STORYMIRROR

हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Abstract Classics Inspirational

4  

हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Abstract Classics Inspirational

विडंबना

विडंबना

1 min
377

वो स्वयं को लोकतंत्र का पुरोधा बताये बैठे हैं 

और दशकों से पार्टी पर कब्जा जमाये बैठे हैं 


कहते हैं कि सेक्युलरिज्म उनकी रग रग में है

खास समुदाय पर मेहरबानियां लुटाये बैठे हैं 


अभिव्यक्ति की आजादी का राग अलापने वाले

इस देश में वर्षों तक "आपात काल" लगाये बैठे हैं 


"संघवाद" की वकालत करते नहीं थकते हैं वो 

जो बात बात पर "राष्ट्रपति शासन" लगाये बैठे हैं 


गांधी का अनुयायी बताकर दिखते हैं अहिंसक 

सिखों का कत्लेआम कर खून में नहाए बैठे हैं 


सत्य और ईमानदारी के स्वयंभू ठेकेदार बने हुए हैं 

झूठ की नींव पे "मक्कारी" का मकां बनाये बैठे हैं 


सफेद कपडों के पीछे छुपे हैं न जाने कितने कारनामे

विडंबना तो देखो उनसे ही "भले की आस" लगाये बैठे हैं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract