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Semant Harish

Abstract


4  

Semant Harish

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तुम

तुम

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बहुत कुछ बुन लेता है, तुम्हारा होना, न होना       मेरे आसपास
तुम हो तो आलिंगन कई सारी भावनाओं का 
अभिव्यक्तियों का
रूठना,
मनाना,
आक्रोश, 
अनुनय,
विनय,
स्वप्न,
स्पर्श,
चिदान्नंद...
नमकीन कभी मीठा...
कभी चाय की टेबल पर दूध का ज्यादा और                  चीनी का कम होना...
कभी दरवाज़े को खुला छोड़ देना
कभी बंद दरवाज़े को खोलने में अपेक्षाओं से अधिक वक़्त लगना या लगाना,
तुम्हें गर्म परोसने के लिए                                                एक तरफ़ रखी खीर पर आधा ध्यान                              और कुछ छींटों का गर्म तेल वाली कढ़ाई से उछलकर हाथों पर गिरना...
अभी कुछ ही सालों पहले,
'उस' मकान के डाइनिंग रूम और रसोई के बीच कोई फांसला नहीं था,
तुमने कितने सरोकार और प्रीत से चिंतित हो, डाइनिंग रूम की टेबल से ही पूछा था,
"क्या हुआ!"
मैं जवाब भी न दे पायी थी 
और तुम थे मेरे पास... 
और मेरा हाथ तुम्हारे हाथों में...
कितना सुकून होता है 'अधरों' में...
'अनल' का आत्मविश्वास छिन्नभिन्न हुआ था उस दिन...

आज फिर एक बार कुछ ऐसा हुआ है 
खीर रखी है गर्म होने को एक ओर 
एक बार फिर कढ़ाई से गर्म तेल के छींटे उडे हैं, मेरे हाथों पर गिरे हैं...
तुम भी डाइनिंग टेबल पर ही बैठे हो,
पर...
पर, डाइनिंग रूम और रसोई के बीच एक बहुत बड़ा फ़ासला हो गया है,
आज तुमने बहुत शोर से कहा है,
"तुम्हें अक्ल कब, कब अक्ल आयेगी, काम करना कब सीखोगी, मुझे देर हो रही है..."
तुम्हें टेबल से उठकर रसोई से बहुत दूर होते देख रही हूँ...
ये यूं , तुम्हारा होकर भी ना होना...

जवाब मैं आज के प्रश्नों का भी नहीं दे पाई हूँ...
"क्या हुआ ? मैं कब सीखूंगी..."

और, ये ज़िंदगी कुछ यूं जैसे,
रसोई के बेसिन में रखे 
तुम्हारे छोड़े हुए खाने से उलझे-सुलझे 
सवालों के झूठे बर्तनों की मैली कुचैली भीड़ और,
उसे साफ़ करने को लगातार बहते गर्म-ठंडे पानियों के बीच
अपने लिए कुछ जगह तलाशते 
मेरे गर्म तेल से जले हाथ...

"स्वप्न कितने अनोखे होते हैं"
आग से जलते हैं आग से बुझते हैं...
प्रीत की हो या फिर, शब्दों की, बातों की...
और मैं!
मैं,
इनके सहारे, इनके बीच, मेरे नसीब की लकीरों को,
मेरे बनाये और तुम्हारे ठुकराए, झूठे खाने के बर्तनों को,
"पानी" से साफ़ करने की कोशिश करती हूँ, करती रहती हूँ...
कभी नल से बहते, जिसे रोक पाना मेरे बस में...
कभी आँखों से, जिसे रोक पाना मेरे बस में नहीं...

तुम! 'तुम' होकर कब लौटोगे...
रसोई से डाइनिंग रूम तक के फांसले में,
चौराहों पर खुशी की गठरी लिए चौराहों आज भी,
कितने ही स्वप्न हमारी राह देख रहे हैं...
खुली धूप में तपता खिलता ये सामान, 
महंगा नहीं... पर कीमती ज़रूर है...
तुम! 'तुम' होकर कब लौटोगे...
मुझे ये सब फिर से बसाना है अपने घर में... और,
तुम ही दिलवाना मुझे मेरे ये सपने...

चाहे महंगी न हो, पर 
मेरे लिए, तुम्हारी दी हर चीज़ बहुत 'कीमती'...


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