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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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रोला छंद

रोला छंद

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रोला छंद 
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भाॅंति-भाॅंति के लोग, जहाँ में दिख ही जाते।
फैले  जैसे  रोग,      विविधता  रंग  दिखाते।
दुनिया बड़ी विचित्र, आप क्या नहीं जानते।
या इतना  बेवकूफ,  हमें  हो आप  मानते।।

जैसे  कोई  रोग,   आज की दुविधा भारी।
डरें  आम या खास, देखकर युद्ध जो जारी।
जाने  कैसे  लोग,   सोच  रखते  हैं  कैसी।
भाॅंति-भाॅंति के लोग, आपकी ऐसी-तैसी।।

इसका सबको ज्ञान, अंत में क्या आयेगा।
मिला युद्ध परिणाम, नहीं जनता भायेगा।
मानो  मेरी  बात,  बातचीत  एक  रास्ता।
मानवता  के  नाम, सभी  दे  रहे  वास्ता।

चाह  रहे  जो युद्ध, देख लो बढ़ती खाई।
चुपके चुपके चाल, रहे बन बड़के भाई।।
करता कैसे काम, नीति  है  कैसी  तेरी।
भूलो रण की बात ,मान तू सम्मति मेरी।।

भला कहाँ अब काम, बिना नजराना होता। 
जिसका फँसता काम, काम से पहले रोता।
उम्मीदों का ख़्वाब, कहाँ  खो  गया हमारा।
जिनके सिर पर भार, भला हो इनका सारा।।

करता युद्ध विनाश, जान  सब रहे  कहानी।
स्वार्थ, दंभ की जीत, मरा आँखों का पानी।
सारी  दुनिया  बेचैन, सोचता  है  हर  कोई।
करे  ईश  अरदास, सुनूँ क्या  किस्सागोई।।

लेता है नित जान, समझ में कब है आता।
ऐसा  लगता  आज,  धरा  से  टूटा  नाता।।
करता युद्ध विनाश, समझ लो  मेरे  भाई।
जन-मन की है चाह, नहीं रोये भौजाई।।

बासी  रोटी  चाय, कहाँ  मिलता  है  नाश्ता।
हर घर में तो आज, रहे खा घर-भर पास्ता।।
अजब-गजब  है चाल, इसी  से बढ़े बिमारी।
कौन समझता यार, कहानी  दुनिया  सारी।।

हम तो  हुए  जवान,चाय  रोटी  खाकर  के।
खड़ी  हुई  है  दूर, करे  कब अपने मन के।।
व्यर्थ सभी  है  आज, रहे  खा  दाना-पानी।
बीमारी का राज, सभी की करुण कहानी।।

मिला नहीं उपहार, सभी को हम सब जानें।
पर इतना आसान, नहीं जो  इसको  मानें।।
कहें मित्र यमराज, जगत की  लीला न्यारी।
करते  कहाँ  विचार, चाह  रखते  त्योहारी।।

सुने कौन झंकार,  हृदय  में हर पल बजता।
इसकी धुन से दूर, व्यर्थ ही सबको लगता।।
कहें मित्र यमराज,  समझ हम नहीं हैं पाते।
इसीलिए तो नित्य,  लोग हमको ठुकराते।।

नीति  नियम  सिद्धांत, भूलना  पड़ता  है।
खुद विवेक से हीन, मान  कर  लगता  है।।
सत्ता सुख की चाह, बनी जीवन की थाती।
करें  न्याय  की बात, नाचते  भ्रष्ट  बराती।।

होना मत मजबूर,   सुनो मत आप कहानी।
छल से रहना दूर,     व्यर्थ क्यों गाथा गानी।
पीतल की ले आड़,     दिखाते जो हैं सोना।
जादूगरी दिखा रहे, यही सच उनका होना।।

समझेगा कब कौन,    वेदना हृदय हमारी।
या फिर शायद हुई,    सुप्त चेतना बिचारी।
क्यों रखते हम यार, भाव कुछ ऐसा मन में।
बढ़ता जिससे दर्द, रहे  चुभ   काँटे तन में।।

नीति नियम सिद्धांत, आज है कहाँ जरूरी।
नाहक  ढोते  आप,   कौन  सी  है  मजबूरी।
कहें मित्र यमराज, आज  यदि  जीना  चाहें।
बदलो  अब  अंदाज, खोज लो  नूतन राहें।।

