अनोखी प्रेम कहानी
अनोखी प्रेम कहानी
राजन ने अपने मित्र सुदीप और प्रखर के परिवार के साथ घूमने के लिए गोवा जाने का कार्यक्रम बनाया, इतना सुनना था कि उनका पांच वर्षीय बेटा सानू सोफे पर कूदता हुआ बोला, "पापा, जल्दी चलो गोवा, मन्नू और दीपी को भी साथ चलने को कहो न।"
"हां मेरे बेटे, मन्नू, दीपी, उनके मम्मी पापा, हम सब साथ मस्ती करेंगे।" सानू उछल पड़ा।
गोवा पहुंचकर तीनों परिवार समुद्र के किनारे घूमने लगे। सानू, मन्नू और दीपी का तो खुशी का ठिकाना नहीं था। रेत पर दीपी को एक छोटा सा भूरे रंग का शंख मिल गया, जिसपर वह खुश होकर बोली कि मुझे और शंख चाहिए, फिर क्या था - सानू और मन्नू दोनों दौड़ पड़े दीपी के लिए शंख बीनने। थोड़ी देर में, अपने छोटे-छोटे हाथों और जेब में भरकर दोनों ने दीपी के आगे शंख
और सीपी की ढेरी लगा दी, जिसे देखकर दीपी चहक उठी। तीनों दोस्त अपनी पत्नियों सहित बच्चों के खेल में शामिल हो गए।
राजन, सुदीप और प्रखर के घर अगल बगल थे, उनके परिवार आपस में पूरी तरह घुले मिले थे और उनके हमउम्र बच्चों में जिगरी दोस्ती थी। सानू और मन्नू वही खेल खेलते थे जो दीपी को पसंद होता। कभी किसी ने तीनों को आपस में लड़ते झगड़ते नहीं देखा, दीपी को कुछ चाहिए होता तब सानू मन्नू उसे पूरा करने दौड़ पड़ते। तीनों एक ही स्कूल में एक ही बस से जाते थे, क्लास एक था पर सेक्शन अलग-अलग थे।
कैलेंडर के बदलते वर्षों के साथ बच्चे भी बड़े हो रहे थे, उनकी दोस्ती अभी भी उतनी प्रगाढ़ थी, जैसी पहले कभी बचपन में थी। दसवीं की परीक्षा होने वाली थी और अचानक दीपी की तबीयत खराब हो गई। सानू मन्नू उसके बिस्तर के अगल- बगल परेशान से खड़े थे। दीपी को प्यास लगी, उसने पानी मांगा तो दोनों भागकर रसोई से एक एक गिलास पानी लाकर उसको देने लगे। दीपी अब बड़ी हो रही थी, वह अपने मित्रों की भावना को समझने लगी थी, एक दोस्त से पानी लेकर दूसरे की भावना आहत नहीं करेगी। वह बिस्तर पर उठ कर बैठ गई, उसने अपने दोनों हाथों से दोनों मित्रों द्वारा लाया पानी का गिलास पकड़ लिया। सानू और मन्नू ने एक दूसरे की तरफ देखा और फिर संतोष भरी मुस्कान से दीपी को देखकर मुस्कुरा दिए। एक अनोखा प्यार और विश्वास था तीनों के मन में, जहां कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी।
सानू, मन्नू और दीपी मेडिकल में जाने के लिए पूरी लगन से जुट गए। उनकी मेहनत सफल हुई, तीनों
का उसमें चयन हो गया और अलग-अलग शहर के कॉलेज में तीनों अपने सपने को साकार करने में जुट गए। फोन पर वे एक दूसरे से संपर्क रखते थे और छुट्टी मिलने पर अपने अनुभव साझा करते थे।
सानू अब डॉक्टर सफल राय बन गया था, मन्नू डॉक्टर मानव सरन और दीपी डॉक्टर दीपिका के नाम से पूरे शहर में विख्यात हो गए थे। तीनों अलग-अलग अस्पतालों में व्यस्त होते हुए भी आपस में वैसे ही जुड़े थे, जैसे बचपन से अभी तक थे।
