वो चार आँख़े
वो चार आँख़े
क्यूँकि जब जब भी मैं रोई,
चार और आँखें छुप छुप कर रोती हैं
अगर कभी हुई परेशान,
तो वो भी बेचैन हो कर पूरी रात ना सोती हैं
होती हूँ जब जब भी ख़ुश मैं,
वो खिलखिला कर छोटी सी हो जाती हैं
दूर जब भी कहीं चली जाती हूँ उनसे,
वो सबसे ज़्यादा याद आती हैं
डांटती भी हैं, ग़ुस्सा भी ज़रूर दिखाती हैं
लेकिन प्यार इतना है कि ज़्यादा देर तक
ख़फ़ा ना हो पाती हैं
देश हो या विदेश, ढूँढती मुझ को ही बस रहती हैं
ना जाने मेरी ख्वाहिशें पूरी करने की लिए,
क्या कुछ वो सहती हैं
जबसे मैंने जन्म लिया,
दिखी मुझ को उनमें मेरी ही सूरत
चाहे हो अब ज़रा ज़रा सी झुर्रियाँ उनके अगल बगल,
लेकिन हैं वो चाँद से भी बेहद ज़्यादा खूबसूरत
बस आरज़ू है इतनी सी, कि हमेशा रहें वो एक साथ
ठीक वैसे जैसे 27 May 1993 को पहली बार मिली थी,
पकड़कर एक दूसरे का हाथ
HAPPY 27th ANNIVERSARY MUMMY PAPA
