जीजा लोग भी इंतजार में थे। जीजा लोगों का कहना था कि फूफा लोग अब बूढ़े हो गए हैं इसलिए उन्हें आराम करना चाहिए और कपड़े पहनाने का नेक काम जीजा लोगों को करने देना चाहिए। रही बात "नेग" की तो वह फूफा लोगों के पास वैसे ही पहुंच जाएगा जैसे कमीशन का लिफाफा अधिकारियों के घर पहुंच जाता है। बस , इसी बात पर फूफा लोग भड़क गए। परिवार के सब लोगो ने खुश होकर एक दूसरे को बधाई दी कि अब तो फूफा लोगों के रूसने की रस्म भी पूरी हो गई है। इसलिए अब शादी में और भी ज्यादा आनंद आएगा।
उधर जीजा लोग सालियों को छेड़ने में मशगूल थे। तो उनकी पत्नियां उन पर दूर से ही निगाहें रखे हुए थीं। एक साली ने तो अपनी जीजी से कहा भी था कि जीजी बड़ी टेंशन में लग रही हो , क्या बात है ? अब वो जीजी उससे कैसे कहे कि टेंशन का कारण तो तू ही है। इसलिए वह बात को टाल देती है और जबरन मुस्कुराने का नाटक करती है। तो इस तरह सारा घर हंसी-मजाक के शोरगुल में मस्त था।
अचानक वीडियो डोर फोन की घंटी बजी और बाहर कुछ लोगों के नाचने गाने की आवाज आई।
"घोड़ी पे होके सवार, चला है दूल्हा यार, कमरिया में बांधे तलवार"
और साथ साथ "बधाई हो जी बधाई हो" की आवाज स्पेशल तालियों के साथ आ रही थीं।
उस फौज को देखकर सबको सांप सूंघ गया। अचानक जैसे भेड़ के गिरोह को चीता दिख जाता हो , उसी तरह ! सब गाजा बाजा बंद। खुसुर फुसुर शुरू। "हीजड़े" आ गए, हीजड़े आ गए। जैसे कोई डाकुओं का गिरोह आ गया हो। सब लोग सकते में आ गए।
अब मुस्कुराने की बारी फूफाओं की थी "बहुत होशियार चंद बनते थे , अब सारी होशियारी निकल जाएगी जब एक लाख का चूना लगेगा"। फूफा लोग आपस में बात करने लगे।
जैसे ही होशियार चंद को पता लगा उन्होंने तुरंत मोर्चा संभाल लिया जैसे "फोर्स" डाकुओं के खिलाफ संभाल लेती है। उन्होंने कड़क कर कहा " सब लोग ध्यान से सुनें। कोई बाहर नहीं जाएगा और कोई भी आदमी गेट नहीं खोलेगा"।
सब लोगों ने चुपचाप हामी भर दी। होशियार चंद जी ने वीडियो डोर फोन ऑन किया और कहा "कौन" ?
"बधाई हो जी बधाई हो। हम हीजड़े। बधाई देने आए हैं" तालियां बजाते, नाचते गाते बोले वे।
"बहुत अच्छे। शादी में आए हो तो कुछ नाच गाने का कार्यक्रम करो पहले"। होशियार चंद जी बोले
और उनका नाच गाना चालू हो गया। लगभग आधा घंटा के बाद फिर घंटी बजी। होशियार चंद जी ने सबको मना कर दिया था कि कोई बात नहीं करेगा। सब लोग चुप रहे।
होशियार चंद ने अपने सेवक से कहा "इनको भोजन करवा दो"।
सेवक राम नीचे जाकर बोला "आ जाओ , पहले भोजन कर लो"
"हमको नहीं चाहिए भोजन। हम लोग तो भोजन करके आए हैं। हमें तो 'बधावा' दे दो बस"
"कितना"
"वैसे तो इक्यावन हजार लेते हैं मगर सेठजी को देखकर तो हम लोग एक लाख लेंगे। इतने बड़े खानदान का चिराग आज रौशन होने जा रहा है तो एक लाख से कम पर नहीं मानेंगे"।
"ठीक है। मैं सेठ जी को बता देता हूं"।
सेवक राम ने सेठ जी को सारी बात बता दी। सेठ होशियार चंद खामोश रहे और सबको इशारा कर दिया खामोश रहने का। औरतों में खुसुर फुसुर शुरू हो गई। होशियार चंद जी ने कहा कि शादी है , शादी में नाच गाना तो होता ही रहता है। अगर हीजडे नाच रहे हैं तो यह शुभ शकुन है।
आधा घंटा और गुजर गया। हीजडे थक गए थे। उन्होंने घंटी बजाई। होशियार चंद जी ने इस बार वार्ता के लिए बार्गेन चंद को भेजा। बड़ी जबरदस्त बारगेनिंग करता था वह। बड़ी धाक थी उसकी।
जैसे ही उसे हिजड़ों ने देखा सबने उसे घेर लिया और जैसा कि वे करते हैं कपड़े ऊपर करके , वैसा करने लगे। चूंकि बार्गेन चंद यह सब जानता था इसलिए खामोश ही रहा।
हिजड़ों के सरदार ने कहा कि "बधावा" लाओ। तो बार्गेन चंद ने कहा "सेठ जी ने मना कर दिया ंंऔर कहा कि शादी है शादी में आप लोग जी भरकर नाचो। जैसे चाहो नाचो , खाना खाओ और मस्त रहो।
हिजड़े स्तब्ध रह गए। ऐसा जजमान आज तक नहीं मिला उन्हें। सरदार थोड़ा नीचे आया और कहा "इक्यावन हजार रुपए दिलवा दो , हां"
बार्गेन चंद ने कहा "ग्यारह सौ रुपए लेने हो तो मुझे बता दो , नहीं तो मैं जा रहा हूं" और वह जाने को तत्पर हुआ।
सरदार को लग रहा था कि सेठ तो आएगा नहीं। हम कुछ और कर नहीं सकते उसका। इसलिए बारगेनिंग पर आ गये दोनों। सरदार ने इक्कीस हजार की डिमांड रख दी। बार्गेन चंद ने बोली बढ़ाकर इक्कीस सौ की कर दी। मगर बात बनी नहीं। सरदार अब ग्यारह हजार पे आ गया। बार्गेन चंद ने इकतीस सौ कर दी। आखिर में सौदा इक्यावन सौ में फाइनल हुआ।
जब यह बात सबको पता चली तो सब लोग स्तब्ध रह गए कि हिजड़े इक्यावन सौ में कैसे मान गए। लेकिन होशियार चंद की होशियारी और बार्गेन चंद की बारगेनिंग ने सब संभव कर दिखाया। सब लोगों ने बड़ी राहत की सांस ली कि "डाकुओं" से लुटने से बच गए। इस तरह बधावा देने वालों ने "बधाई" दे दी।
