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Chanchal Chauhan

Abstract Action Inspirational

4  

Chanchal Chauhan

Abstract Action Inspirational

ये जीवन की जंग

ये जीवन की जंग

6 mins
380

 अंश एक छोटा लड़का था। वह बहुत गरीब परिवार से था। गरीबी के कारण सब उसके माता पिता का मजाक बनाया करते थे। बहुत गरीब होने के कारण उन्हें ठीक से भोजन भी नहीं मिल पाता हैं। वह फटे पुराने कपड़े पहनते थे। अंश के साथ के बच्चे ं उसका मजाक बनाते थे। अंश सरकारी स्कूल में पढ़ता था। कुछ समय बीत होने के बाद उसके पिता गुजर गये उनका जीवन और दुखमय हो गया। वह तब वह आठवीं क्लास में था। उसके घर पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। उसकी माँ पूरी तरह टूट गई एक ही वे कमाने का सहारा थे अब घर कैसे चलेगा। उसकी माँ घर में जाकर बर्रतन साफ करने का काम करने लगी। थोड़े बहुत ही पैसै मिलते थे। उसकी माँ लोगों के झूठे बरतन साफ करती है, उसका बहुत बुरा लगता था। फिर उसकी माँ ने कपडे़ धोने का काम किया प्रेस भी करने लगी। दिन में वैसे ही काम रहता था रात में प्रेस करती थी आधी रात हो जाती थी उसे अपना घर तो चलाना ही था। अंश को पढ़ाना भी था। अंश मां से कहता था माँ रात में तो आराम कर लिया करो दिनभर तो काम करती हो। जब उसकी माँ नहीं मानती थी तो अंश खुद ही प्रेस कर देता था। उसकी माँ को आराम मिल जाता था। उन पैसें में उनका गुजारा चलने लगा। अंश दसवीं क्लास में आ गया था तो उसकी माँ की तबियत खराब हो गई। उधर उसके एग्जाम आ गये थे। उसकी माँ से कुछ काम नहीं हो रहा था उसकी माँ खाट पर लग गई, अंश बहुत परेशान दुखी हो गया।

घर में खाने को कुछ ना रहा जो पैसै थे वो दवाई में खर्च हो गये। एक दिन ऐसा आया उनके घर कुछ खाने को ना बचा। अंश का अगले दिन पेपर था उस दिन खाने को कुछ ना बचा सुबह की एक रोटी थी जो उसने अपनी माँ को खिला दी। मां को दवाई खानी हैं। अंश ही खाना बना रहा था कई दिन से उसकी माँ ने कहा था बेटा अगर राशन ना रहें तो किसी से उधार ले आना। किसी ने भी अंश को उधार नहीं दिया। दुकानदार वालों ने भी मना कर दिया। वह ऐसे ही रात में पढ़कर भूखा सो जाता हैं। सुबह हो जाती हैं। अंश उठता है उसे भूख लगती है वह सोचता हैं क्या करु माँ को दवाई खानी हैं रोटी कहाँ से बनाऊ पैसे भी नहीं हैं। माँ को भूखा कैसे रहने दूं। उसके आंखों में आशु आ जाते हैं। 9 बजे से उसका पेपर था उसे स्कूल भी जाना था। वह रोने लगता है आज पापा होते तो ये दिन देखना नहीं पड़ता। वह रोते हुए अपने घर से बाहार आ गया। उसने देखा सामने से एक पड़ोसी के यहाँ ट्क आया है। उसमें ईंटें भरी हुई थी। वह ट्क वाला ईंटें गेरकर चला जाता हैं। जिस पड़ोसी ने ईंटें मगवाई थी पास में उसके पास दो चार आदमी खड़े थे उनसे कहाँ वे मजदूरी ही करते थे जरा ये ईंटें वहां रखवा दो पैसे देऊगा उन्होंने मना कर दी हमें काम पर जाना है कहीं हमने उनको बोल दिया हैं वे कहकर चले जाते हैं। अंश ये सब देख रहा था, वह दौड़कर उस पड़ोसी के पास जाता है। वह उस आदमी से कहता हैं, "चाचा मैं आपकी ईंटे रखवा देता हूँ, क्या आप मुझे पैसे देओगे ? " उस आदमी ने कहा, " क्यों नहीं बेटा मुझे तो उन्हें भी देने थे तुम्हें भी पर तुम कर पाओगे ये सब। " अंश ने कहा हां पर तुम क्यों करना चाहते हो ये काम तुम्हारी माँ तो ठीक हैं। वह रोते हुए बोला नहीं मां तो कई दिन से बीमार है, और घर में खाने को कुछ नहीं बचा पैसे भी नहीं रहे माँ की दवाई भी कुछ दिन में खत्म हो जायेगी। वह पड़ोसी बड़े दुःख से बोला, "बेटा मैं तो दो महीने से यहाँ था नहीं मैं तो कल रात ही आया हूँ।