घूमने के लिए सफल को गोवा पसंद था, तो मानव और दीपिका को साथ लेकर घूमने के लिए निकल पड़े। तीनों समुद्र के किनारे हाथ में चप्पल लिए दौड़ रहे थे, छोटे बच्चों की तरह, भूल गए कि वे एक प्रतिष्ठित डॉक्टर हैं। खुला वातावरण, कोई किसी को नहीं जानता, सब अपनी मस्ती में मगन। थे। तीनों कुछ दूर दौड़कर रेत पर बैठ गए। दीपिका बोली, "एक बार बचपन में हम तीनों अपने मम्मी पापा के साथ यहां आए थे, आज भी वैसा ही मजा आ रहा है।"
"सच में दीपी, मुझे भी पुराना सब याद है," सफल के कहने पर मानव ने हामी भरी।
"अच्छा जाओ, पहले की तरह मेरे लिए शंख सीपी बीनकर लाओ," दीपी चहकते हुए बोली।
सफल और मानव दोनों वहीं बैठे रहे।
"क्या बात है, अब तुम लोग मेरा काम नहीं कर रहे हो?" दीपी ने आश्चर्य से पूछा।
मानव बोला, "दीपी, पहले हम दोनों तुमको खुश करने के लिए भागते थे, अब हम इस विचार से ऊपर उठ गए हैं।"
दीपी ने सर उठाकर दोनों को देखा, उनकी आंखों में कुछ प्रश्न तैर रहे थे।
सफल ने बात शुरू करी, "दीपी, आज मैं, बिना किसी संकोच के, तुमको बता रहा हूं कि मैं और मानव, हम दोनों तुमको दिल से प्रेम करते हैं, और तबसे कर रहे हैं, जबसे प्रेम के अंकुर के फूटने का समय शुरू हुआ था।"
दीपी आंखें फाड़े कभी मानव और कभी सफल को देख रही थी।
सफल ने बात आगे बढ़ाई, "मैं और मानव दो हैं, जबकि तुम एक हो, आज तुम बताओ कि तुम हम दोनों में से किससे शादी करोगी? हम दोनों ने तय किया है कि उस परिस्थिति में दूसरा आजीवन कुंवारा रहेगा, अब तुम यह सुअवसर किसे दोगी?" मानव ठहाका लगाकर हंस दिया।
दीपी ने दोनों की बातें ध्यान से सुनी, फिर बोली, "शादी जैसे गंभीर विषय को तुम लोग कितने हलके से ले रहे हो! मानव सफल, तुम दोनों मेरे बहुत अच्छे मित्र हो, मित्रता की सभी परिभाषाओं से ऊपर, हमारी दोस्ती के रिश्ते में संबंधों का बंधन नहीं है। तुम दोनों अपने मम्मी पापा की भावनाओं को सम्मान देते हुए अच्छी लड़की से शादी करो, हां, अपनी अपनी पत्नी को मेरे बारे में जरूर बता देना।"
"तुम हम दोनों में से किसी से भी शादी नहीं करोगी! क्या तुम किसी और से प्यार करती हो?" सफल ने कौतूहल से पूछा।
"हां सफल, मैं किसी और के अरमानों से प्रेम करती हूं, बहुत ज्यादा, तुम दोनों से भी ज्यादा।"
"कौन है वह?" मानव ने दीपी का हाथ पकड़कर पूछा।
"मेरे दादू"
"क्या!"
"हां, मेरे दादू। मैं बचपन में जब गांव जाती थी, तब घर घर में घूमती रहती थी। श्यामा काकी के घर की सफाई कर देती, रघुवर चाचा का लोटा पानी से भर देती या विमला मौसी का दही मथ देती थी, सारे गांव की मैं लाडली थी। तभी दादू ने कहा था कि दीपी, तुम्हारे भीतर सेवा का भाव है, जब काबिल बनना, तब इस गांव में आकर जरूर सेवा करना। दादू अब बिस्तर पर हैं, मैं उनके जीते जी अपने गांव में अस्पताल बनाना चाहती हूं, क्या तुम लोग मेरे इस प्रयास में अपना योगदान दोगे?"
दीपी चुप होकर विशाल समुद्र को दूर तक देखने लगी।
सफल एकदम शांत होकर बोला, "दीपी, तुम हम तीनों में सबसे ज्यादा समझदार हो, तुम्हारे प्रयास में हम साथ हैं।"
तीनों एक दूसरे का हाथ कसकर पकड़े थे, ऐसा अनोखा प्रेम, जहां सिर्फ समर्पण था।