अंर्तमन की पीर, भाव   चेहरे  पर  आता।
इसका   रौरव  छंद,    भले  नहीं  सुहाता।
कहें मित्र यमराज, मनुज की यही कहानी।
मानो   प्यारे  बात, सुनी जो  बड़ी पुरानी।।

मन को रखिए शुद्ध, सरल ये जीवन होगा।
खुशियाँ हों भरपूर, करें जो हम सब योगा।
कहें   मित्र  यमराज, बोलिए  मीठी  वाणी।
जीवन का यह सूत्र, बनाए जग कल्याणी।।

माँ गंगा की खूब, आप  सब आरति करिए।
पाप-पुण्य   को  भूल,   खूब  गंदगी  भरिए।
कहें   मित्र   यमराज, मातु  है  मेरी   भोली।
रहें मस्त हम आप, भाँग की खाकर गोली।।

मत समझो कमजोर, आज फौलादी   बेटी।
सीमा  पर  तैनात, खड़ी  है  कसकर  पेटी।।
कहें मित्र यमराज, नजर  टेढ़ी  मत  डालो।
अबला है यह सोच, भावना शीघ्र निकालो।।

आज जहर का बीज, आप लोग मत घोलो।
बाँटों  मीठी  चीज,  शब्द  प्यारे  दो  बोलो।।
कहें  मित्र  यमराज,    पड़ेगा  वरना  भारी।
बने  नहीं  नासूर,   आज  की  ये  बीमारी।।

कैसे हो विश्वास, समय अब बदल गया है ।
लगता जैसे आज, यहाँ कुछ खोया सा है।।
कहें  मित्र  यमराज, खेल  होता  ये  भारी।
समझो इसका राज,  साजिशें ढेरों  सारी।।

धोखों का उपहार, आज मिलता अपनों से।
फिर कैसे विश्वास,  करें जन-मन  गैरों से।।
कहें मित्र यमराज, यही कलयुगिया लीला।
लाल  हरे  जो  रंग, दीखते  नीला  पीला।।

धोखों का संसार, झेलते सब नर-नारी।
बेवकूफ वे लोग, समझते जो बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, समस्या लगती भारी।
नाहक  हो  हैरान, खेलना अपनी पारी।।

रस में विष मत घोल, बनो मत आप अनाड़ी।
 कैसे  किया  विचार,   बढ़ेगी  अपनी  गाड़ी।।
कहें  मित्र  यमराज, गढ़ो  मत  आप  कहानी।
भले  छिपाओ  आप, मौन  कह रहा जुबानी।।

मीठे  बोलो  बोल, सुखद  आनंद  मिलेगा।
रस में विष मत घोल, लाभ सब दूर रहेगा।।
कहें  मित्र  यमराज, बोलिए  मीठी  वाणी।
भव बाधा सब दूर, काम  होंगे  कल्याणी।।

समझा कीजै आप, ख्वाहिशों की भी सीमा। 
नहीं  तेज  रफ्तार,  तनिक चलने  दो धीमा।।
कहें  मित्र  यमराज, कहीं पड़  जाय न भारी।
ख्वाहिश दे जब तोड़, आप से अपनी यारी।।

लू  का कठिन प्रभाव,  सहें हम आप थपेड़े।
सूर्यदेव  जी  आज,     किए  हैं  नयना  टेढ़े।
कहें मित्र यमराज, आप सब बचकर रहिए।
नहीं  कीजिए  दंभ, चलेंगे  जीवन  पहिए।।

जन  सेवा  के नाम, तमाशा  हम  हैं  करते।
सबसे  ज्यादा  पुण्य, हमारी  झोली  भरते।
कहें मित्र यमराज, जगत की  देखो लीला।
रोता दिखे गरीब, हुआ जब  आटा गीला।।

बरसे  नभ  से  आग, सभी  पर  पड़ती  भारी।
हर कोशिश है व्यर्थ, विफल  सबकी  तैयारी।।
कहें  मित्र  यमराज,   सभी जन बचकर रहिए।
ताप  समेटो  आप,    प्रार्थना  प्रभु से  करिए।।

तपन हुई विकराल,  सभी व्याकुल हैं प्राणी।
सूर्यदेव  का  कोप,    चुभे  जैसे  हो  त्राणी।।
कहें  मित्र  यमराज, कर्मफल  अपना  पाते।
शुक्र  मनाओ  यार,  नहीं  जो  लातें  खाते।।

सुधीर श्रीवास्तव 


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