अपनों की कहानियाँ
अपनों की कहानियाँ
हर कहानी औसत ही होती है, उसे खास बनाते है उसके किरदार। वो किरदार जो छाप छोड़ जाते है दिल पर और दिमाग पर। ऐसे ही आज मैं एक खास किरदार की कहानी कहने जा रहा हूँ। जैसे की एक पौधा जल खाद और प्रकाश ले कर बढ़ता है वैसे ही हम विचार व्यवहार और ज्ञान ले कर बढ़ते है। आप में होने वाला हर एक गुण आपके किसी न की जानने वाले से आपको मिला होता है और उनसे आप अपना वो हूँ नर सीखते हो आदत सीखते हो। मुझ में जो इतना हौसला आता है वो मुझे लगता है वो मैने अपने भाई नीलेश शर्मा से सीखा है।
ऐसा आत्म विश्वास बहुत ही कम लोगो में होता है जो भईया में है, अक्सर घर में उनके अति उत्साह और जोश को ले कर उनको कुछ न कुछ सुनने को मिल ही जाता था और है भी, लेकिन उनकी इस सुपर पावर को समझना थोड़ा मुश्किल है। अक्सर सब कहते है की भईया को गुस्सा बहुत जल्दी आता है। लेकिन मैं समझता हूँ ये उनका सामान्य स्वभाव है, और ये उत्साह जुनून और जोश ही उनकी सफलता का कारण भी है। अगर आप भी वक़्त की दीवार को तोड़ कर आगे चलना चाहते हो तो ये किरदार आपके लिए है।
कहानी की शुरुआत होती है एक खचाखच भरी हुई बस से, दोपहर का समय होगा बस इंदौर से देवास की और जा रही थी, बस के आगे वाले गेट पे एक लड़का सफ़ेद शर्ट में सीट के कोने से टिका हुआ एक हाथ से पाइप पकड़े हुए अति गंभीर विचार में डूबा हुआ था, तभी कंडक्टर ने आवाज़ लगाई क्षिप्रा इस पार वाले आगे आजाओ उसकी नींद टूटी और धकके के साथ नीचे उतरा वो कॉलेज कर के घर आया था।
घर पहुँचते ही मम्मी से बोलता है की "मुझे मोबाइल खरीदना है," "अरे ये मोबाइल कहा से आ गया अब अभी तो घर का काम भी ख़तम नहीं हुआ है और अभी कॉलेज की फ़ीस भरी है मोबाइल कहाँ से आएगा?"-मम्मी। उसने कहा "मुझे नहीं पता है मैं ले लूँगा।" अगले दिन उस समय का सबसे अच्छा फ़ोन लिए कानों में हैडफ़ोन लगाए वो घर पहुँचाता है, ये उसका पहला वाकिया था जब वो वक़्त से आगे निकलने की जींद पर अड़ा था। उसने खुद को तैयार किया जहाँ दूसरे लड़के अपने आप को रोज़मर्रा के पहिये में दबा कर आते जाते थे उसने उसी आने जाने में सीखा, लोगो का दिल जितने का हुनर। शायद ही दूसरा कोई होगा जो इतने अपडाउन करने वालों को जानता होगा।
वहीं से शुरुआत हुई उसके सबसे बेहतरीन हुनर की हौसले से भरे हुए हुनर की, दोस्तों के लिए अपनों के लिए कुछ भी कर जाने वाले जुनून की, पता ही नहीं चला की कब MBA पूरा हो गया, उसने वहां सीखा डर को जीतना। कॉलेज में करीब ४००० लोग होंगे उस वक़्त उसने उन में अपनी अलग पहचान बनायी, एक फेसबुक पेज से वो जो उस वक़्त के लिए नया था। पूरा कॉलेज जिसकी फ़ोन डिरेक्ट्री में था वो अब मैदान में था।
सबने कहा जॉब का क्या करना है उसने कहा जॉब ही क्यों करना है, दिशा के विपरीत तैर कर उसने चुना सबसे रिस्की मैदान बनायी अपनी पहचान आज सबसे तेज़ रफ़्तार से तरक्की की और बढ़ रहे है वो है मेरे भाई नीलेश।
और हाँ शौक पूरा करना भी मैने भईया से सीखा जो कभी अपने शौक के साथ समझौता नहीं करते।
