तिनक तिनक कर मन
तिनक तिनक कर मन
तिनक तिनक कर मन भी कह रहा,
इतना लाल लाल सूरज तपतपा रहा,
उलझें भवँर में भी उलझा रहा,
दिल की हर ख़्वाइशों को सूरज की,
जलती ज्वाल में जला रहा,
समय पर भी नहीं कोई साथ आ रहा,
ना चाहकर भी वो अपना तापमान बढ़ा रहा,
सूरज किरणों से भरी रोशनी में गर्मी का
अहसास करा रहा,
दमन के चमन में वो इल्ज़ाम हमें दे रहा,
छूटते पसीने कब तक निकलें मेहनत का,
जो फ़ल अब दे रहा,
रग रग में भरी आग बस लगा रहा,
अंदर ही अंदर रह कर रहम फ़र्मा रहा,
गर्मी की आहट करें हर पल तंग हर दम,
वो गर्मी में भी लुत्फ़ हमारा उठा रहा।।