मुझे तो किसी ने कुछ बताया नहीं, किसी से उधार ले लेते। अंश ने कहा, " चाचा जी सबके पास गया सबने मना कर दिया क्योंकि सबको पता है वापिस नहीं दूगा। उस पड़ोसी ने कहा, "बेटा फिकर मत करो सब ठीक हो जायेगा। "वह चाचा जी उसको पैसे देने लगे, अंश ने मना कर दिया पहले मैं काम करुगा। उन्होंने कहा ठीक हैं। अंश ने काम करना शुरू कर दिया, बीच में टाइम पूछा टाइम कितना हुआ। अंश ने 6 बजे से 8 बजे तक काम किया। अंश ने कहा चाची जी मेरा पेपर हैं आप मुझे दो घंटे हिसाब से पैसे दे दो जब मैं स्कूल से आ जाऊगा और काम तब करूँगा। उस पड़ोसी ने कहा बेटा, "तून्हे पहले बताया क्यों नहीं था। आकर ही काम कर लेता पैसे अभी ले लेता। तूझे पेपर की तैयारी करनी थी। " अंश ने कहा, " रात ही तैयारी कर ली थी। अंश पैसे लेकर दुकान पर जाता है उन पैसों से राशन लाता है घर में रोटी बनाता हैं अपनी माँ को खिलाता हैं दवाई दे देता है। वह माँ से कहता है, "माँ बस थोड़ी देर में आ जाऊगा अपना ध्यान रखना मैंने पडो़स की दादी से बोल दिया हैं वे आपके पास आ जाये पानी किसी चीज की जरूरत पड़े वे दे देगी। " अंश खुद खाना खाकर स्कूल चला जाता है। उसका पेपर हो जाता हैं वह घर वापिस आ जाता हैं। फिर से काम पर लग जाता हैं आराम भी नहीं करता। वे पड़ोसी उसको और पैसे देते हैं। अंश उन चाचाजी जी से बोला, "चाचा जी आप शहर में क्या काम करते हो ? 

चाचा जी ने कहा, " बेटा हमारी पेंटिंग की दुकान हैं वहां पर पेंटिंग खुद भी बनाते हैं रख भी रखे है बनाने एक दो। " अंश कहता है मैं भी सीखूगा पेंटिंग मुझे चित्र बनाना बड़ा पंसद हैं। अंश बहुत अच्छा कलाकार था। उन्होंने कहा ठीक हैं, मैं यहाँ पर पेंटिंग का सामान लाकर देता हूँ पहले दो चार पेंटिंग बनाकर देखना अगर किसी को पंसद आई तो मैं आगे को तुम्हें काम बताऊगा। अंश को वो पेंटिंग का सम्मान लाकर दे देते हैं अंश घर पर ही पेंटिंग बनाकर दे देता है, चाचा को उसकी बनी पेंटिंग पंसद आती है। वे उसकी पेंटिंग ले जाते हैं और लोगों को उसकी पेंटिंग बहुत पंसद आती है उसकी पेंटिंग की और डिमांड करते हैं। अंश और पेंटिंग बनाता है ऐसे ही उसका काम चलता रहता है अंश बहुत पैसे कमाने लगता है। वह अच्छे डाक्टर से अपनी माँ का इलाज कराता हैं, उसकी माँ बिलकुल ठीक हो जाती है। अंश इण्टर पास कर लेता है। वह अपनी आगे की पढ़ाई भी करता है साथ में अपनी पेंटिंग का काम भी जारी रखता है। वे खुशी रहने लगते हैं कुछ साल बीत जाने के बाद वह एक अच्छी लड़की से सादी कर लेता है जो उसका उसकी माँ बहुत ध्यान रखती है। उनके घर में खुशिया ली छा जाती है। हर किसी के पास अपना टायलेन्ट होता है उससे अपना हथियार बनाओ अपना सहारा बनाओ। ये जीवन एक जंग है इससे लड़ो इसका सामना करो एक दिन कामयाब होयेंगे।


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