Shri om sharma
Classics
शफकत जानकार
निस्बत की थी जिससे।
मुखतलिफ होते वक्त
वो शख्स मेरे इन्तहाई
अहल की जमानत
भी न बचा सका।
रुखसत
अपना अपना प्य...
ये हैं मेरा, नये साल का, संकल्प पत्र। ये हैं मेरा, नये साल का, संकल्प पत्र।
क्योंकि, कुछ अनकहे लम्हें कह जाते हैं बहुत कुछ..... क्योंकि, कुछ अनकहे लम्हें कह जाते हैं बहुत कुछ.....
सच्चा है तो वो अनश्वर और अविनाशी है। सच्चा है तो वो अनश्वर और अविनाशी है।
सदा प्रफुलित रहने की सीख - देकर पवन हदय को सजाता।। सदा प्रफुलित रहने की सीख - देकर पवन हदय को सजाता।।
क्योंकि यहां खुद में रहो और चुप रहो तो बेहतर है। क्योंकि यहां खुद में रहो और चुप रहो तो बेहतर है।
या कभी समेट लो मुझे समंदर की तरह हार कर ख़ुद को जीत लो न मुझे सिकंदर की तरह.... या कभी समेट लो मुझे समंदर की तरह हार कर ख़ुद को जीत लो न मुझे सिकंद...
आज फिर रात ने मुझे गले लगाया है, आज फिर उसने मुझे तन्हा पाया है। आज फिर रात ने मुझे गले लगाया है, आज फिर उसने मुझे तन्हा पाया है।
यह हिमाचल की ज्ञानभूमि है, और दक्षिणी प्रदेश की तरह कर्मभूमि है। यह हिमाचल की ज्ञानभूमि है, और दक्षिणी प्रदेश की तरह कर्मभूमि है।
इस शहर में क्या रखा है बोल दे भाग चल तू साथ मेरे रात में। इस शहर में क्या रखा है बोल दे भाग चल तू साथ मेरे रात में।
सुभद्र किरण केश सुलझायेगा तमसों की यह उज्झटित लट। सुभद्र किरण केश सुलझायेगा तमसों की यह उज्झटित लट।
तनख्वाह मिलती झोला भरकर, जाने क्यूं, फिर भी हमेशा असंतुष्ट रहा।। तनख्वाह मिलती झोला भरकर, जाने क्यूं, फिर भी हमेशा असंतुष्ट रहा।।
स्वरा बच के रहना यहाँ आईनों से सुना है कि वो क़ातिलाना हुआ है। स्वरा बच के रहना यहाँ आईनों से सुना है कि वो क़ातिलाना हुआ है।
रहना जीवन में उनके सदा ही शुक्रगुज़ार। रहना जीवन में उनके सदा ही शुक्रगुज़ार।
उद्विग्न – घायल आस रह गई मन सँजोती सपन धीरज खोती। उद्विग्न – घायल आस रह गई मन सँजोती सपन धीरज खोती।
कल्पना से कर निर्माण भविष्य का, हर जीवन को मान दे। कल्पना से कर निर्माण भविष्य का, हर जीवन को मान दे।
पर आखिर में खुश होकर भक्त पर, देती अपनी कृपा का बेहद ही दान। पर आखिर में खुश होकर भक्त पर, देती अपनी कृपा का बेहद ही दान।
बसंत की, बसंती बहार की प्रतीक्षा नहीं करता अपने प्रेम से एक दूजे के मन का श्रृंगार करत बसंत की, बसंती बहार की प्रतीक्षा नहीं करता अपने प्रेम से एक दूजे के मन का श्र...
क्षितिज में उसकी सीमाएं हमेशा उसके हौसले तय करते हैं…। क्षितिज में उसकी सीमाएं हमेशा उसके हौसले तय करते हैं…।
लेकिन हमने भी, खाई सौगंध, कभी नहीं गिरेंगे, असूलों से हम। लेकिन हमने भी, खाई सौगंध, कभी नहीं गिरेंगे, असूलों से हम।
हर कठिनाई पर साथ रहे थे फिर ये घर किसका जल रहा। हर कठिनाई पर साथ रहे थे फिर ये घर किसका जल रहा।