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Chandani Choudhary

Inspirational

5.0  

Chandani Choudhary

Inspirational

स्त्री हूं मैं

स्त्री हूं मैं

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स्त्री हूँ मैं

स्त्री हूँ मैं, नारी हूँ मैं,
देवी हूँ मैं, शक्ति हूँ मैं।
महिला हूँ मैं इस धरा की,
जग-जीवन की जननी हूँ मैं।

कौन मुझे पराजित कर पाएगा?
देख ले, हे मेरे पतन के अभिलाषी!
मैं निश्चल प्रेम की प्रतिमा हूँ,
मुझको तुम झुका न पाओगे कभी।

यदि मेरे साहस का सूर्य उदित हुआ,
तो उसकी ज्वाला तुम सह न पाओगे।
मेरे संकल्पों की अग्नि प्रखर है,
उसके सम्मुख स्वयं झुक जाओगे।

कौन रोक सकता है मुझको
अपने स्वप्नों को साकार करने से?
जिसका मैं पालन-पोषण करती हूँ,
वह भी नहीं रोक सकता मेरे पथ को।

इन छोटी-छोटी बाधाओं से
मेरी गति कब रुकने वाली है?
इन क्षुद्र जंजीरों के बंधन में
मेरी चेतना कब बँधने वाली है?

मेरा हृदय असीम, अथाह, विशाल,
जिसमें जग का सुख-दुःख समाया है।
ताप, संताप और करुणा का सागर,
जिसने जाना, उसने सत्य पाया है।

जो मेरे अंतर्मन को समझ सके,
वह जीवन का मर्म समझ जाएगा।
जो स्वयं को ही जान न पाया,
वह मुझको कैसे जान पाएगा?

किसमें है साहस इतना,
जो मेरी राह रोक सके?
जो मेरा बुरा चाह सके,
या मेरा मान छीन सके?

किसमें है सामर्थ्य इतना,
जो मेरा अपमान कर सके?
अब नहीं सहूँगी मैं
अपने उन अपमानों को।
अब नहीं पीऊँगी मैं
मौन रहकर विष-से घूँटों को।

अब उठूँगी मैं,
तोड़ दूँगी उन जंजीरों को,
जो मेरा शोषण करती हैं,
जो मेरे मनोबल को
हर पल तोड़ने का प्रयास करती हैं।

है किसमें साहस इतना,
जो मेरे संकल्पों को मोड़ सके?
यदि सम्मान न मिलेगा,
तो वह संसार भी छोड़ दूँगी,
जो मेरे अस्तित्व का आदर न करे।

मैं हूँ एक नारी,
सृष्टि की अमिट पहचान हूँ।
समझो मेरे अंतर्मन के भावों को,
मैं स्वाभिमान की संतान हूँ।

न अन्याय के सम्मुख झुकूँगी,
न सत्य का पथ छोड़ूँगी।
प्रेम मेरा स्वभाव है,
पर अपमान कभी न सहूँगी।

मैं प्रेम का सागर हूँ,
पर निर्बल नहीं हूँ।
मैं साहसी हूँ,
आँसुओं में बहकर किसी को
भावुक नहीं बनाती।

मैं प्रेम के साथ
मर्यादा और सम्मान निभाती हूँ।
मैं सृष्टि के अरमान सँवारती हूँ,
गिरते हुए कदमों को थामकर
सम्मान के साथ जीना सिखाती हूँ।

यही मेरा जीवन है,
यही मेरे अस्तित्व का सार है।
यही मेरी चेतना की पुकार है,
और यही सृष्टि के प्रति
मेरे समर्पण का आधार है।

क्यों मान बैठी थी मैं
अपने ही मन को लोगों की नज़रों का दोषी?
जबकि वे मेरे शत्रु नहीं,
मेरे अपने ही थे।

क्यों पहचान न सकी मैं
अपने ही अपनों को?
क्यों अपनी ही दृष्टि को
भ्रम के अंधकार में भटकने दिया?

क्यों अपनी पहचान को
स्वयं धूमिल होने दिया?
और क्यों दूसरों को अपनाने की चाह में
अपने अस्तित्व को ही भूलती चली गई?

क्यों मैं इतनी संकोची हो गई
अपने ही मन की बात कहने में?
क्यों साहस न जुटा सकी
किसी का हाथ थामने में?

ऐसा क्या हुआ
कि अपमान के कड़वे घूँट पीकर भी
मौन बनी रही?
क्यों अपने ही आँसुओं को
अपनी मुस्कान के पीछे छिपाती रही?

क्यों स्वयं को इतनी पीड़ाएँ देकर भी
सच्चा सुख न पा सकी?
क्यों अपने ही हृदय से दूर होती गई?
क्यों अपने ही अस्तित्व से रूठती गई?

क्यों मैं स्वयं को ही
अपमानित समझने लगी?
क्यों अपने ही मन को
बार-बार कठोर शब्दों से कोसने लगी?

आज मैं स्वयं से प्रश्न करती हूँ—
क्या मेरी पहचान
दूसरों की दृष्टि से ही होगी?
क्या मेरा अस्तित्व
किसी और की स्वीकृति का मोहताज है?

अब जान लिया है मैंने—
जो स्वयं को पहचान लेता है,
उसे संसार की कोई भी दृष्टि
छोटा नहीं कर सकती।

नहीं...
आज संकल्प लिया है मैंने,
अपनी पहचान स्वयं गढ़ूँगी,
अपने व्यक्तित्व का प्रकाश
स्वयं बनूँगी।

अब किसी की संकीर्ण दृष्टि को
अपने चरित्र का निर्णय नहीं करने दूँगी।
निडर होकर चलूँगी,
स्वाभिमान के पथ पर अडिग रहूँगी।

अपने साहस की रक्षा
स्वयं करूँगी।
दुर्बलता नहीं,
आत्मविश्वास को अपना सहचर बनाऊँगी।

एक साहसी नारी बनकर
हर प्रहार सहूँगी,
अन्याय का डटकर विरोध करूँगी।
जो भी जंजीरें मुझे बाँधेंगी,
उन्हें अपने संकल्प से तोड़ दूँगी।

अपनी आकांक्षाओं को
आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँचाऊँगी।
मेरे साहस को तोड़ने वाला
अब कोई नहीं होगा।
मैं अपने विश्वास को
हर दिन और दृढ़ बनाऊँगी।

ठान लिया है मैंने—
अपने इस साहस को
कभी टूटने नहीं दूँगी।
मेरा निश्चय अब इतना अटल है
कि कोई भी उसे डिगा नहीं पाएगा।

हाँ, मैं एक स्त्री हूँ।
और आज संसार को
यह सिद्ध करके दिखाऊँगी।
न मैं किसी से छोटी हूँ,
न किसी से कम हूँ।
न अपमान मेरी पहचान है,
न भय मेरी नियति।

मैं बुद्धि हूँ,
मैं साहस हूँ,
मैं स्वाभिमान की ज्योति हूँ।
मैं एक वीरांगना नारी हूँ,
जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता।

जो मेरे साहस को चुनौती देगा,
उसे मेरे संकल्प का उत्तर मिलेगा।
हर कठिनाई का सामना करूँगी,
हर बंधन को तोड़ूँगी।
अपनी तकदीर
अपने ही हाथों से लिखूँगी।

यदि किसी में साहस है
मेरे साहस को तोड़ने का,
तो वह आगे बढ़कर देख ले।
मैं टूटने के लिए नहीं,
हर टूटन से फिर उठ खड़े होने के लिए जन्मी हूँ।

यही मेरा प्रण है,
यही मेरा विश्वास है,
और यही मेरी पहचान है।


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